अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
सूत्र-८१ 481
कलश की शोभा की जाए। महामण्डलेश्वरों के छत्रों पर मोरपट्टों की शर्करी अर्थात्
सजावट की जानी चाहिए।
चामरालङ्कारयुक्तं महाराजेश्वरं विदुः ।
इत्येवमुक्तामाला च राज्ञोऽलङ्कारशोभना ॥ ३८ ॥
महाराजाओं के छत्रों के साथ चामरों के भी अलङ्करण हों और ऐसे
महाराजेश्वरों को मोतियों की मालाओं के अलङ्कार या गहने धारण करके
शोभायमान होना चाहिए।
लक्ष्मीश्च रमते नित्यं तथा सा चक्रपाणिना ।
तपसार्थयता येन प्रतापकीर्त्तिवर्द्धनम् ॥ ३९ ॥
ऐसे चक्रपाणि राजाओं के राज्य में नित्य ही लक्ष्मी का वास होता है और
लक्ष्मी के रमते रहने से उनके सभी तपों की सार्थकता प्रकट होती है। उनके प्रताप,
कीर्ति का भी नित्य वर्द्धन होता रहता है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्त्तिप्रकाशप्रोक्तृ श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
राजालयसिंहासनछत्रप्रमाणाधिकारोनामैकाशीतितमं सूत्रम् ॥ 81 ॥¹
- जोधपुर भेदपाठः- सामन्तसञ्ज्ञकं नाम ग्रामस्यायुता द्वयम्। अष्ट चत्वारिंशत्करं तद्भवनं कुर्यात्
शोभनम् ॥ 8 ॥ अयुतार्द्धग्रामाणां च यश्च लघुसामन्तकः। कराष्ट त्रिंशद्ध्यक्तं च तद्भवनं अर्थ कामदम् ॥
9 ॥ सहस्त्रैकं तु ग्रामाणां सभवेच्चतुराशिकः। अष्टाविंश करं कुर्यात् वेश्मशान्ति प्रदं सदा ॥ 10 ॥ विंश
ग्रामे यदा भुक्ती ग्रामं तु दशपञ्चकम्। ग्रामे यत्रमेकं तु भुक्ती पर्याय संस्थितम् ॥ 11 ॥ शतमेकं तु ग्रामाणां
शल्यराष्ट्रसु सञ्ज्ञकम्। अष्टादश करं वेश्म कर्तव्यं सर्व कामदम् ॥ 12 ॥ करमष्टादशमध्यस्थ कर्त्तव्यं
कर्त्तव्यंतु क्रमेण तु। सोपान पंक्ति पर्यायः कथितं त्वपराजितम् ॥ 13 ॥ राजालयं तु यन्मानं तदर्द्धं
दण्डनायकम्। दण्डार्द्ध मन्त्र संस्थानं मन्त्र्यद्धं द्वारपालकम् ॥ 14 ॥ तत्समं त्रौ हितं ज्ञेयं तदर्द्ध जन
सङ्कुलम्। अनुक्रमेमिदं सर्वं ज्येष्ठ-मध्यम-कनिष्ठकम् ॥ 15 ॥ अष्टहस्तेत्वेकभूमिं द्विभूमं अष्टदशतु। त्रिभूमं
अष्टविंशत्यं अष्टत्रिंशैर्वेदभूमकम् ॥ 16 ॥ अष्ट चत्वारिशे भूपञ्चषड्भूम्याष्ट पञ्चाशकम्। अष्टषष्ट्यासप्तभौमं
अष्ट भूम्याष्टसप्ततिः ॥ 17 ॥ अष्टाशीतिनवभूमं च दशभूऽष्टनव्योत्तलम्। भूमैकादशभद्रां ते अष्टोत्तरशत
हस्तकम् ॥ 18 ॥ सिंहद्वारानुक्रमं च कथये त्वपराजित। उत्तरे च त्रयद्वारं कर्त्तव्यं चक्रवर्त्तिभिः ॥ 19 ॥
उत्तमंदश पञ्चाशत्करैर्मध्यम च त्रयोदशं। कनिष्ठं भद्रहस्तं तु उच्छ्रायेणतु योजितम् ॥ 20 ॥ सिंहद्वारमिदं
मानं चक्रवर्त्तित्वयोदिताः। महाराष्ट्रेश्वरे राज्ञैः महामण्डलेश्वरः ॥ 21 ॥ अनन्तरं कथयिष्यामि सिंहद्वारं यथाक्र
