अर्थसंग्रह (लौगाक्षि भास्कर - पूर्वमीमांसा न्याय एवं धर्म-मीमांसा सटीक)
Arthasangraha of Laugakshi Bhaskara with Hindi Commentary
लौगाक्षि भास्कर द्वारा
दीपिकाटीकासहितः । ७५
नहीं दिखाई देता है अतः अर्थवाद वाक्यका भी कोई प्रयोजन नहीं है ऐसी
शंका नहीं कर सकते हैं क्योंकि आलस्यादिसे जो व्यक्ति यागमें प्रवृत्ति नहीं
होते हैं उनको कर्म प्राशस्त्य बोधन द्वारा यज्ञादिमें प्रवृत्त कराता है अतः अर्थवाद
वाक्य सार्थक है ।
अर्थवादस्य भेदत्रयम् ।
स पुनस्त्रेधा । तदुक्तम्—'विरोधे गुणवादः स्यादनुवादोऽवधारिते ।
भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मतः' इति । अस्यार्थः-प्रमाणान्तरविरोधे
सत्यर्थवादो गुणवादः, यथा 'आदित्यो यूप' इत्यादिः । यूप आदित्याभेद-
स्य प्रत्यक्षबाधितत्वाद्रादित्यवदुज्ज्वलत्वरूपगुणोऽनेन लक्षणया प्रतिपाद्यते ।
प्रमाणान्तरावगतार्थबोधकोऽर्थवादोऽनुवादः, यथा 'अग्निर्हिमस्य भेषज-
मि'ति, अत्र हिमविरोधित्वस्याग्नौ प्रत्यक्षावगतत्वात् । प्रमाणान्तरविरोध-
तत्प्राप्तिरहितार्थबोधकोऽर्थवादो भूतार्थवादः, 'यथा इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदय-
च्छ'दित्यादिः ।
अर्थवादके और तीन भेद हैं । गुणवाद, अनुवाद और भूतार्थवाद । उन्हीं
में प्रमाणभूत वृद्धका वचन बतलाते हैं—'विरोधे गुणवाद' इत्यादि । उनमें प्रत्येक
का क्रमशः लक्षण करते हैं—प्रमाणान्तर से विरोध रहने पर जो अर्थवाद है उसे
गुणवाद कहते हैं । जैसे 'आदित्यो यूपः' यहां पर यूप में आदित्य का अभेद
प्रत्यक्ष प्रमाणसे बाधित है अतः इस वाक्यसे शुक्लरूप गुण लक्षणासे समझा
जाता है अर्थात् उजला यूप । प्रमाणान्तरसे अवगत अर्थका बोधक जो अर्थ-
वाद है उसे अनुवाद कहते हैं । जैसे 'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' यहां प्रत्यक्ष प्रमाण
से 'हिमका औषध अग्नि है' ऐसा अवगत ही है अतः यह अनुवाद है । जहां
पर प्रमाणान्तर विरोध रहित और प्रमाणान्तर प्राप्ति रहित अर्थका बोधक अर्थ-
वाद हो उसे भूतार्थवाद कहते हैं जैसे—'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत्' यहां पर
वृत्रके प्रति इन्द्रवज्रोद्यमनका निषेध अथवा वज्र उद्यमन किसीसे बोधित नहीं
है अतः यह भूतार्थवाद है ।
ग्रन्थोपसंहारः ।
एवं च 'यजेत स्वर्गकाम' इत्यादिनिखिलवेदस्य साक्षात्परम्परया वा
यागादिधर्मप्रतिपादकत्वं सिद्धम् । सोऽयं धर्मो यदुद्दिश्य विहितस्तदुद्देशेन
७६ अर्थसंग्रहः—
क्रियमाणस्तद्धेतुः। ईश्वरार्पणबुद्ध्या क्रियमाणस्तु निःश्रेयसहेतुः। न च
तदर्पणबुद्ध्यनुष्ठाने प्रमाणाभावः 'यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि
यत्। यत्तपस्यसि कौन्तेय तत्कुरुष्व मदर्पणम्'ति भगवद्गीतास्मृतेरेव प्रमा-
णत्वात्। स्मृतिचरणे तत्प्रामाण्यस्य श्रुतिमूलकत्वेन व्यवस्थापनादिति
शिवम् ॥
बालानां सुखबोधाय भास्करेण सुमेधसा।
रचितोऽयं समासेन जैमिनीयार्थसंग्रहः ॥ १ ॥
इति श्रीमहामहोपाध्याय लौगाक्षिभास्करविरचितपूर्वमीमांसार्थ-
