अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
पारिभाषिक शब्दों के अर्थों का संकलन
अपूर्व — अदृष्ट ( धर्मविशेष ) | उत्पत्त्यपूर्व — धर्मविशेष
अङ्गापूर्व — धर्मविशेष | उत्पवन — ऊपर फेकना
अपौरुषेय — धर्मविशेष | उद्भिद् — पशुपोषक यागविशेष
अर्थवाद — प्रशंसापरक वाक्य (फलश्रुति) | उपभृत् — यज्ञपात्रविशेष
अमूर्त्त — निराकार | उलप -- तृणविशेष
अश्वाभिधानी — घोड़े की लगाम रस्सी | औपवसथ्य — यज्ञारम्भदिनकृत्य विशेष
अभिक्रमण — भ्रमण | कपाल — यज्ञकाष्ठपात्रविशेष
अवत्त — खण्डित | कलञ्ज — विषाक्तबाणहतपशुमांसविशेष
अभिषेचनीय — सोमयागविशेष | गार्हपत्य — अग्नि विशेष
अवभृथ — यज्ञान्त दिनकृत्य विशेष | चमस — सोमरस
अग्नीषोमीय — यज्ञारम्भ दिनविहित | चित्रा — यागविशेष
पशुविशेष | जुहू — अर्धचन्द्राकृति यज्ञपात्र विशेष
अक्ष — पाशा ( चौपड़ ) | दर्श — अमावास्या
अभिघारण — द्रवितघृतसेचन | देवन — जूआ
अनुयाज — यागविशेष | नियोजन — यूपबन्धन
आर्थीभावना — पुरुषनिष्ठ प्रवृत्तिरूप | निर्वाप — प्रक्षेप
व्यापार | निर्वापन — काटना
आहवनीय — यज्ञीय अग्निविशेष | पर्णता — पलाश
अनुवाक्या — यज्ञीय अग्निविशेष | पुरोडाश — चरु ( हवि विशेष )
आम्रन — यागविशेष | प्रकृतियाग — साङ्गोपाङ्गविहितयाग विशेष
आनुबन्ध्य — यज्ञान्तविहित पशुविशेष | प्रयाज — समिधयागविशेष
आश्विनग्रह — सोमरसग्रहण | प्राजापत्य — पशुयागविशेष
इतिकर्तव्यता — कार्य करने का प्रकार | फलापूर्व — धर्मविशेष
( २ )
बर्हिष्—कुश | षोडशी—यज्ञविशेष
भ्रातृव्य—शत्रु | सदन—स्थान
यवागू—हलुआ | संदंश—संडशी के सदृश मंत्रद्वयमध्य
याज्या—मंत्र विशेष | पठित मंत्र विशेष
रथकार—नीच शूद्र विशेष | सवनीय—यज्ञमध्यविहित पशुविशेष
रशना—घोड़े की लगाम ( रस्सी ) | समाख्या—योगशक्ति
लिङ्ग—रूढिशक्ति | समुदायापूर्व—धर्मविशेष
वाजपेय { पानयोग्य सुराविशेष | सद्यस्क—सोम यागविशेष
{ तत्साध्य यागविशेष | साधन—उपाय ( हेतु )
| साध्य—उद्देश्य ( प्रयोजन )
त्रिकृतियाग—कतिपय अङ्गरहित याग | सान्नाय्य—ऐन्द्र याग
विशेष | सुत्या—सोमरसनिच्योतनकाल
शाब्दीभावना—शब्दनिष्ठप्रवर्तन | सोम { अमरलता-रसविशेष-
व्यापारविशेष | { तत्साध्य-यागविशेष
श्येनाभिचार—वाजपक्षिखननसाध्य- | सौत्य—यज्ञमध्यदिन-कृत्यविशेष
याग विशेष | स्योन—समीचीन
श्रुति—प्रमाणान्तरनिरपेक्ष शब्दविशेष | स्वर्ग—सुख विशेष