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सर्वकोश
आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

आर्यभटीयम् (आचार्य आर्यभट - परमेश्वर टीका एवं हिन्दी अनुवाद)

Aryabhatiya of Aryabhata with Hindi Commentary

आचार्य आर्यभट (४७६ ई.) / पं. उदयनारायण सिंह द्वारा

DevanagariSanskritpublished134 पृष्ठ

पृष्ठ 60, कुल 134 में से

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पृष्ठ 60

३४ गीतिका पा ।
भा०: त्रिभुजक्षेत्र के जो दो तुल्य दल (अर्द्धभाग) कोटी । अर्थात् लम्ब । त्रि-
भुज के अंधोगत भुजा को भूमि (आधार) कहते हैं । ऊपर के कोण से
आधार तक जो लम्ब सूत्र उसे "लम्ब" कहते हैं । आधार के अर्द्धभाग
को लम्ब से गुणन करने पर-गुणनफल "त्रिभुज क्षेत्र" का फल होगा ॥
एवं आधीगीतिका अर्थ हुआ ॥
ऊर्ध्वभुजातत्सवंर्गाधं स घनष्षडश्रिरिति ॥ ६ ॥
ऊर्ध्वभुजा क्षेत्रमध्योच्छ्रायः । तदिति क्षेत्रफलम् । ऊर्ध्वभुजायाः क्षेत्र
फलस्य च संवर्गाधं यत् स घनः। घनफलं भवति। स क्षेत्रविशेषष्षडश्रिश्च भ
वांत षड्बाहुर्भवति । सर्वतस्त्रिकोशं क्षेत्रमित्यर्थः । लम्बावगतिस्तु त्रिभुज
भुजयोर्योगस्तदन्तरगुणो भुवाहतो लब्ध्या द्विस्या भूरूनयुता दलिताबाध
तयोस्स्याताम् । स्वाबाधाभुजकृत्योरन्तरमूलं प्रजायते लम्ब इत्यनेन वेद्या
युक्त्या च तत्सिध्यति । युक्तिस्तु लीलावतीव्याख्यायां प्रदर्शिता । लम्बत्तद
र्धयोर्वर्गान्तरपदमत्रोर्ध्वबाहुर्भवति ॥ वृत्तक्षेत्रफलं पूर्वार्धेनाह ।
ऊर्द्धर्ध्वभुजा (खेत के बीच का उच्छ्राय) और क्षेत्रफल का संवर्ग
का जो अर्द्ध भाग-वह 'घन' होता है । अर्थात् वह क्षेत्र "षडस्रि" या "षड्बा
हु" होता है। अथवा यों समझो कि वह सब ओर से "त्रिकोण" होताहै ॥६॥
समपरिणाहस्यार्धं विष्कम्भार्धहतमेव वृत्तफलम् ॥
समपरिणाहस्य'समवृत्तक्षेत्रपरिधेरर्धं 'विष्कम्भार्धहतं वृत्तक्षेत्रफलं भवति ।
वृत्तक्षेत्रफलाननयनेऽयमेव प्रकारस्सूक्ष्म इत्येवशब्देन प्रदर्शयति ॥ घनसमवृत्त
क्षेत्रस्य फलमपरार्धेनाह ।
समवृत्त क्षेत्र के परिधि के आधे को व्यास के आधे भाग से गुणन क-
रने पर गुणनफल वृत्तक्षेत्र'का फल होगा॥६ एवं आधी गीतिका का अर्थ है।
तन्निजमूलेन हतं घनगोलफल निरवशेषम् ॥ ७
तत्समवृत्तक्षेत्रफलं निजमूलेन स्वकीयमूलेन हतं घनगोलफलं भवति । नि-
रवशेषं स्फदमित्यर्थः ॥ विषमचतुरश्रादीनामन्तः कर्णयोस्संपातादधलम्बकोर्ध्वा-
धरखण्डप्रमाणं क्षेत्रफलञ्चाह ।
और उक्त समवृत्त क्षेत्रफल को स्वकीय मूल से गुणन करने पर स्फुट-
घन गोल फल होगा ॥ ७ ॥
आयामगुणे पार्श्वे तयोर्गहृते स्वपातरेखे'ते ।
विस्तरयोगाधंगणे ज्ञेयं क्षेत्रफलमायामे ८ ॥