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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 307, कुल 805 में से

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पृष्ठ 307

६६ कात्यायनस्मृतिः ॥

आषाढाद्ये धनिष्ठाद्ये अश्विन्याद्ये तथैवच ॥१०॥
द्वन्द्वान्येतानिबहुवद् ऋक्षाणांजुहुयात्सदा।
द्वन्द्वद्वयंद्दिवच्छेषमवशिष्टान्यथैकवत् ॥११॥
देवतास्वपिहूयन्ते बहुवत्सार्वपित्तयः।
देवाश्चवसवश्चैव द्विपद्देवाश्विनौसदा॥१२॥
ब्रह्मचारिसमादिष्टो गुरुणाव्रतकर्मणि।
वाढमोमित्यवान्ब्रूयात्तथैवानुपपालयेत् ॥१३॥
सशिखंवपनंकार्यमास्नानाद्ब्रह्मचारिणा।
आशरीरविमोक्षाय ब्रह्मचर्य्यंनचेद्भवेत् ॥ १४ ॥
नगात्रोत्सादनंकुर्यादनापदिकदाचन।
जलक्रीडामलंकारान्नतीद्गण्डइवाप्लवेत् ॥ १५ ॥
देवतानांविपर्यासे जुहोतिषुकथम्भवेत्।
सर्वंप्रायश्चित्तंहुत्वा क्रमेणजुहुयात्पुनः ॥ १६ ॥
संस्काराअतिपत्येरन् स्वकालाच्चेतकञ्चन।


स्वाहा इत्यादि) आहुति दे और शेष दो द्वन्द्वों को द्विवचनान्त पद से और बाकी के नक्षत्रों को एक वचनान्त पद से आहुति देवे ॥११॥ देवताओं में भी सार्वपित्ति देव, वसु, द्विपद्देव, अश्विनीकुमार इन को बहुवचनान्त पद से उच्चारण करे ॥ १२ ॥ जिस व्रत के काम में ब्रह्मचारी को गुरु आज्ञा देवें उस में बाढं (सत्य है) अथवा ओं (अङ्गीकार है) ऐसे कहे और गुरु की आज्ञा को वैसी ही ज्यों की त्यों पालन करे ॥ १३ ॥

यदि जीवन भर के लिये नैष्ठिक ब्रह्मचर्य्य धारण न किया हो तो समावर्त्तन संस्कार होने पर्यन्त ब्रह्मचारी को शिखा सहित मुण्डन सदा कराना चाहिये ॥१४॥ ब्रह्मचारी आपत्ति के बिना अपने शरीर को किसी से न दबवावे। जल में क्रीड़ा, आभूषण धारण इन को भी न करे और जलाशय में डुबकी लगा के स्नान न करे किन्तु दण्ड के तुल्य जल पर तर लेवे ॥ १५ ॥ यदि कभी होम में देवताओं का विपर्यास (आगे का पीछे वा पीछे का आगे) होजाय तो प्रायश्चित्त की सब आहुति देकर फिर क्रम से होम करे ॥ १६ ॥ यदि यज्ञोपवीत से पहिले संस्कारों (जात कर्मादि) की अतिपत्ति