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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 382, कुल 805 में से

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पृष्ठ 382

भाषार्थसहिता ॥ ५१

मुहुरार्जवसंपन्नः शुद्धिंगच्छतिमानवः ॥ ८ ॥
सचैलंवाग्यतःस्नात्वा क्लिन्नवासाःसमाहितः ।
क्षत्रियोवाथवैश्योवा ततःपर्षदमाव्रजेत् ॥ ९ ॥
उपस्थायततःशीघ्रमार्तिमान्धरणींव्रजेत् ।
गात्रैश्चशिरसाचैव नचकिंचिदुदाहरेत् ॥ १० ॥
सावित्र्याश्चापिगायत्र्याः संध्योपास्त्यग्निकार्ययोः ।
अज्ञानात्कृषिकर्त्तारो ब्राह्मणानामधारकाः ॥ ११ ॥
अव्रतानाममन्त्राणां जातिमात्रोपजीविनाम् ।
सहस्रशःसमेतानां परिषत्त्वंनविद्यते ॥ १२ ॥
यद्वदन्तितमोमूढा मूर्खाधर्ममतद्विदः ।
तत्पापंशतधामूत्वा तद्वक्तृनधिगच्छति ॥ १३ ॥
अज्ञात्वाधर्मशास्त्राणि प्रायश्चित्तंददाति यः ।
प्रायश्चित्तोभवेत्पूतः किल्विषंपर्षदिव्रजेत् ॥ १४ ॥
चत्वारोवात्रयोवापि यंब्रूयुर्वेदपारगाः ।
सधर्मइतिविज्ञेयो नेतरेस्तुसहस्रशः ॥ १५ ॥


को प्राप्त हो जाता है ॥ ८ ॥ मौन धारण कर सचैल स्नान करके गीले वस्त्र पहिने हुये सावधान हो कर पर्षद (धर्म सभा) में जावे ॥ ९ ॥ फिर शीघ्र सभाके समीप जाकर दुःखी हुआ गात और शिरसे (साष्टांग) पृथ्वी में पड़ जाय और कुछ न कहे ॥ १० ॥ सूर्यनारायण जिस के देवता हैं ऐसी गायत्री सन्ध्यावंदन और अग्निहोत्र इन कामों को जो नहीं जानते और न करते हों और जो खेती करते हों वे नाम मात्र के ब्राह्मण हैं ॥११॥ जिन के सन्ध्यादि कर्म करने का नियम नहीं, जो वेद मन्त्रों को नहीं जानते और जातिमात्र से जो ब्राह्मण बने हैं ऐसे चाहे हजारों भी जिस में इकट्ठे हों वह परिषद (धर्मसभा) नहीं है ॥ १२ ॥ धर्म के मर्म को न जानने वाले अज्ञानी मूर्ख ब्राह्मण लोग जो (प्रायश्चित्त आदि) बतलाते हैं वह पाप सौ गुणा होकर उन धर्मकी व्यवस्था कहने वालों को प्राप्त होता है ॥१३॥ जो धर्मशास्त्रों को न जानकर प्रायश्चित्त देता है तो वह पापी पवित्र हो जाता है और उस प्रायश्चित्ती का प्रायश्चित्त देने वाले को लगता है ॥१४॥ चार वा तीन वेदोंको पूर्ण रूप से ठीक २ जाननेवाले जिस को कहें वही धर्म जानो और अन्य हजार भी जिसे कहें वह धर्म नहीं ॥१५॥