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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 244, कुल 805 में से

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पृष्ठ 244

कात्यायनस्मृतिः ॥ ३

पूजनीयाःप्रयत्नेन पूजिताःपूजयन्तिताः ।
प्रतिमासुचशुभ्रासु लिखित्वावापटादिषु ॥१४॥
अपिवाक्षतपुंजेषु नैवेद्यैश्चपृथग्विधैः ।
कुड्यलग्नांवसोर्द्धारां सप्तधारांघृतेनतु ॥१५॥
कारयेत्पञ्चधारांवा नातिनीचांनोच्छ्रिताम् ।
आयुष्याणिचशान्त्यर्थं जप्त्वातत्रसमाहितः ॥१६॥
षड्भ्यःपितृभ्यस्तदनुभक्त्याश्राद्धमुपक्रमेत् ।
अनिष्ट्वातुपितॄञ्श्राद्धे नकुर्यात्कर्मवैदिकम् ॥१७॥
तत्रापिमातरःपूर्व्वं पूजनीयाःप्रयत्नतः ।
वशिष्टोक्तोविधिःकृत्स्नो द्रष्टव्योऽत्रनिरामिषः ॥१८॥
अतःपरंप्रवक्ष्यामिविशेषइहयोभवेत् ॥१९॥
इति श्रीकात्यायनस्मृतौ प्रथमखंडः समाप्तः ॥१॥
प्रातरामंत्रितान्विप्रान्युग्मानुभयतस्तथा ।
उपवेश्यकुशान्दद्यादृजुर्नैर्वाहिकपाणिना ॥१॥


यत्न से पूजन करे क्योंकि पूजा को प्राप्त हुई ये पूजनेवाले को पुजवाती हैं इन की सफेद मूर्त्तियों में अथवा पट्टे पर लिख कर ॥१४॥ अथवा अक्षतों के पुंजों की (ढेरी) में पृथक् २ नैवेद्यो से पूजे । और घी छोड़कर भीतमें सात वसोर्धारा बनावे ॥१५॥ वा पांच धारा करवावे और वे धारा न बहुत नीची हों न ऊंची और शांति के लिये अवश्यो बढ़ने की प्रार्थना अर्थ वाले मंत्र सावधानी से जप कर ॥१६॥ तिस पीछे छः पितरों के नान्दी श्राद्ध का भक्ति से प्रारम्भ करे। श्राद्ध में पितरों के बिना पूजे वेदोक्त कर्म न करे ॥१७॥ वहां भी यत्न से-माता [षोडश मातृका] सब से पहिले पूजनी चाहिये और इस श्राद्ध में वशिष्ठ ऋषिका कहा सब विधान देखना चाहिये ॥ १८ ॥ इस से आगे श्राद्ध विषय में जो विशेष वक्तव्य है सो हम कहेंगे ॥

यह प्रथम खंड समाप्त हुआ ॥

प्रातःकाल दिया है निमन्त्रण जिन को ऐसे दो २ ब्राह्मण दोनों पक्ष (माता और पिता) के बैठाकर धीरज के साथ हाथ से कुशाओं को देवे ॥१॥