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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 422, कुल 805 में से

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पृष्ठ 422

भाषाधंसहिता ॥ ९१

श्रान्तःक्रुद्धस्तमोऽन्धोवा क्षुत्पिपासाभयार्दितः ।
दानपुण्यमकृत्वावा प्रायश्चित्तंदिनत्रयम् ॥ ५६ ॥
उपस्पृशेत्त्रिषवणं महानद्युपसंगमे ।
चीर्णान्तेचैवगांदद्याद् ब्राह्मणान्भोजयेद्दश ॥ ५७ ॥
दुराचारस्यविप्रस्य निषिद्धाचरणस्यच ।
अन्नंभुक्त्वाद्विजःकुर्याद्दिनमेकमभोजनम् ॥ ५८ ॥
सदाचारस्यविप्रस्य तथावेदान्तवेदिनः ।
भुक्त्वाऽन्नंमुच्यतेपापादहोरात्रंतुवैनरः ॥ ५९ ॥
ऊर्ध्वोच्छिष्टमधोच्छिष्टमन्तरिक्षमृतीतथा ।
कृच्छ्रत्रयंप्रकुर्वीत अशौचमरणेतथा ॥ ६० ॥
कृच्छ्रे देव्ययुतंचैव प्राणायामशतद्वयम् ।
पुण्यतीर्थेह्यार्द्रशिराः स्नानंद्वादशसंख्यया ।
द्वियोजनंतीर्थयात्रा कृच्छ्रमेकंप्रकल्पितम् ॥ ६१ ॥
गृहस्थःकामतःकुर्याद्रेतःसेचनंभुवि ।


जो थका हो, क्रोध करे, मादकद्रव्य खाने आदि से उन्मत्त, बेहोश मूर्च्छित हुआ हो, क्षुधा, प्यास वा भय से पीड़ित हो गया हो ऐसी दशाओं में दान पुण्य न करे तो वह ब्राह्मण तीन दिन प्रायश्चित्त करै ॥५६॥ और गंगा आदि बड़ी नदियों के संगम में सायं, प्रातः, और मध्याह्न में तीन बार स्नान और आचमन करै । प्रायश्चित्त किये पीछे एक गोदान करे और दश ब्राह्मण जिमावे ॥ ५७ ॥ दुराचारी और निषिद्ध आचरण करने वाले ब्राह्मण का अन्न खा कर द्विज पुरुष एक दिन भोजन न करै ॥ ५८ ॥ उत्तम सदाचारी और वेदान्त को जानने वाले ब्राह्मणका अन्न खाकर मनुष्य एक दिन रात में अनेक पापों से छूटजाता है ॥ ५९ ॥ नाभि से ऊपर उच्छिष्ट होने वा नाभि से नीचे के भाग में अशुद्ध होने की दशा में कोई मरे, वा खटिया पर मरे, अथवा जो सूतक में मरे, उस के लिये पुत्रादि वारिस लोग शुद्धि के बाद तीन कृच्छ्र व्रत करें ॥ ६० ॥ दश हजार गायत्री का जप, दोसौ २०० प्राणायाम, और पवित्र तीर्थ में बारह बार शिर भिगो २ कर स्नान करे ये सब एक कृच्छ्र का फल देते हैं। इस कारण कृच्छ्र व्रत करने में असमर्थ हो तो उक्त गायत्री जपादि को तिगुणा करे । और दो योजन तक तीर्थयात्रा को भी एक कृच्छ्र माना है ॥ ६१ ॥ यदि गृहस्थ पुरुष जानकर अपने वीर्यको