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आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

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पृष्ठ 67

आर्यभटीये- ३१
लम्बक इत्युच्यते। तद्वशाच्छङ्कादेरधऊर्ध्वस्थितिर्ज्ञेयेत्यर्थः। शङ्कोर्हि मूलाग्रयो-
रधऊर्ध्वावस्थान ऋजुस्थितिर्भवति॥ इष्टवृत्तप्रदर्शनाय तद्विष्कम्भार्धानयनमाह।
भा०:--भ्रम अर्थात् परकार (कम्पास-एक किस्म के लोहे, पीतल, या काष्ठ्
का बना हुआ यन्त्र) से इष्ट वृत्त बनावे। परकार के एक नोक को इष्ट वृत्तके
बीच में दृढ़कर रक्खे एवं दूसरे नोक को जितना बड़ा वृत्त क्षेत्र बनाना चाहे
उतना फैलाकर चारो ओर घुमावे तो अभीष्ट वृत्त क्षेत्रबन जावेगा। इसी प्रकार
त्रिभुज और चतुर्भुज क्षेत्र को भी अपने २ कर्ण द्वारा बनावे। अर्थात् त्रिभुज की
एक भुजा को कर्ण मान कर, इस कर्ण की बराबर एक शलाका जमीन पर रक्ख
कर, अन्य दो भुजा की बराबर शलाका पर एक शलाके को कर्ण के आगे एवं
दूसरी शलाके को कर्ण के दूसरी ओर रख दोनों भुजां वाली शलाका के साथ
मिलावे तो अभीष्ट त्रिभुज होगा। इसी प्रकार चतुर्भुज को भी जानना॥
यदि भूमि की समता जाननी हो कि यह भूमि बराबर हैं या ऊंची नीची
है तो-इस को जल द्वारा ठीक करे। दृष्टि द्वारा भूमि को बराबर कर उस पर
एक वृत्त लिखे उसके बाहर दो या तीन अंगुल अलग-दूसरा वृत्त बनावे और
परिधि की बीच की जगह को बराबर रख कर गड्ढा करे और इस गड्ढे को
जल से भरे। यदि इस के ऊपर जल सब तरफ हो तो जानना कि पृथ्वी सम
है। और यदि जल कम दीखे तो वहां जगह ऊंची होगी एवं जहां जल अ-
धिक हो वहां जगह गहिरी होगी। लम्बक द्वारा पृथ्वी की ऊंचाई नीचाई
का ज्ञान होता है॥ १३॥
शङ्कोः प्रमाणवर्गं छायावर्गेण संयुतं कृत्वा।
यत्तस्य वर्गमूलं विष्कम्भार्धं स्ववृत्तस्य ॥ १४ ॥
वर्गमूलं मूलमेव। इष्ट शङ्कोः प्रमाणवर्गं तच्छायावर्गेण युक्तं मूलीकुर्यात्।
तन्मूलमिष्टकाले स्ववृत्ताख्यस्य मण्डलस्य विष्कम्भार्धं भवति। छायाग्रमध्यं श-
ङ्कुशिरःप्रापि यन्मण्डलमूर्ध्वाधस्स्थितं तत्स्ववृत्तमित्युच्यते। यथा महाशङ्कु
शिरःप्रापि व्यासार्धमण्डलं तद्वदिदमपि वेद्यम्॥ शङ्कोः प्रदीपोन्नतिवशाज्जात-
च्छायानयनमाह।
भ.०:--इष्ट शङ्कु के प्रमाणवर्ग को उसकी छाया वर्ग के साथ योग करे और
इस का वर्गमूल निकाले तो यह मूल, इष्ट-काल में “ स्ववृत्त मण्डल ” का व्या-
सार्द्ध होगा। छांया के अग्रभाग से शङ्कु के शिर पर्य्यन्त जो वृत्त ऊपर नीचे
को है उसे “ स्ववृत्त ” कहते हैं ॥ १४ ॥