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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( ५५ )
केन मृत्पिण्डेन सर्वं मृन्मयं विज्ञातं स्यात्" इत्यादिश्रुतिः
युक्तिस्तु कार्यकारणयोरन्यत्वे एककारणज्ञानात्सर्व-
कार्यज्ञानं न स्यादित्यादि । सुगममन्यत् ॥ ६६ ॥
भा. टी. जैसे सदा घट और मृत्तिकाका कार्य्यकारण
भाव देखनेमें आवैहै तिसी प्रकार श्रुतियोंसे और युक्तियोंसे
प्रपञ्च अर्थात् जगत् और ब्रह्मका कार्य्य कारण भाव
जाना जायहै ॥ ६६ ॥
गृह्यमाणेघटेयद्वन्मृत्तिकायातिवैबला-
त् ॥ वीक्ष्यमाणेप्रपंचेपि ब्रह्मैवाभाति
भासुरम् ॥ ६७ ॥
सं. टी. कार्यकारणयोरनन्यत्वमेव दृष्टांतेन स्पष्टयति
गृह्यमाण इति भासुरं प्रमाणनिरपेक्षतयैव भासन-
शीलं स्पष्टमन्यत् ॥ ६७ ॥
भा. टी. जैसे घटके विषयमें विचार करते करते अन्तमें
मृत्तिकाही निश्चय होयहै इसीप्रकार इस संसारके विषयमें
विचार करते करते बिना प्रमाणोंके प्रकाशवान् ब्रह्मही
प्रतति होय है ॥ ६७ ॥
सदैवात्मा विशुद्धोऽस्ति ह्यशुद्धो भाति
वै सदा ॥ यथैव द्विविधारज्जुर्ज्ञानिनो
ऽज्ञानिनोऽनिशम् ॥ ६८ ॥
सं. टी. ननु ब्रह्मणि भासमाने प्रपंचो न भासेतेत्या