अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)
Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)
महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा
स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)
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शंखस्मृतिः ॥
अनिवेद्यनभोक्तव्यं पिण्डमूलेकदाचन ॥ १४ ॥
उग्रगन्धान्यगन्धानि चैत्यवृक्षभवानिच ।
पुष्पाणिरक्तवर्णानि स्वयमुत्पतितान्यच ॥ १५ ॥
तोयोद्भवानिदेयानि रक्ताम्यपिविशेषतः ।
ऊर्णासूत्रं प्रदातव्यं कार्पासमथवाभवम् ॥ १६ ॥
दशांविवर्जयेत्प्राज्ञो यद्यप्यहतवस्त्रजाम् ।
घृतेनदीपादतव्यस्तिलतैलेन वा पुनः ॥ १७ ॥
धूपार्थंगुग्गुलं दद्याद् घृतयुक्तंमधूत्कटम् ।
चन्दनंचनशं दद्यात्पितॄणांकुङ्कुमंशुभम् ॥ १८ ॥
भृङ्गतृर्णसुरसिशिग्रुं पालकंसिन्धुशेफया ।
कूष्माण्डालाबुवार्त्ताकं कोविदारांश्चवर्जयेत् ॥ १९ ॥
पिप्पलीमरिचं चैव तथाचैवपिण्डमूलकम् ।
कृत्रिमंलवणंसर्वं दद्याग्रंतद्विवर्जयेत् ॥ २० ॥
राजमाषान् मसूरांश्च कोद्रवांश्चानुरूपकान् ।
लोहितांश्चैव निर्यासान् श्राद्धकर्मणिवर्जयेत् ॥ २१ ॥
भी भोजन न करे ॥ १४ ॥ जिन में अधिक सुगन्ध हो या जिन में सर्वथा गंध न हो, जो किसी अन्य नाम श्मशान के वृक्ष पर लगे हों, और जो लाल रंग के हों, ऐसे फूल पितरों को श्राद्ध में न चढ़ावे ॥ १५ ॥ यदि लाल फूल जल में पैदा हुये हों, तो विशेष कर पितरों पर चढ़ावे, ऊन का सूत वा नया कपास का सूत पितरों पर चढ़ावे ॥ १६ ॥ बुद्धिमान् मनुष्य अहत (जो किसी थान आदि में से फाड़ा न हो ऐसे) वस्त्र की दशा भी पितरों पर न चढ़ावे। और घी का अथवा तिलों के तैल का दीपक पिण्डों के समीप में जलावे। १७। धूप के लिये घृत और मधु बहुत जिस में विशेष मिले हों, ऐसे गुग्गुल का धूप देवे, चन्दन और केशर को घिस कर पितरों का पूजन करे ॥ १८ ॥ भृङ्गवृक्ष (भांग का वृक्ष), सुरस, सहिजना, पालक, सिन्धुक कुष्माण्डक वा डिण्डिश, कहिहड़ा, तुम्बा, बैंगन, कचनार इनको श्राद्ध में छोड़ देवे अर्थात भोजनार्थ में न लेवे ॥ १९ ॥ पीपल, मिरच, गलगल, बनाया लवण, दधि का अग्र भाग इन को भी श्राद्ध में वर्ज देवे ॥ २० ॥ राजमाष (रवांस) मसूर-कोदों, कांगूदार, लाल गोंद इन को भी श्राद्ध कर्म में वर्ज देवे ॥ २१ ॥