सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
संग्रह पर लौटें

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-८० 469
आँख से देखते हैं। इनका हिनहिनाने का शब्द बड़ी गर्जनाकार का होता है और ये
इतने स्वामीभक्त होते हैं कि संग्राम में कोई कठिन परिस्थिति आ पड़े तो अपने
स्वामी को बचाकर निकल जाते हैं। इन गुणों वाला जो अश्व समझदार और
स्वामीभक्त होता है वह विप्र जाति का अश्व माना गया है।
द्रुहोत्प्रविष्ट उदकेऽन्यशब्दे विद्रुतो भवेत्।
स्वामिनं रोहयेच्छुद्धश्चान्यं तु परिपातयेत् ॥ 7 ॥
सङ्ग्रामे दुर्धरश्चाश्वो जैत्रहारी प्रबुध्यति।
कामातुरश्च शूरश्च जात्या क्षत्रियसञ्ज्ञकः ॥ 8 ॥
जो अश्व पानी में उतरते समय अड़चन करे, विरोध करे, अचकचाए और
किसी अन्य व्यक्ति का शब्द सुनके भड़क उठे, चमके तथा अपने स्वामी को
पहचान करके उसके अश्वारोहण के समय तो शुद्ध मन से स्थिर रहे परन्तु स्वामी के
सिवाय अन्य कोई आरोहण करने की चेष्टा करे तो वह उसे तुरन्त पटक देता हो,
ऐसा अश्व संग्राम में बड़ा दुर्धर यानी खतरनाक हो जाता है परन्तु अपने अश्वार

470 अपराजितपृच्छा
वैश्य जाति के अश्वों का स्वर मधुर होता है। इसके विपरीत शूद्र जाति के अश्व
का शब्द कर्कश होता है। जो अश्व किसी क्षण में शुद्धासन या आरोहण के समय
स्वस्थ, शान्त रहे, संग्राम में भी सावधान किन्तु चञ्चल रहे परन्तु किसी क्षण में
घोड़ियों की ओर आकर्षित होकर आतुर हो उठे एवं किसी क्षण पुनः स्वस्थ और
शान्तचित्त होकर स्थिर रहे, ऐसे सभी अश्व शूद्र संज्ञक यानी चतुर्थ जाति के माने
गए हैं।
इत्युत्तमा मता अश्वाः शेषाः प्रकृतिजातकाः ।
इति ज्ञातिप्रभेदाः स्युः प्रमाणं सप्तधोत्तमम् ॥ 13 ॥
सुन्दरश्चाऽथ श्रीवत्स आह्लादश्च मनोहरः ।
विजयो विभवः शान्तः सप्ताऽश्वा उत्तमात्तमाः ॥ 14 ॥
उक्त वर्णित उत्तम अश्व माने गए हैं। अन्य शेष को सामान्य प्रकृतिजात अश्व
समझें। ये सभी जातिभेद बताए, जिनके प्रमाण भी सात प्रकार के उत्तमोत्तम कहे
गए हैं जो इस प्रकार है— (1.) सुन्दर, (2.) श्रीवत्स, (3.) आह्लाद, (4.)
मनोहर, (5.) विजय, (6.) विभव और (7.) शान्त— ये सातों प्रकार के
उत्तमोत्तम अश्व होते हैं।
तथा चोच्छ्रयादीनां प्रमाणमाह —
षष्ट्यङ्गुलः₆₀ सुन्दरः स्याच्छ्रीवत्सश्चतुःषष्टिभिः₆₄ ।
अष्टषष्टिभिराह्लादो₆₈ द्वासप्तत्या₇₂ मनोहरः ॥ 15 ॥
षट्सप्तत्या₇₆ च विजयो विभवोऽशीतिभिस्तथा₈₀ ।
चतुरशीतिभिः₈₄ शान्तः प्रमाणं सप्तधा₇ विदुः ॥ 16 ॥
अब इन घोड़ों के उक्त नामानुसार उनकी ऊँचाई आदि के प्रमाण कहते हैं।
सामान्यतया (1) सुन्दर जाति का घोड़ा 60 अङ्गुल ऊँचा होता है, (2) श्रीवत्स
जाति का घोड़ा 64 अङ्गुल, (3) आह्लाद जाति का घोड़ा 68 अङ्गुल, (4) मनोहर
जाति का घोड़ा 72 अङ्गुल, (5) विजय जाति का घोड़ा 76 अङ्गुल, (6) विभव
नाम की जाति का घोड़ा 80 अङ्गुल तथा (7) शान्त जाति का घोड़ा 84 अङ्गुल की
ऊँचाई लिए होता है। इस प्रकार विद्वानों ने घोड़ों के सात प्रकार से प्रमाण कहे हैं।
अशुभाश्वलक्षणमाह —
ककुद्वान् कुम्भिकावांश्च कराली कृष्णतालुकः ।
हीनदन्तोऽधिकदन्तः षडश्वाः स्वामिघातकाः ॥ 17 ॥
अब अशुभ अश्वों की पहचान कहते हैं। जो घोड़े कूबड़ वाले, कुम्भ वाले,