मम् ॥ 22 ॥ मध्यमोत्तम चक्रवर्त्तिश्च कनिष्ठं मण्डलेश्वरः। अष्टरं कथयिष्यामिसिंहद्वार यथाक्रमम् ॥ 23 ॥
द्वारयुग्मं तु कर्तव्यं महासामन्तदायकम्। अन्येषां स्वल्पं राजानां ये स्थितामात्य सञ्जका। तेषां च तोरणं
दद्यात् सिंहद्वार विवर्जित ॥ 24 ॥ सिंहायुग्मार्द्धेन कुर्यात् पत्रमाला त्रयोत्तमा। विप्राद्याक्षत्रियायुक्ता
वैश्ययुग्ममालास्थिता ॥ 25 ॥ एकमाला तु शूद्राणां स्तम्भो द्विवशोच्छ्रिताः। स्तम्भैर्विंनोच्छ्रितो वंशा
प्रकृतीनां तु सर्वतः ॥ 26 ॥ तोरणं कथितं वत्स आसनं शृणु साम्प्रतम्। आसनं कथयिष्यामि दिव्यमानेन
सुव्रत ॥ 27 ॥ महाराजादि सूचितं त्रिविधं च सिद्धासनम् ॥ 28 ॥ भद्रासनं महाराज्ञे विलासैः पद्यसञ्ज्ञक।
विकासतरिका तु सामन्तैः चातुरी मन्त्रिमण्डलम् ॥ 29 ॥ अन्येषां स्वल्प राजानां दातव्यं तु मस्तूरकम्।
482 अपराजितपृच्छा
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में राजालय,
सिंहासन, छत्र प्रमाण अधिकार नामक इक्यासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 81 ॥
राजभुवनं द्व्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 82 ॥
विश्वकर्मोवाच –
चतुरश्रीकृते क्षेत्र भजेत्षोडश₁₆ भागिकम् ।
पदसङ्ख्यामितिः ख्याता षट्पञ्चाशच्छतद्वयम्₂₅₆ ॥ 1 ॥
(चूड़ामणि महाकूट वास्तु के प्रयोजनार्थ) श्री विश्वकर्मा कहने लगे कि चौरस
समतल किए गए क्षेत्र को सोलह भागों में विभाजित करें। इस तरह इनसे बनने
वाले पदों की संख्या 16 × 16 = 256 होगी।
ब्रह्माऽऽस्ते गर्भमावृत्य षट्त्रिंशत्पदकोष्ठकैः₃₆ ।
रुद्र₁₁ सङ्ख्यापदैर्युक्ता एकैके अर्यमादयः ॥ 2 ॥
इसमें ब्रह्मा का स्थान गर्भ को घेरकर छत्तीस पद कोष्ठकों वाला होगा।
अर्यमादि एक-एक देव रुद्रसंख्या में अर्थात् ग्यारह पदों में न्यसित करें।
चतुष्पदाष्टकर्णेषु द्वात्रिंशत्पदकल्पिताः₃₂ ।
बाह्यकर्णे तथा चाष्ट द्विपदा भक्तितो मताः ॥ 3 ॥
इसके आठों कोनों पर चार-चार पद कोष्ठकों से बत्तीस कोष्ठक कल्पित किए
जाते हैं (अर्थात् 8 × 4 = 32)। बाहरी कोनों पर बने आठ पदों को दो भागों में
विभक्त करने चाहिए।
अष्टावष्टपदा ज्ञेयाः शेषास्तु चतुरंशकाः ।
जयः सत्योऽथ वितथो गन्धर्वसुग्रीवासुराः ॥ 4 ॥
मुख्यश्चैव गिरिःख्यातः प्रत्येकं चाऽष्टपादकाः ।
गदिकापदगर्दी च सर्वेषां जनमण्डलम् ॥ 30 ॥ आसनं सन्थ सञ्ज्ञं तु शयनं सुखमुत्तमम्। यानं सुखासनं
प्रोक्तं यानं रथ समुच्यते ॥ 31 ॥ यानं महागर्ज पृष्टे यानं बिम्बादिसारयोः । गजष्टेतु भयविधं सन्धान
सञ्ज्ञकम् ॥ 32 ॥ व्यापान्रूपैर्विधिं शिखि कलापोद्भवम् । पुनएव तेध रूपाणि पताका छत्र मण्डलम् ॥ 33 ॥
