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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 304, कुल 805 में से

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पृष्ठ 304

भाषार्थसहिता ॥ ६३

आशौचं कर्मणोऽन्तेस्यात् त्र्यहंवाऽब्रह्मचारिणः ॥ ६ ॥
श्राद्धमग्निमतःकार्यं दाहादेकादशेऽहनि ।
प्रत्याब्दिकंतु कुर्वीत प्रमीताहनिसर्व्वदा ॥ ७ ॥
द्वादशप्रतिमास्यानि आद्यं षाण्मासिकेतथा ।
सपिण्डीकरणञ्चैव एतदूंश्राद्धषोडशम् ॥ ८ ॥
एकाहेनतुषण्मासा यदास्युरपिवात्रिभिः ।
न्यूनाःसंवत्सरश्चैव स्यातांपाण्मासिकेतदा ॥ ९ ॥
यानिपञ्चदशाद्यानि अपुत्रस्येतराणितु ।
एकस्मिन्नह्निदेयानि सपुत्रस्यैवसर्व्वदा ॥ १० ॥
नयोषायाःपतिर्दद्यादपुत्रायाअपिक्कचित् ।
नपुत्रस्यापितादद्यान्नानुजस्यतथाग्रजः ॥ ११ ॥
एकादशेऽह्नि निर्वर्त्य अवाग्दर्शाद्यथाविधि ।
प्रकुर्वीताग्निमान्पुत्रो मातापित्रोःसपिण्डताम् ॥ १२ ॥

ब्रह्मचारी को प्रारम्भ किये कर्म के समाप्त हो जाने पर तीन दिन सूतक मानना चाहिये ॥ ६ ॥ अग्निहोत्री का श्राद्ध दाह के दिन से ग्यारहवें दिन करे और प्रति वर्ष में भी मरने के दिन सदैव श्राद्ध करै ॥ ७ ॥ एक वर्षतक बारह मास के प्रत्येक अमावास्या के बारह श्राद्ध, ग्यारहवें दिन का १ एक पहिला श्राद्ध, छः २ महिने पूरे होने पर दो श्राद्ध और एक सपिंडीकरण श्राद्ध ये अग्निहोत्री के सोलह श्राद्ध कहाते हैं ॥ ८ ॥ ये दो छः २ मास वाले श्राद्ध तब होते हैं जब छः महीने वा १ वर्ष में एक वा तीन दिन शेष रहें तब छठे २ महीने में दो वार श्राद्ध करे ॥ ९॥ पहिले जो पन्द्रह श्राद्ध हैं वे जिसके पुत्र न हो उसके एक ही दिन में करदे और जिसके पुत्र हो उसके सर्वदा (पृथक् २) उस २ समय में करै ॥ १० ॥

जिस स्त्री के पुत्र न हो उस का पति उस को श्राद्ध में पिण्ड न देवे पुत्र को पिता पिण्ड न दे तथा छोटे भाई को बड़ा भाई पिण्ड न देवे ॥ ११ ॥
ग्यारहवें दिन मावस से पहिले कर्म को पूर्ण करके अग्निहोत्री पुत्र माता पिता की सपिण्डी विधि पूर्वक करै ॥ १२ ॥ सपिण्डी किये पीछे प्रति महीने एको-