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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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पृष्ठ 95

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (८९)
सं. टी. एवमभ्यसतः फलमाह ततइति साधनान्नि-
र्मुक्तः साधनाभ्यासरहित इत्यर्थः एतस्य योगिनः तद्वे-
दांतप्रसिद्धं स्वरूपं ब्रह्मैवेतिभावः ॥ १२६ ॥
भा. टी. पूर्व कहे हुए योगाभ्यास करनेसे पुरुष सिद्ध
होयहै सम्पूर्ण प्रकारके साधनोंसे छूटजायहै और योगियोंका
राजा होय है उस ब्रह्मका स्वरूप योगियोंके मन वाणीकाभी
विषय नहीं है ॥ १२६ ॥
समाधौक्रियमाणेतु विघ्नआयांतिवै
बलात् ॥ अनुसंधानराहित्यमालस्यं
भोगलालसम् ॥ १२७ ॥ लयस्तमश्च
विक्षेपो रसास्वादश्चशून्यता॥ एवंयद्वि-
घ्नबाहुल्यं त्याज्यंब्रह्मविदाशनैः॥१२८॥
सं. टी. अखंडैकरसब्रह्मस्वरूपत्वेनावस्थानलक्षण-
मोक्षफलदोऽयंसमाधिपर्यंतो योगो गुर्व्वनुग्रहवतांसुक-
रोस्ति तथापि सुकर इत्यनादरो न कार्यः विघ्नबाहुल्य-
संभवादित्याह द्वाभ्यां समाधाविति स्पष्टोऽर्थः ॥ १२७ ॥
लयइति तत्रलयो निद्रा तमः कार्याकार्याऽविवेकः वि-
क्षेपो विषयस्फुरणं रसास्वादो धन्योहमित्याद्यानंदा-
कारवृत्तिः चपुनः शून्यता चित्तदोषः रागद्वेषादितीव्र-