चतुरशीत्यंगुल व्यासं छत्रवृतं उत्तमोत्तमम्। मध्यमं द्विसप्तसत्या षष्ठ्ययङ्गुल् कनिष्टकम् ॥ 34 ॥ शतादुर्द्धे
प्रसाद दाने शेषां प्रावृद्सु छत्रिकाः। छत्राभिकल्लीयुक़्तां षोडशाङ्गुल प्रतिष्ठां तालविनाः ॥ 35 ॥
कनकजदण्डोर्ध्व कलशं युग्म छत्रं तु भूपति। महामण्डलेश्वर कुर्यात् शिखिकलापोशर्करी ॥ 36 ॥
चामरालङ्कारयुक्तापि महाराजेश्वरं विदुः । इत्येवं क्रमाद्यो च राजालङ्कारशोभनम् ॥ 37 ॥ लक्ष्मीश्चरते नित्यं
यथा सा चक्रपाणिना। तपः समर्थ यते येन प्रतापकीर्तिवर्द्धनम् ॥ 38 ॥ (पाण्डुलिप्यात्) ।
सूत्र-८२ 483
चूडामणिर्महाकूटो वास्तु राजालयार्थकम् ॥ ५ ॥
इति चूडामणिमहाकूटवास्तुः।
ये आठ-आठ पद कहे गए हैं और शेष जो बचे, वे चतुर्थांश कहे गए है—
(1.) जय, (2.) सत्य, (3.) वितथ, (4.) गन्धर्व, (5.) सुग्रीव, (6.) असुर,
(7.) मुख्य और (8.) गिरि नाम के सभी प्रत्येक आठ पद कोष्ठकों के होते हैं।
इस प्रकार से राजालयों, राजमहलों के लिए चूड़ामणि महाकूट वास्तु बनता है।
शयनभाण्डागारवारीगृहादीनां —
वेश्ममध्यं ब्रह्मस्थानं शयनं च विवस्वतः।
भाण्डागारं क्षितिधरे मैत्रे वै वारिमन्दिरम् ॥ ६ ॥
अर्यम्णि सुरसौधं च कर्णान्तर्गुह्यवेश्मकम्।
आग्नेय्यामनलस्यैवं नैर्ऋत्यां वस्त्रसङ्ग्रहः ॥ ७ ॥
उक्त प्रकार से पद न्यास कर ब्रह्मस्थान के चार पद कोष्ठकों के मध्य के
दक्षिण- विवस्वत भाग में शयन स्थान बनाएँ। क्षितिधर और मैत्रेय के पदस्थान पर
भण्डार और जलमन्दिर बनाएँ। अर्यमा के स्थान पर देवता का गृह-सुरसौध बनाएँ
तथा कोनों पर अन्तर गुह्यगृह कोठार बनाएँ। आग्नेय भाग में, वायु भाग में और
नैर्ऋत्य भाग में वस्त्र संग्रह के भण्डार बनाए जाने चाहिए।
वायव्येचाऽष्टधातूनामीशाने शिवभाण्डकम् ।
मध्यकर्णे इमे प्रोक्ता बाह्वांश्च शृणु साम्प्रतम् ॥ ८ ॥
इसी तरह वायव्य में अष्टधातु के भाण्ड और ईशान में शिवभाण्ड रखने के
भण्डार बनाएँ। अब तक तो ये सब मध्य कर्ण में करने के कार्य बताए, आगे बाह्य
भाग में करने के कार्यों के बारे में सुनो।
अर्चनागृहमहासनकोष्ठागारशस्त्रागारमाह —
ईशाने चाऽर्चनावेश्म आग्नेय्यां च महानसम्।
कोष्ठागारं तु वायव्ये नैर्ऋत्ये शस्त्रमण्डपम् ॥ ९॥
ईशान कोण में अर्चनावेश्म अर्थात् देवपूजा-अर्चन का स्थान बनाएँ। आग्नेय
कोण में महानस अर्थात् बड़ा रसोईघर बनाएँ। वायव्य कोण में कोष्ठागार अर्थात्
बड़ा कोठार या समस्त सामग्रियों को रखने का स्थान बनाएँ। नैर्ऋत्य कोण के भाग
में शस्त्रागार रखने का शस्त्रमण्डप बनाया जाना चाहिए।
राजपदमकराक्षमाह —
याम्यस्थं वारुणस्थं च सौम्यस्थं चैव लक्षयेत्।
484 अपराजितपृच्छा
इदं स्थानं राजपदं कर्त्तव्यं शान्तिमिच्छता ॥ 10 ॥