संग्रहनामकं प्रकरणं समाप्तिम्गात् ॥
इस तरहसे 'यजेत स्वर्गकामः' इत्यादि सब वेद कोई साक्षात् और कोई
परम्परया यागादि रूप धर्मका प्रतिपादक है यह सिद्ध हुआ। यह यागादि रूप
धर्म जिस उद्देश्यसे विहित है उस उद्देश्यसे करने पर वह फल अवश्य
मिलता है। ईश्वरार्पण बुद्धिसे याग करने पर मोक्ष मिलता है। ईश्वरार्पण बुद्धिसे
अनुष्ठान करनेमें कोई प्रमाण नहीं है यह नहीं कह सकते हैं क्योंकि 'यत्क-
रोषि' इत्यादि स्मृति ही प्रमाण है। स्मृति वेदमूलक है अतः स्मृति भी प्रमाण है।
श्री लौगाक्षिभास्करने बालकोंको अनायाससे बोध हो इसलिए संक्षेपमें
यह मीमांसाका अर्थसंग्रह नामक ग्रन्थ बनाया ॥ १ ॥
जयतु श्रीरामः
समाप्तश्चायं ग्रन्थः।
पारिभाषिक शब्दों के अर्थों का संकलन
अपूर्व — अदृष्ट ( धर्मविशेष ) | उत्पत्त्यपूर्व — धर्मविशेष
अङ्गापूर्व — धर्मविशेष | उत्पवन — ऊपर फेकना
अपौरुषेय — धर्मविशेष | उद्भिद् — पशुपोषक यागविशेष
अर्थवाद — प्रशंसापरक वाक्य (फलश्रुति) | उपभृत् — यज्ञपात्रविशेष
अमूर्त्त — निराकार | उलप -- तृणविशेष
अश्वाभिधानी — घोड़े की लगाम रस्सी | औपवसथ्य — यज्ञारम्भदिनकृत्य विशेष
अभिक्रमण — भ्रमण | कपाल — यज्ञकाष्ठपात्रविशेष
अवत्त — खण्डित | कलञ्ज — विषाक्तबाणहतपशुमांसविशेष
अभिषेचनीय — सोमयागविशेष | गार्हपत्य — अग्नि विशेष
अवभृथ — यज्ञान्त दिनकृत्य विशेष | चमस — सोमरस
अग्नीषोमीय — यज्ञारम्भ दिनविहित | चित्रा — यागविशेष
पशुविशेष | जुहू — अर्धचन्द्राकृति यज्ञपात्र विशेष
अक्ष — पाशा ( चौपड़ ) | दर्श — अमावास्या
अभिघारण — द्रवितघृतसेचन | देवन — जूआ
अनुयाज — यागविशेष | नियोजन — यूपबन्धन
आर्थीभावना — पुरुषनिष्ठ प्रवृत्तिरूप | निर्वाप — प्रक्षेप
व्यापार | निर्वापन — काटना
आहवनीय — यज्ञीय अग्निविशेष | पर्णता — पलाश
अनुवाक्या — यज्ञीय अग्निविशेष | पुरोडाश — चरु ( हवि विशेष )
आम्रन — यागविशेष | प्रकृतियाग — साङ्गोपाङ्गविहितयाग विशेष
आनुबन्ध्य — यज्ञान्तविहित पशुविशेष | प्रयाज — समिधयागविशेष
आश्विनग्रह — सोमरसग्रहण | प्राजापत्य — पशुयागविशेष
इतिकर्तव्यता — कार्य करने का प्रकार | फलापूर्व — धर्मविशेष
( २ )
बर्हिष्—कुश | षोडशी—यज्ञविशेष
भ्रातृव्य—शत्रु | सदन—स्थान
यवागू—हलुआ | संदंश—संडशी के सदृश मंत्रद्वयमध्य
याज्या—मंत्र विशेष | पठित मंत्र विशेष
रथकार—नीच शूद्र विशेष | सवनीय—यज्ञमध्यविहित पशुविशेष
रशना—घोड़े की लगाम ( रस्सी ) | समाख्या—योगशक्ति
लिङ्ग—रूढिशक्ति | समुदायापूर्व—धर्मविशेष
वाजपेय { पानयोग्य सुराविशेष | सद्यस्क—सोम यागविशेष
{ तत्साध्य यागविशेष | साधन—उपाय ( हेतु )
| साध्य—उद्देश्य ( प्रयोजन )
त्रिकृतियाग—कतिपय अङ्गरहित याग | सान्नाय्य—ऐन्द्र याग
विशेष | सुत्या—सोमरसनिच्योतनकाल
शाब्दीभावना—शब्दनिष्ठप्रवर्तन | सोम { अमरलता-रसविशेष-
व्यापारविशेष | { तत्साध्य-यागविशेष
श्येनाभिचार—वाजपक्षिखननसाध्य- | सौत्य—यज्ञमध्यदिन-कृत्यविशेष
याग विशेष | स्योन—समीचीन
श्रुति—प्रमाणान्तरनिरपेक्ष शब्दविशेष | स्वर्ग—सुख विशेष