कराली अर्थात् भयानक दाँत वाले, काले तालु वाले, कम दाँत वाले या अधिक दाँत
वाले हो तो ये छह प्रकार के घोड़े स्वामी घातक होते हैं।¹
अथाश्वशाला लक्षणं —
अश्वशालां प्रवक्ष्यामि चतुःषष्टिकरायता₆₄।
शतार्द्धस्ता₅₀ मध्या स्यात् चत्वारिंशत्करेत्तरा₄₀ ॥ 18 ॥
पञ्चदशकरा₁₅ ज्येष्ठा त्रयोदशकरेत्तरा₁₃।
कनिष्ठैकादशकरा₁₁ पृथुत्वं त्रिविधं मतम् ॥ 19 ॥
अब अश्वशाला बनाने के बारे में प्रमाण कहते हैं— 1. ज्येष्ठ अश्वशाला 64
गज (हाथ) की लम्बाई या आयत तथा 15 गज की चौड़ाई वाली होती है; 2.
मध्यम अश्वशाला 50 गज की लम्बाई और 13 गज की चौड़ाई वाली होती है तथा
3. कनिष्ठ अश्वशाला 40 गज की लम्बाई और 11 गज की चौड़ाई वाली होती है।
तत्रैव क्रूरार्थपात्रलक्षणमाह —
सप्त₇ पञ्च₅ त्रि₃ हस्तं च विस्तरे त्रिविधं स्मृतम्।
द्विहस्तमुच्छ्रितं₂ कुर्यात् क्रूरार्थं लक्षणान्वितम् ॥ 20 ॥
तस्य बाह्ये भवेद् भित्तिरेक₁हस्ता च वेष्टने ।
अब घोड़ों की ठाण में चरने के लिए बनाई जाने वाली कुण्डी के प्रमाणों को
कहा जाता है— 7 गज लम्बी 2 गज चौड़ी ज्येष्ठ; 5 गज लम्बी 2 गज चौड़ी
मध्यम, और 3 गज लम्बी तथा 2 गज चौड़ी कुण्डी कनिष्ठ कही गई है। ऐसी
कुण्डियाँ क्रूरार्थ अर्थात् घोड़े के लिए चरने, भोजन करने की सामग्री रखने के लिए
बनाई जाए। उस कुण्डी की दीवार का घेरा एक गज ऊँचाई वाला बनाएँ।