यथोत्तरं मकराक्षं निर्गमे मकरान्वितम् ।
मत्तवरणछाद्यं च क्षेत्रपादैस्तु निर्गतम् ॥ 11 ॥
शान्ति के आकांक्षी को दक्षिण दिशा में, पश्चिम तथा उत्तर दिशा में कहीं भी
लक्ष्य करके या देखकर इन स्थानों में राजपद स्थान बनाना चाहिए। उत्तर दिशा की
ओर मकाराकृति युक्त निकले हुए मकराक्ष बनाए, जो क्षेत्र के पदों के बाहर की
ओर निकले हुए मत्तवारण युक्त छाजों से बने हों।
सभाष्टकानुसारेण पुष्पकसिंहासनमाह -
सभाष्टकयुक्तछन्देषु पूर्ववच्चाग्रनिर्गमः ।
वेद्युत्तरमुखं कार्यं पुष्पकं सिंहमासनम् ॥ 12 ॥
सुवर्णस्फटिकोपेतं नैकरत्नैर्विभूषितम् ।
पुष्पकं चतुःस्तम्भाढ्यं छाद्यघण्टाद्यलङ्कृतम् ॥ 13 ॥
सभाष्टक के युक्त छन्दों में पहले वर्णन किए गए तरीकों से बाहर की ओर
निर्गतम या निकले हुए ढंग में उत्तर दिशा की और मुख किए हुए वेदी बनाएँ और
उस पर पुष्पक नाम का सिंहासन लगाएँ, जो सोने और स्फटिक मणियों तथा
अनेकानेक रत्नों से विभूषित हो। पुष्पक सिंहासन के चारों स्तम्भाढ्य, विशाल स्तम्भ
भी छज्जों, चन्दोवों और घण्ट अर्थात् गुम्बजों से अलंकृत होने चाहिए।
हेमरत्नादिकोपेतं मुक्ताफलविभूषितम् ।
राजासनं मध्यपीठं कर्तव्यं शुभलक्षणम् ॥ 14 ॥
ऐसे सिंहासन के मध्य पीठ को सोने, रत्नों और मोतियों से विभूषित, शुभ
लक्षणों वाली राजासन से युक्त बनाना चाहिए।
दन्तिशालामाह -
सिंहद्वारं तु तस्याग्रे गजक्रीडा याम्योत्तरे।
सिंहद्वाराग्रतः कार्ये दन्तिशाले तथोभयोः ॥ 15 ॥
इस सभा के आगे सिंहद्वार अर्थात् बड़ी पोल बनानी चाहिए जिसके दायें-बायें
अर्थात् दक्षिण और उत्तर दोनों ओर गजक्रीड़ा के योग्य चौगान क्षेत्र बनाने चाहिए।
तदग्रे विजयद्वारं कर्णावुभौ च स्वाग्रतः ।
प्रतोल्या च तथोपेतं प्राकारैः परिवेष्टितम् ॥ 16 ॥
इसके लिए सिंहद्वार अर्थात् बड़ी पोल के आगे ही दोनों ओर दो दन्तिशालाएँ
(गजशाला. हाथियों के ठाण) बनाने चाहिए। इसके बाद, सभा मण्डप के चौक या
सूत्र-८३ 485
चौगान के उपरान्त, आगे की ओर दोनों कोनों पर और सामने के भाग में विजयद्वार
अर्थात् विजय पोल बनानी चाहिए जिनके बाहर प्रतोल्या स्तम्भ युक्त पोलें प्राकार
अर्थात् परकोटे से वेष्टित बनाई जाए।
राजवेश्मोभयपक्षे राज्ञीनां भवनादिकम्।
द्विभूमोच्छ्रयहीनानि शेषाणां क्रमयोगतः॥ 17 ॥
इसी प्रकार राजवेश्म अर्थात् राजा के रहने के राजमहल के दोनों पक्षों में, दोनों
ओर रानियों के भवनादि बनाने चाहिए। शेष अन्य सभी के भवन रानियों के भवनों
से दो मंजिल या द्वितल कम रखने चाहिए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
राजभुवनाधिकारो नाम द्व्यशीतितमं सूत्रम्॥ 82 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में राजभुवन
