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सर्वकोश
अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । (५३)
पात्ररूपेण ताम्रं हि ब्रह्मांडौघैस्तथा-
त्मता ॥ ६३ ॥
सं. टी. यथा तरंगेति सुगमम् ॥ ६३ ॥
भा. टी. जिसप्रकार जलही तरङ्गरूप देखनेमें आवैहै
और ताम्रही पात्राकार देखनेमें आवैहै इसीप्रकार आत्माही
ब्रह्माण्डाकार होकर दृष्टिगोचर होयहै ॥ ६३ ॥
घटनाम्नायथा पृथ्वी पटनाम्नाहि तं-
तवः॥जगन्नाम्नाचिदाभाति ज्ञेयं तत्तद
भावतः ॥ ६४ ॥
सं. टी. किंच घटेति तत्र पादत्रयं स्पष्टं ननु किम-
नेन मिथ्यात्ववासनादाढर्येनेत्यत आह ज्ञेयमिति तद्-
भावतो नामाभावतस्तद्ब्रह्म ज्ञेयम् “वाचारंभणं विकारो
नामधेयं मृत्तिकेत्येव सत्यम्” इत्यादिश्रुतेः ॥ ६४ ॥
भा. टी. जैसे संसार मृत्तिका घटनाम करके प्रसिद्ध होय
है और तन्तु पटनाम करकै प्रसिद्ध होयहै इसीप्रकार जीव
नाम करकै संसारमें चिद्रूप आत्मा प्रसिद्ध होयहै सो मिथ्या
है क्योंकि संसारके व्यवहारके वास्ते नाम संकेत मात्र
होयहै ॥ ६४ ॥
सर्वोपि व्यवहारस्तु ब्रह्मणा क्रियते ज-
नैः ॥ अज्ञानान्न विजानंति मृदेव हिघ
टादिकम् ॥ ६५ ॥