  1. विष्णुधर्मोत्तर में आए श्लोक उक्त श्लोकों से पर्याप्त साम्यता लिए हैं— हीनदन्तोऽधिदन्तश्च कराली
    कृष्णतालुकः। कृष्णजिह्वश्च यमजो जातमुष्कश्च यस्तथा॥ द्विशफश्च तथा शृङ्गी त्रिकर्णी व्याघ्रवर्णकः।
    खरवर्णो भस्मवर्णो जातवर्णश्च काकुदी॥ श्वित्री च काकसादी च खरसारस्तथैव च। वानराक्षः कृष्णसटः
    कृष्णमुष्कस्तथैव च॥ कृष्णप्रोथश्च मूकश्च यश्च तित्तिरसन्निभः। विषमश्वेतपादस्तु ध्रुवावर्त्तविवर्जितः॥
    अशुभावर्त्तसंयुक्तो वर्जनीयस्तुरङ्गमः।
    जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद में भी ये ही लक्षण आए हैं। यथा— आवर्तो यस्य ककुदे काकुदी स उदाहृतः।
    करालाश्चाधरा दन्ता जायन्ते यस्य चोत्तरे॥ स कराली इति प्रोक्तो भर्तुः पुत्रादिभक्षकः॥ चतुर्भिः पञ्चभिर्वाथैव
    हीनदन्तः प्रकीर्तितः। सप्तभिर्भाभिर्नैर्जातस्तथाधिकदन्तकः। अङ्गुष्ठपर्वसङ्काशो छागशृङ्गोपमं तथा।
    जम्बूबदररूपं च तथा चामलकोपमम् ॥ आप्रास्थिसदृशं चापि हरितक्याः फलोपमम्। दग्धचर्मनिभं चापि
    वालसंस्थानमेव च॥ कीलं कर्णान्तरे यस्य देशान्ते चापि दृश्यते। धौरेयः सर्वपापानां वाह शृङ्गी स
    कीर्तितः ॥ एवं विधेन शृङ्गे शृङ्गी राष्ट्रे न वासयेत् ॥ इत्यादि... । (लक्षणप्रकाश पृष्ठ 483-484 पर उद्धृत)

472 ...पृच्छा
अश्वशालाप्रमाण —
¹पञ्च₇हस्तोच्छ्रितां भित्तिरर्द्धपञ्च₅ ॥ करोऽथवा ॥ २१ ॥
सप्त₇हस्तोच्छ्रितं कार्यं द्वाभ्यां₂ पक्षस्तम्भकम्।
तोरणं सप्त₇हस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत् ॥ २२ ॥
अण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्तोराणय स्तम्भकम्।
तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता अङ्गुल्यो द्वादशायतः ॥ २३ ॥
तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्यादण्डच्छाद्यत्रयं तथा।
कलशास्तत्र दातव्याः प्रतिछाद्यमथोपरि ॥ २४ ॥
पूर्वापरमुखा अशस्ता तेजो अर्थप्रतापक्षयः।
तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः ॥ २५ ॥
दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः।
नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः ॥ २६ ॥
अश्वशाला में भित्ति की ऊँचाई पाँच गज या साढ़े पाँच गज की हो तथा उसके
दोनों पक्षों पर सात-सात गज ऊँचे दो स्तम्भ बनाए जाएँ। उन स्तम्भों की ऊँचाई के
सात गज के अन्तिम भाग पर तोरण बनाने के लिए उत्तर स्तम्भक बनाए। जहाँ तक
तोरण के स्तम्भ बने हुए हों वहाँ तक 3 गज ऊँची अण्डछाद्य अर्थात् अण्डाकार
गुम्बज की छत बनाएँ। उसके ऊपर अन्तरपत्र 12 अङ्गुल की ऊँचाई के बनाएँ।
फिर, उसके ऊपर अण्डाकार तीन गज ऊँची गुम्बजयुक्त छत बनाएँ और फिर उन
छतों पर प्रत्येक पर कलश लगाएँ। इन अश्वशालाओं में पूर्व और पश्चिम दिशोन्मुखी
शालाएँ अप्रशस्त मानी गई है। इन पूर्वमुखी-पश्चिममुखी शालाओं को तेज, अर्थ,
प्रताप और तेज वृद्धि को क्षय करने वाली माना गया है और कहा गया है कि ऐसी
शालाओं से तेज वैसे ही क्षय हो जाता है जैसे कृष्णपक्ष का चन्द्रमा दिन-दिन क्षय
को प्राप्त होता हुआ अन्त में अमावस्या को प्राप्त करके पूरा क्षय हो जाता है। (घोड़ों
को इस प्रकार से बान्धने से भी यही परिणाम होता है¹)। इसके विपरीत दक्षिणमुखी
व उत्तरमुखी अश्वशाला प्रशस्त कही गई है। ये स्वामी के प्रताप और कीर्ति को

