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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

पृष्ठ 63, कुल 109 में से

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पृष्ठ 63

संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (५७)
देहव्यतिरिक्तात्मबोधार्थं विवेकिनस्तु व्यर्थ एवेति सह-
दृष्टांतमाह यथेति तत्राऽबुधैरित्यऽकारप्रश्लेषे मुधैवार्कियते
अपि तु नेति काकुव्याख्यानम् अन्यत्सर्वं सुगमम्॥६९॥
भा. टी. यदि आत्मा सदा निष्प्रपञ्च भासमान होयहै तब
आत्मा और देहका भेद क्यों कर दिखायाहै । ऐसी शंका
होनेपर कहें हैं । जैसे कुम्भ मृत्तिकामय होयहै तिसीप्रकार
देह चैतन्यस्वरूप आत्ममय होयहै इसीकारण ज्ञानी पुरुषको
तौ आत्मा और देहका भेद मिथ्याहै ॥ ६९ ॥
सर्पत्वेनयथारज्जूरजतत्वेनशुक्तिका॥
विनिर्णीताविमूढेन देहत्वेनतथात्मता७०॥
सं. टी. इदानीमविवेकिनः कल्पितदेहेतादात्म्यं स-
दृष्टांतमाह सर्पत्वेनेति ॥ ७० ॥
भा. टी. जिसप्रकार अज्ञानी पुरुष रज्जुको सर्प मानलेयहै
और सीपीको चांदी मानलेयहै इसीप्रकार आत्माको देह अ-
ज्ञानीकी कल्पनारूप निर्णय करै है ॥ ७० ॥
घटत्वेनयथापृथ्वी पटत्वेनैवतंतवः ॥
विनिर्णीता विमूढेन देहत्वेन तथात्म-
ता ॥ ७१ ॥
सं. टी. घटत्वेनेति ॥ ७१ ॥
भा. टी. जैसे अज्ञानी पुरुष मृत्तिकाको घट मानैहै और