अधिकार नामक बयासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 82 ॥
एकत्रिपञ्चप्रतोली नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम्॥ 83 ॥
विश्वकर्मोवाच —
प्रतोलीश्च प्रवक्ष्यामि कनिष्ठ-मध्यमो-त्तमाः।
उच्छ्रयस्त्रिविधो वत्स द्वारां प्राकारतोऽपि च॥ 1 ॥
विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! अब मैं प्रतोली अर्थात् पोलों के बारे में कहता
हूँ। ये इनकी ऊँचाई के अनुसार और द्वारों के प्राकार अर्थात् परकोटे के अनुसार भी
तीन प्रकार की होती हैं— कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम।
प्रतोल्योच्छ्रयप्रमाणमाह —
प्रतोल्या द्वारउत्सेधः पञ्चदशकरैः₁₅ शुभः।
मध्यस्त्रयोदशकरैः₁₃ रुद्रहस्तैः₁₁ कनिष्ठकः॥ 2 ॥
इन प्रतोलियों में उत्तम प्रतोली के द्वार की ऊँचाई पन्द्रह गज की शुभ कही गई
है, मध्यम की तेरह गज और कनिष्ठ की ग्यारह गज की ऊँचाई शुभ है।
कनिष्ठमेकभूमं₁ च द्विभूमं₂ चैव मध्यमम्।
उत्तमं च त्रिभूमं₃ स्यात् त्रिधोदितक्रमागतम्॥ 3 ॥
इनमें कनिष्ठ पोल या प्रतोली एक मंजिला ही होती है परन्तु मध्यम जाति की
प्रतोली दो मंजिला होती है और उत्तम जाति की प्रतोली तो तीन मंजिला होती है।
इस तरह क्रम से ये तीन प्रकार की ऊँचाई युक्त बनाई जाती हैं।
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तत्रैव विस्तारमाह —
उत्तमं चाऽष्टहस्तैश्च₈ सप्तहस्तैश्च₇ मध्यमम्।
कनिष्ठं चैव षड्ढस्तैर्विस्तार₆स्त्रिविधो₃ मतः ॥ 4 ॥
इनमें उत्तम प्रतोली या पोल की चौड़ाई (विस्तार) आठ गज की, मध्यम
प्रतोली की चौड़ाई सात गज की और कनिष्ठ प्रतोली की चौड़ाई छह गज की होती
है। इस तरह इनकी चौड़ाई भी तीन प्रकार की बताई गई है।
नवहस्तोच्छ्रिता₉ स्तम्भाः कुम्भकैः सुसमन्विताः।
ऊर्ध्वमेक₁ द्वि₂ त्रिक्षणा₃ मालिकाश्च ह्यनुक्रमात् ॥ 5 ॥
नौ गज ऊँचाई के स्तम्भ कुम्भकों से युक्त हों और उनके ऊपर एक, दो अथवा
तीन क्षणामालिका अनुक्रम से बनाई जाए अर्थात् एक, दो या तीन अवसर, खाली
स्थान छोड़ते हुए मालिका अर्थात् माल अनुक्रम से बनाएँ।
मदलाःशीर्षस्तम्भिका निर्व्यूहे मदलाः पुनः।
स्वस्तिकाद्वयं शीर्षोर्ध्व निर्व्यूहे मदलाः पुनः ॥ 6 ॥
जैसे कि मदल स्तम्भ के शीर्ष पर बनाएँ और फिर निर्यूह (नेजू) बनाकर उन
पर पुनः मदल की रचना करें और उनके शीर्ष पर दो स्वस्तिक बनाकर निर्यूह
बनाए तथा उन पर पुनः मदल की रचना करनी चाहिए।
शीर्षोर्ध्वे च भवेत्पट्टः शाखाद्यं चोत्तराङ्गकम्।
तुला जयन्ती पीता सा ? निर्मलं कपिशीर्षकम् ॥ 7 ॥
इसके उपरान्त उसके शीर्ष के ऊपर छाबने का पाट धरें जो शाखा से लेकर