  1. 'पञ्चहस्तोच्छ्रिता भित्तिरर्थपञ्चस्वरोऽथवा ? ॥ सप्तहस्तोच्छ्रितं कार्यमुदाढ्या ? पक्षस्तम्भकम्। तोरणं
    सप्तहस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत्॥ दण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्ताराढ्यस्तम्भकम्। तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता
    अङ्गुल्यो द्वादशाऽन्यतः॥ तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्याद्दण्डच्छाद्यत्रयं तथा। कलशास्तत्र दातव्याः
    प्रतिक्षणमथोपरि॥ पूर्वापरमुखास्त्रस्तास्तेजोऽर्थप्रतापक्षयः ?। तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः॥
    दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः। नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः॥' इति प्रकाशित
    पाठः।

च। उत्तराभिमुखा श्रेणी तुरगाणां विधीयते॥ दक्षिणाभिमुखा वाथ परिशिष्टास्तु`

Line 27:
गर्हिताः। तुरगास्ते तथा धार्याः प्रदीपैः सार्वरात्रिकैः॥ कुक्कुटान् वानरांश्चैव मर्कटांश्च विशेषतः।

Line 28:
धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा। गोगजाश्वादिशालासु

Line 29:
तत्पुरीषस्य निर्गमः॥ अस्तं गते न कर्तव्यो देवदेवे दिवाकरे। तत्र तत्र यथास्थानं राजा विज्ञाय सारथीन्॥

Line 30:
(मत्स्य. 217, 19-23)

Line 31:
2. यह सूत्र प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर में विद्यमान 'अपराजितपृच्छा' की खण्डित मातृका (संख्या

Line 32:
18078-12) से उद्धृत और तद्नुसार पुनर्सम्पादित किया गया है।

Wait, let's verify line 28:
`धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा। गोगजा

पृथिव्याश्च यदा राजाभुङ्क्तेऽर्द्धं पर मेव च।
तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं शतं हीनकरद्वयम् <sub>98</sub>॥ ३॥
जो राजा इससे आधे भूभाग का भोग करने वाला हो उसके लिए राजभवन सौ
से दो गज हीन अर्थात् अठानवे गज के विस्तार वाला बनाए।
तथा महीत्रिभागं च भुङ्क्ते यो वै नराधिपः।
अष्टाशीतिकरं <sub>80</sub> वेश्म महीशानां त्रिधा <sub>3</sub> मतम्॥ ४॥
जो राजा एक तिहाई भूमि का भोक्ता हो, ऐसे राजा के लिए अस्सी गज के
विस्तार वाला राजभवन बनाना चाहिए। इस तरह उक्त राजभवनों के तीन प्रकार
माने गए हैं।
लक्षग्रामाधिपो यस्तु स महामण्डलेश्वरः।
तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं द्विहीनाशीतिहस्तकम् <sub>78</sub>॥ ५॥
जो राजा एक लाख ग्रामों को अधिपति हो, उसकी संज्ञा मण्डलेश्वर होती है।
उसका राजभवन अस्सी में दो कम अर्थात् अठत्तर गज विस्तार का होना चाहिए।
लक्षार्द्धं यदा भुङ्क्ते मण्डलीकोऽभिधानतः।
अष्टषष्टिकरं <sub>68</sub> तस्य कर्त्तव्यं भवनोत्तमम्॥ ६॥
जो राजा आधे लाख ग्रामों का भोग करने वाला हो उसका 'मण्डलीक' नाम
दिया गया है। उसका राजभवन अड़सठ गज का होना चाहिए॥ ६॥
अयुतद्वयग्रामाणां महा सामन्तसञ्ज्ञकः।
तस्य वेश्माऽष्टपञ्चाशत् <sub>58</sub> करं कामफलप्रदम्॥ ७॥
राजा दो अयुत (20 हजार) ग्रामों का स्वामी हो, उसे 'महासामन्त' नाम दिया
गया है। उसका राजभवन अट्ठावन गज विस्तार का होना चाहिए, जो उसकी
कामना को फलवती बनाता है।
सामन्तसञ्ज्ञकः सोऽत्राऽयुतग्रामाधिपश्च यः।
अष्टचत्वारिंशद्धस्तं <sub>48</sub> भवनं शोभनम्॥ ८॥
जो एक अयुत ( 10 हजार) ग्राम का अधिकारी हो उसे 'सामन्त' संज्ञा दी गई
है। उसका राजभवन अड़तालीस गज के विस्तार वाला होना चाहिए, जो सब तरह
से शोभा वाला होता है।
ईशोऽयुतार्द्धग्रामाणां लघुसामन्तक सञ्ज्ञकः।
अष्टत्रिंशत्करैर्युक्तं <sub>38</sub> भवनं तस्य कामदम्॥ ९॥

