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अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

अष्टादश स्मृति संग्रह (संपूर्ण १८ स्मृतियाँ)

Ashtadasha Smriti Sangrah (18 Smritis Complete)

महर्षि व्यास, अत्रि, विष्णु, हारीत, औशनस, आङ्गिरस, यम, आपस्तम्ब, संवर्त, कात्यायन, बृहस्पति, शंख, लिखित, दक्ष, शातातप, वसिष्ठ आदि द्वारा

स्रोत: 18 Smritis with Sanskrit Shlokas & Hindi Bhasha Tika (उद्गम)

DevanagariHindipublished805 पृष्ठ

पृष्ठ 164, कुल 805 में से

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पृष्ठ 164

यमस्मृतिः ॥ ९

गोधनस्यकेचिदिच्छंति केचिच्चैवावकीर्णिनः ॥३९॥
दंडादूर्ध्वप्रहारेण यस्तुगांवनिपातयेत् ।
द्विगुणं गोव्रतंतस्य प्रायश्चित्तंविनिर्दिशेत् ॥ ४०
अंगुष्ठमात्रस्थूलस्तु बाहुमात्रप्रमाणकः । ॥
सार्द्रश्चसपलाशश्च गोदंडःपरिकीर्तितः ॥ ४१ ॥
गवांनिपातनेचैव गर्भोपिसंपतेद्यदि ।
एकैकशश्चरेत्कृच्छ्रं यथापूर्वंतथापुनः ॥ ४२ ॥
पादमृत्पन्नमात्रेतु द्वौपादौगात्रसंभवे ।
पा दोनंकृच्छ्रमाचष्टे हत्वागर्भमचेतनम् ॥ ४३ ॥
अंगप्रत्यंगसं पूर्णे गर्भेरेतः समन्विते ।
एकैकशश्चरेत्कृच्छ्र-मेषागोघ्नस्यनिष्कृतिः ॥ ४४ ॥
बंधनेरोधनेचैव पोषणेत्रागवांरुजा ।
संपद्यतेचेन्मरणं निमित्तीनैवलिप्यते ॥ ४५ ॥
मूर्छितःपतितोवापि दंडैनाभिहतस्तथा ।


हत्या का—कोई गोहत्या के व्रत का, और कोई अवकीर्णी (जो ब्रह्मचर्य से पतित हो) के व्रत का प्रायश्चित्त वेश्यागामी पुरुष के लिये मानते हैं ॥३९॥
दंड के प्रहार से जो गौ को मारे उसे गोहत्या का दूना प्रायश्चित्त बतावे॥४०॥
अंगूठे के समान मोटा और दो हाथ का जिस का प्रमाण हो ऐसा जो गीला और पत्तों समेत दंड उसे गोदंड कहते हैं ॥ ४१ ॥
गौओं के मारने से जो गौ-का गर्भ गिरजाय तो तीनों द्विजाति क्रम से एक २ कृच्छ्र करें ॥ ४२ ॥
गर्भ रहते ही जो गर्भपातहोजाय तो चौथाईकृच्छ्र और गर्भ की देह बने पर जो पात होय तो आधाकृच्छ्र और अचेतन गर्भ का पात होजाय तो पौन कृच्छ्र करै ॥ ४३ ॥
तथा यदि गौ को मारने से अंग (हाथ आदि)-प्रत्यंग (नखरोम आदि) से पूरा सचेत गर्भ गिर जाय तो तीनों वर्ण एक २ कृच्छ्र क-रैं, यह गोहत्या का प्रायश्चित्त कहा ॥ ४४ ॥
यदि गौओं के बांधने, रोकने, पा-लन पोषण करने, से रोग हो कर यदि गौ मरजाय तो बांधना आदि करने वाले को पाप नहीं लगता ॥४५॥
मूर्छाको प्राप्त अथवा गिरा हुआ—क्रोध के