उत्तराङ्ग अर्थात् छाबना बनें, यह जयन्ती नामक तोरण तुला कहलाती है जो निर्मल
है और उसके ऊपर कँगूरे बने होते हैं।
तदूर्ध्वे च पुनर्भूमिंश्चतुर्द्वारं तृतीयके।
दृढार्गलाः कपाटाश्चाऽपवरकास्ततः परम् ॥ 8 ॥
इनके ऊपर पुनः तीसरी भूमि अर्थात् तीसरी मंजिल के चार द्वार बनाए जाए
जिनके दृढ़ किंवाड़ हों और उनके बन्द करने अर्गला-आगल लगाने की व्यवस्था
हो जिससे द्वार के किंवाड़ सुदृढ़ रूप से बन्द रहें तथा उसके परे भी दूसरे द्वार और
कपाट अपवरक— इस प्रकार दृढ़तर बनाएँ।
प्रतोलीचतुष्टये मुखद्वारमाह —
वक्त्रद्वाराणि वक्ष्यामि प्रतोलीनां चतुष्टयम्।
अनुक्रमेण कर्तव्यं कश्यापि यथावत ॥ 9 ॥
सूत्र-८३ 487
अब मैं प्रतोली चतुष्टय के मुख-द्वारों के बारे में क्रम से निर्माण-विधि संक्षेप
से कहता हूँ।
उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च हीनबाहुस्तथापरः।
प्रतिकाय इति प्रोक्तं प्रतोलीनां चतुष्टयम् ॥ 10 ॥
प्रतोली-चतुष्टय में एक द्वार उत्सङ्ग, दूसरा पूर्णबाहु, तीसरा हीनबाहु एवं चौथा
प्रतिकाय संज्ञक होता है।
उत्तरामुख उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च पूर्वतः।
अपरे हीनबाहुश्च प्रतिकायस्तु दक्षिणे ॥ 11 ॥
इसमें उत्तरामुखी द्वार उत्संग होता है, पूर्णबाहु पूर्व दिशा सम्मत, हीनबाहु
पश्चिमाभिमुख एवं प्रतिकाय दक्षिणाभिमुख होता है।
सृष्टिप्रवेश उत्सङ्गः प्रतिकायोऽपसव्यतः।
पूर्णबाहुः पूर्ववक्त्रो वामास्यो हीनबाहुकः ॥ 12 ॥
सृष्टि-प्रवेश (सृष्टिक्रम से) द्वार उत्सङ्ग कहा जाएगा, अपसव्य क्रम से
प्रतिकाय होगा अर्थात् दायीं ओर होगा। पूर्णबाहु पूर्वमुख होता है और हीनबाहुक
दक्षिणमुखी।¹
वामभागे दिशि दिशि वामावर्तोद्भवस्तु ये।
द्वारं च दक्षिणावर्तं कथितं त्वपराजित ॥ 13 ॥
इसके वाम भाग या बायें भाग में प्रत्येक दिशा में आवर्त (परिक्रमणक) होते
हैं। इनके द्वार दक्षिणावर्त होते हैं। हे अपराजित ! ऐसा कहा गया है।
पोलसमूहमाह -
एकपोल्यं त्रिपोल्यं वा पञ्चपोल्यमथोच्यते ।
एवंविधः प्रकर्तव्यः पोल्यानां तु समुच्चयः ॥ 14 ॥
अब पोल समूह के बारे में कहता हूँ। ये तीन प्रकार की होती है— एक पोल
वाली, त्रिपोल्य या तीन पोल वाली तथा पञ्चपोल्य या पाँच पोल वाली।
- यह वर्णन समराङ्गण. में द्वार के प्रसंग में आया है-उत्सङ्गो हीनबाहुश्च पूर्णबाहुस्तथापरः। प्रत्यक्षायश्चतुर्थश्च
निवेशः परिकीर्तितः ॥ उत्सङ्ग एवदीक्षाभ्यां (?) द्वाराणां वास्तुवेश्मनोः। स
सौभाग्यप्रजावृद्धिधनधान्यजयप्रदः ॥ यत्र प्रवेशतो वास्तु गृहं भवति वामतः। तद्धीनबाहुकं वास्तु निन्दितं