सूत्र-८१ 475
जो डेढ़ हजार ग्रामों का स्वामी हो उसको 'लघुसामन्त' नाम दिया गया है।
उसका राजभवन अड़तीस गज के विस्तार का होना चाहिए, जो उसकी सब कामना
को पूरी करता है।
सहस्रमेकं ग्रामाणां भुङ्क्ते स चतुरंशिकः।
अष्टाविंशकरं₂₈ कुर्यात् वेश्मशान्तिप्रदं सदा ॥ 10 ॥
जो राजा एक हजार ग्रामों का भोग लेता है वह 'चतुरंशिक' कहलाता है।
उसका राजभवन केवल अट्ठाईस गज का शान्ति प्रदान करने वाला होता है।
ग्रामाणां विंशतिं भुङ्क्ते यः पञ्चदशकं तथा।
ग्रामांस्त्रीन्द्वौ तथा चैकं भुङ्क्ते पर्यायसंस्थितम् ॥ 11 ॥
इसी प्रकार जो बीस ग्रामों का या पन्द्रह ग्रामों का भोग करता है अथवा तीन,
दो या एक ग्राम का भोग करता है, उनके जैसे भी पर्याय¹ बन जाए, वैसा राजवेश्म
उनके लिए बनाना चाहिए।
शतमेकं तु ग्रामाणां स्वल्पराष्ट्रं तु सञ्जितम्।
अष्टादशकरं₁₈ वेश्म कर्त्तव्यं सर्वकामदम् ॥ 12 ॥
एक सौ ग्रामों के समूह के भोगकर्ता को 'स्वल्पराष्ट्र' संज्ञा दी गई है। ऐसे राजा
के लिए अठारह गज विस्तार वाला भवन बनाना चाहिए, यह उसके लिए सर्व
कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है।
विशेष : राजवल्लभवास्तुशास्त्रम् (5, 2 व अन्य) में भवनों का प्रमाण इस
प्रकार आया है—

क्रमनृपसंज्ञाविशेषता/कोटिगृहप्रमाण (व्यास)
1.चक्रवर्ती(सर्वाधिपति)108 हाथ
2.नृनाथचक्रवर्ती के समान भूमि या तृतीयांश हो88 हाथ
3.महामण्डलिक1 से 2 लाख ग्रामों का अधिपति78 हाथ
4.नृपमण्डलिक50 हजार ग्रामाधिपति68 हाथ
5.सामन्तमुख्य20 हजार ग्रामाधिपति58 हाथ
6.सामन्त10 हजार ग्रामाधिपति48 हाथ
  1. मयमतं में इस प्रकार की विप्रवर्गीय कोटियों का निर्धारण हुआ है और तद्नुसार ही ग्राम विन्यास का
    निर्देश दिया गया है। मेवाड़ में भौमिया, गोल, चौथिया ठाकुर आदि कोटियाँ भी निर्धारित की गई हैं।

