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अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

अपरोक्षानुभूति (दीपिका व हिन्दी टीका सहित)

Aparokshanubhuti with Dipika & Hindi Commentary

आदि शङ्कराचार्य द्वारा

स्रोत: खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · खेमराज श्रीकृष्णदास / गीताप्रेस · 1940 (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished109 पृष्ठ

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संस्कृतटीका-भाषाटीकासहिता । ( २१ )
प्राकाश्यगुणदोषसंबंधशून्यइत्यर्थः“असंगोह्ययं पुरुषः”
इतिश्रुतेः देहस्तु तामसो घटादिवत्प्रकाश्यत्वेन जडः
तयोरैक्यामत्यदि पूर्ववत् ॥ २० ॥
भा. टी. आत्मा सबका प्रकाशक ज्योतिःस्वरूपहै और
स्वच्छ है ( अर्थात जिसमें रजोगुण सतोगुण तमोगुणरूप
सृष्टि मरु मरीचिका की तरह मालूम होय वास्तवमें आत्मा
निर्मलहै ) और देह सदा तमोगुण करके युक्त रहेहै तबभी
संसारी पुरुष देह आत्माकी समता कर व्यवहार करें हैं
इससे अधिक और क्या अज्ञान होगा ॥ २० ॥
आत्मा नित्यो हि सद्रूपो देहोऽनि-
त्योह्यसन्मयः ॥ तयोरैक्यं प्रपश्य-
न्ति किमज्ञानमतःपरम् ॥ २१ ॥
सं. टी. अत्र सर्वत्रपौनरुक्त्यंनाशंकनीयमात्मनोऽलौ-
किकत्वेनात्यंतदुर्बोधत्वादेव बहुधा वैलक्षण्यं प्रदर्श्यते
परमकारुणिकैः श्रीमदाचार्यैः आत्मेति आत्मा नित्यो
ध्वंसाप्रतियोगी तत्रहेतुः हि यस्मात्सद्रूपः अबाध्यस्व-
रूपःदेहस्तु ध्वंसप्रतियोगी अत्रापि हेतुः हियस्मादसन्म-
योऽनित्यः विकारित्वेन बाध्ययोग्यइत्यर्थः यस्मादेवमा-
त्मदेहयोरत्यंतवैलक्षण्यं तस्मात्तयोरैक्यदर्शनं केवल-
मज्ञानमिति ॥ २१ ॥

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