वास्तुचिन्तकैः ॥ तस्मिन् वसन्प्रव्यथितः स्वल्पमित्रोऽल्पबान्धवः । स्त्रीजितश्च भवेन्नित्यं विविधव्याधिपीडितः ॥
वास्तुप्रवेशतो यत् तु गृहं दक्षिणतो भवेत्। प्रदक्षिणप्रवेशत्वात् तद् विद्यात् पूर्णबाहुकम् ॥ तत्र पुत्रांश्च पौत्रांश्च
धनधान्यसुखानि च। प्राप्नुवन्ति नरा नित्यं वसन्तो वास्तुनि ध्रुवम् ॥ गृहपृष्ठं समाश्रित्य वास्तुद्वारं यदा भवेत्।
प्रत्यक्षायस्त्वसौ निन्द्यो वामावर्तप्रवेशवन् ॥ (समराङ्गण. 39, 11-17)
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एकपोल्यं वक्त्रद्वारं त्रिपोल्यं भ्रमणीद्वयम्।
पञ्चपोल्यं तु चित्राढ्यं कर्तव्यं सर्वकामदम्॥ 15 ॥
एक पोल का तो मुख्य द्वार एक ही होता है परन्तु त्रिपोलिया में दो भ्रमणी
होती है तथा पञ्चपोल्य में तरह-तरह के चित्र अर्थात् मूर्ति अलङ्करणों की आढ्य-
भरमार होनी चाहिए जो सर्व कामनाओं को पूर्ण करने वाली है।
तस्य प्रकारलक्षणमाह —
प्राकारादियुक्तभागैर्विस्तरो भागषट्कतः।
निर्गमश्च चतुर्भागैः प्राकारो यत्र वाञ्छितः॥ 16 ॥
इन पोलों के प्राकार अर्थात् परकोटे भी समुचित भागों के विस्तार वाले होते
हुए छह भाग तक होते हैं। जहाँ-जहाँ प्राकार-परकोटा वाञ्छित है, वहाँ-वहाँ
उसका निकास-निर्गम चार भागों तक का होना चाहिए।
याम्यपार्श्वे समस्तत्र विस्तरस्तु त्रिभागिकः₃।
निर्गमश्च त्रिभागैश्च₃ सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 17 ॥
बायें भाग के समस्त अर्थात् बायीं बाजू के समस्त परकोटे तीन भाग के
विस्तार-चौड़ाई वाले होने चाहिए। उनका निकास भी तीन भाग का होना चाहिए।
ये सब मेरे द्वारा संक्षेप में कह दिया गया।
अन्यदप्याह —
त्रिभागं दक्षिणे त्यक्त्वा द्विभागं च तथोत्तरे।
शेषा प्रतोली चैकांशा भागं दक्षिणभित्तिका॥ 18 ॥
तीन भाग दक्षिण की ओर छोड़कर तथा दो भाग उत्तर की ओर छोड़े; एक
अंश-भाग प्रतोली की दक्षिणी भित्ति का होता है।
भवेत् भागोत्तरा भित्तिः कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃।
दक्षिणे भित्तिपार्श्वेऽग्रे कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃॥ 19 ॥
जो भाग उत्तर की ओर की भित्ति का होता है, उसके कोने तक तीन वलण
(घूमाव) होते हैं तथा उसके दक्षिण की भित्ति के पार्श्व में भी आगे की ओर कोने
तक तीन वलण होते हैं।
द्विभागं विस्तरं कुर्याद् वक्त्रमार्गप्रवेशनम्।
एकपोल्यमिति ख्यातं सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 20 ॥
द्वार के मुखमार्ग में प्रवेश करने के लिए दो भाग का विस्तार होना चाहिए। इस
सूत्र-८३ 489
त्रिपोल्यलक्षणमाह —
वामे द्विभागविस्तीर्णे अपरे दशभागिके₁₀ ।