| 7. | तृतीय (सामन्त) | 5 हजार ग्रामाधिपति | 38 हाथ |
| 8. | चतुरंशिक | 1 हजार ग्रामाधिपति | 28 हाथ |
| 9. | स्वल्पराष्ट्र/सैनिक | 100 ग्रामाधिपति | 18 हाथ |
आरोहणमाह —
करमष्टादशमध्यस्थं कर्त्तव्यं तु क्रमेण तु।
सोपानपङ्क्तिमर्यादा कथिता त्वपराजितम् ॥ 13 ॥
हे अराजित ! अब सोपानपङ्क्तिमर्यादा अर्थात् सीढ़ियाँ बनाने का प्रमाण कहता
हूँ। सामान्यतः अठारह गज के भीतर ही सीढ़ियाँ क्रम से बनानी चाहिए।
दण्डनायकादीनां भवनप्रमाणमाह —
राजालये च यन्मानं तदर्द्धं दण्डनायके।
दण्डार्द्धं मन्त्रिसंस्थानं मन्त्र्यर्द्धं द्वारपालके ॥ 14 ॥
राजालय का जो मान बताया गया है, उसका आधा दण्डनायक के भवन का
मान होना चाहिए अर्थात् राजालय 108 गज का हो तो दण्डनायक का 54 गज
विस्तार वाला भवन अपेक्षित है। दण्डनायक के भवन से आधा मन्त्री का भवन
अर्थात् 27 गज का हो। मन्त्री के भवन से आधा द्वारपाल, ड्योढ़ी के दरोगा का
भवन अर्थात् 13 गज विस्तार का होगा।
तत्समे पुरोहितं ज्ञेयं तदर्द्धे जनसङ्कुले।
अनुक्रमादिदं सर्वं ज्येष्ठ-मध्य-कनिष्ठकम् ॥ 15 ॥
राज पुरोहित का भवन भी उसी के बराबर अर्थात् 13 गज विस्तार का द्वारपाल
के भवन के समान हो। इनसे भी आधे क्षेत्र विस्तार का अर्थात् 6-7 गज प्रमाण का
सामान्य नागरिक का भवन हो। इसी अनुक्रम से ज्येष्ठ, मध्यम और कनिष्ठ भवन
समझना चाहिए।
अधुना तलविधानमाह —
अष्टहस्ते₈ त्वेकभूमिं₁ द्विभूमं₂ अष्टदशके₁₈।
त्रिभूमं₃ मष्टाविंशत्या₂₈ ष्टत्रिंशद्भि₃₈ र्वेद₄ भूमम् ॥ 16 ॥
आठ गज के क्षेत्र में जो भवन बने वह एक भूमि अर्थात् एकतलीय या एक
मंजिला कहलाता है। अठारह गज का दो भूमि, मंजिला का बनाए। अठाईस गज
वाला तीन भूमि का या तिमंजिला तथा अड़तीस गज का क्षेत्र वाला भवन चार भूमि
वाला या चार मंजिला होता है।

