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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 84, कुल 109 में से

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पृष्ठ 84

( ७८ ) अपरोक्षानुभूतिः।
भा. टी. जिसको वाणी और मन नहीं प्राप्त होसके हैं
और योगी लोगोंको लब्धहोय है ऐसे परब्रह्मकाही नाम मौन
है पण्डित जन तिस ब्रह्मका मैं ब्रह्महूं इस प्रकार अनुस-
न्धान करे ॥ १०७ ॥
वाचो यस्मान्निवर्त्तंते तद्वक्तुंकेनशक्य-
ते ॥ प्रपंचो यदि वक्तव्यः सोपिश-
ब्दविवर्जितः ॥ १०८ ॥ इतिवातद्भवे-
न्मौनं सतांसहजसंज्ञितम् ॥ गिरामौ-
नंतुबालानां प्रयुक्तंब्रह्मवादिभिः ॥१०९॥
सं. टी. नन्विदं प्रत्यगभिन्नब्रह्मानुसंधानं ध्यानरूपं
चतुर्दशमंगं प्रतीयते इत्याशंक्य स्वारस्यात्प्रकारांतरे-
ण मौनमेव लक्षयति सार्द्धेन वाचइति अयम्भावः शब्दप्र-
वृत्तिनिमित्ताभावाद्ब्रह्म यथावागविषयं तथानामरूप-
जात्यादिप्रपंचोपि सदसदादिविकल्पासद्दत्वाद्वागतीतः
॥ १०८ ॥ इतीति इत्युक्तप्रकारेण ब्रह्मजगतोर्विवा-
दत्यागरूपंवा तन्मौनं भवेत् केषामित्याकांक्षायां सतां
चेदं प्रसिद्धमित्याह सतामिति सत्पुरुषाणां सहजस्थि-
तिनाम्ना प्रसिद्धमित्यर्थः । ननु वाङ्नियमनमेव प्रसिद्धं
मौनमितिचेदतआहार्द्धेन गिरेति ॥ १०९ ॥
भा. टी. जिसको वाणी नहीं प्राप्त होय उसकी वर्णना
कौन करसके है अर्थात् कोई नहीं यदिः प्रपञ्चकी वर्णना