दक्षिणे समभागश्च चतुर्भागं परे हितम् ॥ २१ ॥
इसी प्रकार बायीं ओर का विस्तार दो भाग का और दूसरी ओर दस भाग दक्षिण
में भी उतने ही समान भाग का और परे-दूसरी ओर चार भाग रखना उचित है।
त्रिभागे विस्तरं याम्ये अपरेऽस्य ¹समपदम् ।
याम्ये कुर्याच्च वेदांशं₄ मूलद्वारं तु कारयेत् ॥ २२ ॥
दक्षिण में तीन भाग के विस्तार का और अपरे-दूसरी ओर भी उतने ही समान
पद अर्थात् तीन भाग का विस्तार हो तथा दक्षिण ओर का विस्तार चार भाग का हो,
ऐसा मूलद्वार बनाना चाहिए।
चतुर्भागाग्रभ्रमणं² भागा भित्तिर्याम्योत्तरे ।
भागा भित्तिस्तदग्रे च समद्वारं सतोरणम् ॥ २३ ॥
आगे की ओर चार भाग का भ्रमण अर्थात् घूमाव हो जिसके उत्तर दिशा और
दक्षिण दिशा में भित्ति हो। उसके आगे की ओर भी एक भाग की भित्ति हो और
तोरणयुक्त समान द्वार हो।
पुनर्भ्रमश्चतुर्भागः षड्भागश्चैव विस्तरे ।
विधेयं पूर्ववच्छेषं त्रिपोल्यं नाम शोभनम् ॥ २४ ॥
उसके भी पुनः चार भाग का भ्रमण-घूमाव हो जिसका विस्तार छह भाग का
हो, शेष सभी अङ्गों का न्यास पूर्व में बताए विधेय के अनुसार ही होगा। इस प्रकार
के द्वार का नाम त्रिपोल्य अर्थात् त्रिपोलिया कहा है।
पञ्चपोल्यलक्षणं —
यथा वामे तथा दक्षे भित्तिर्भागा भुजान्ततः ।
मध्यभित्तिर्यथा पूर्वं चतुष्काकृति तोरणे ? ॥ २५ ॥
जैसा बायें वैसा ही दायें भित्तियों के भाग एक गज तक के हों। मध्य की भित्ति
पूर्व की तरह की हो और चौकोर आकृति का तोरण हो (?)।
द्वारं द्वारस्य सूत्रेण भागिको भित्तिविस्तरः ।
पुनरन्ते चान्तरे च द्वारं द्वारतृतीयकम् ॥ २६ ॥
- 'तमपदम् ?।' इति प्रकाशित पाठः ।
- 'चतुर्भागाग्ररमण' इति प्रकाशित पाठः ।
अ
सभी द्वार एक सीध में या सूत्र में बने हों जिनकी भित्ति का विस्
हो और उनके पुनः अन्तर-अन्तर पर द्वार तीन-तीन की संख्या में
तद्वत्तल्यानि क्षेत्राणि कार्याणि शोभनानि वै।
पूर्वद्वारानुक्रमेण उभे द्वारे याम्योत्तरे ॥ 27 ॥
उनके अनुरूप ही शोभायुक्त तल क्षेत्रों की रचना करनी चाहिए। प
के अनुक्रम में दोनों द्वार उत्तर दक्षिण में बनाने चाहिए।
वक्त्रद्वारं पुनस्त्वेवं कर्तव्यं दक्षिणोत्तरे।
पञ्चपोल्यमिदं ख्यातं प्राकारः कपिशीर्षतः ॥ 28 ॥
इसी प्रकार पुनः मुखद्वारों को भी दक्षिण-उत्तर की ओर बनाना
र यह पञ्चपोल नामक द्वार उत्तम परकोटे और कपिशीर्ष-कँगूरों
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छ
(एकत्रि) पञ्चप्रतोल्यधिकारो नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 83 ॥
प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा
पञ्चप्रतोली अधिकार नामक तियासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 83 ॥