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सर्वकोश
अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 385, कुल 805 में से

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पृष्ठ 385

२४ पराशरस्मृतिः ॥

तथाचवेदविद्विप्रः सर्वभक्षोऽपिदैवतम् ॥ ३० ॥
अमेध्यानि तु सर्वाणि प्रक्षिप्यन्तेयथोदके ।
तथैवकिल्बिषंसर्वं प्रक्षिपेद्द्विजानले ॥ ३१ ॥
गायत्रीरहितोविप्रः शूद्रादप्यशुचिर्भवेत् ।
गायत्रोब्रह्मतत्त्वज्ञाः संपूज्यन्तेजनैर्द्विजाः ॥ ३२ ॥
दुःशीलोऽपिद्विजःपूज्यो नतुशूद्रोजितेन्द्रियः ।
कःपरित्यज्यगांदुष्टां दुहेच्छीलवतींखरीम् ॥ ३३ ॥
धर्मशास्त्ररथारूढा वेदखङ्गधराद्विजाः ।
क्रीडार्थमपियद्ब्रूयुः सधर्मःपरमःस्मृतः ॥ ३४ ॥
चातुर्वेद्योविकल्पीच अङ्गविद्धर्मपाठकः ।
त्रयश्चाश्रमिणोमुख्याः पर्षदेषादशावरा ॥ ३५ ॥
राज्ञश्चानुमतेस्थित्वा प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ।
स्वयमेवनकर्तव्यं कर्तव्यास्वल्पनिष्कृतिः ॥ ३६ ॥
ब्राह्मणांस्तानतिक्रम्य राजाकर्तुं यदीच्छति ।


देवता है इसी प्रकार सर्व भक्षक होने पर भी धर्म निष्ठ ब्राह्मण वेद का ज्ञाता होने से देवता ही है ॥ ३०॥ जैसे संपूर्ण अपवित्र वस्तु वर्षादि के समय नद्यादि के जल में फेंके शुद्ध हो जाते हैं वैसे ही संपूर्ण पाप ब्राह्मण रूप अग्नि में छोड़ देने से भस्म हो जाते हैं ॥ ३१ ॥ गायत्री से हीन ब्राह्मण शूद्र से भी अधिक अशुद्ध होता है । और गायत्री रूप वेद के तत्त्व को जानने वाले ब्राह्मणों को मनुष्य पूजते हैं ॥३२॥ दुष्ट स्वभाव वाला भी ब्राह्मण पूजने योग्य है और जितेन्द्रिय भी शूद्र वैसा पूज्य नहीं क्योंकि (निकृष्ट ब्राह्मण में भी कुछ ब्राह्मण पन अवश्य होगा) ऐसा कौन है जो दुष्ट गौ को छोड़ कर सुशीला गधी को दुहे ॥३३॥ धर्मशास्त्ररूपी रथमें बैठे, वेदरूपी खड्ग (हथियारों) को धारण किये विद्वान् ब्राह्मण साधारण विचार से भी जो कुछ कहें वह भी उत्तम धर्म माना जाय ॥ ३४॥ चारों वेदों के ज्ञाता चार विद्वान्, पांचवां नैयायिक, छठा छः वेदाङ्गों का ज्ञाता, सातवां धर्मशास्त्रों का पाठक और ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ, ये तीनों आश्रमों वाले मुखिया, यह कम से कम दश धर्मज्ञ विद्वानों की धर्म सभा कहाती है ॥३५॥ राजा की अनुमति में होकर प्रायश्चित्त बतावें आप ही प्रायश्चित्त का निर्णय न कर देवे (अर्थात प्रायश्चित्तादि धर्म व्यवस्था कारिणी विद्वत्सभा राजसभा की अनुमति से अपना काम करे) परन्तु स्वल्प प्रायश्चित्त को स्वयं भी निश्चित कर देवे ॥ ३६ ॥ यदि उन वि-