सूत्र-८१ 477
अष्टचत्वारिंशद्भिः₄₈ पञ्चभू₅ षड्भू₆ ष्टपञ्चाशद्भिः₅₈ ।
अष्टषष्ट्या₆₈ सप्तभूम₇ मष्ट₈ भ्वष्टसप्ततिभिः₇₈ ॥ 17 ॥
इसी प्रकार अड़तालीस गज क्षेत्र वाला भवन पाँच भूमि का अर्थात् पाँच
मंजिला होता है। अठावन गज क्षेत्र का छह भूमि वाला अर्थात् छह मंजिला होता
है। अड़सठ गज क्षेत्र का भवन सात भूमि का और अठत्तर गज क्षेत्र का भवन आठ
तलीय या आठ मंजिला होता है।
अष्टाशीत्या₈₈ नवभूमं₉ दशभू₁₀ ष्टनवतिभिः₉₈ ।
भद्रमेकादश₁₁ भूममष्टोत्तरशतात्मके₁₀₈ ॥ 18 ॥
अठासी गज की क्षेत्र भूमि का भवन नौ भौमिक अर्थात् नौ मंजिला होता और
अठानवे गज क्षेत्र का भवन दस भूमि का यानी दश मंजिला होता है। इसी तरह एक सौ
आठ गज क्षेत्र का भवन भद्र जाति का ग्यारह भूमि का अर्थात् ग्यारह मंजिला होता है।
इत्यमनन्तर सिंहद्वारानुक्रमह —
सिंहद्वारानुक्रमं च कथये त्वपराजित ।
उत्तमे च त्रयद्वारं¹ कर्तव्यं चक्रवर्त्तिभिः ॥ 19 ॥
अब हे अपराजित! सिंहद्वारों का अनुक्रम कहता हूँ। इस तरह द्वार-त्रय-उत्तम
अर्थात् उत्तम त्रिपोलिया द्वार² चक्रवर्ती राजाओं के भवनों के लिए बनाना कर्तव्य है।
उत्तमं पञ्चदश₁₅ च मध्यमं च त्रयोदश₁₃ ।
कनिष्ठ रुद्र₁₁ हस्तान्तमुच्छ्रयेण तु योजितम् ॥ 20 ॥
इन सिंहद्वारों में उत्तम त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई पन्द्रह गज, मध्यम त्रिपोलिया
द्वार की ऊँचाई ऊँचाई तेरह गज और कनिष्ठ त्रिपोलिया द्वार की ऊँचाई ग्यारह गज
योजित होगी।
सिंहद्वारमिदं मानं त्रिधा₃ स्याच्चक्रवर्तिनि ।
महाराष्ट्रेovere? महाराष्ट्रेश्वरे राज्ञि महामण्डलकेश्वरे ॥ 21 ॥
चक्रवर्तिनि मध्याद्ये कनिष्ठं मण्डलेश्वरे ।
ये द्वार मान तीन प्रकार के चक्रवर्ती राजाओं के लिए कहे गए है। महाराष्ट्रेश्वर
चक्रवर्ती के पन्द्रह गज की ऊँचाई वाला उत्तम त्रिपोलिया द्वार, महामण्डलेश्वर
चक्रवर्ती के लिए तेरह गज की ऊँचाई वाला मध्यम त्रिपोलिया द्वार तथा मण्डलेश्वर

  1. 'द्वारत्रयन्तुत्तमे' इति प्रकाशित पाठः।
  2. प्राचीन राजधानी पुरों, नगरों में त्रिपोलिया द्वार बनते रहे हैं। जयपुर, उदयपुर में भी तीन द्वारों वाले
    सिंहद्वार की परम्परा देखने में आती है।

478
चक्रवर्ती राजा के लिए ग्यारह गज की ऊँचाई वाला त्रिपोलिया द्वार विहित है यह
कनिष्ठ त्रिपोलिया है।
अनन्तरं कथयिष्यामि सिंहद्वारं यथाक्रमम् ॥ 22 ॥
द्वारयुग्मं तु कर्त्तव्यं महासामन्तके सदा।
द्वारमेकं तु कर्त्तव्यं तथा सामन्तकादिके ॥ 23 ॥
अब इसके बाद, अन्य सिंहद्वारों के बारे में क्रम से कहता हूँ। महासामन्त के
भवन में सदैव दो पोल वाला द्वार तथा सामन्त आदि के केवल एक पोल का द्वार
बनाना चाहिए।
तोरण प्रयोजनलक्षणञ्च —
अन्येषां स्वल्पराज्यानां ये स्मृताश्चान्यसञ्ज्ञका।
तेषां च तोरणं दद्यात् सिंहद्वारविवर्जितम् ॥ 24 ॥
अन्य छोटे राजा, ठाकुरों आदि के लिए जो केवल अन्य संज्ञक माने जाते हैं,
उनके भवन के आगे केवल तोरण ही बनाए, उनके लिए सिंहद्वार का निर्माण करना
वर्जित है, उचित नहीं माना गया है।
स्तम्भयुग्मोत्तराङ्गाद्यं सिंहकर्णैर्विभूषितम्।
नपुंसकं विना कर्णैः स्वल्पराजेषु भाषितम् ॥ 25 ॥
इसलिए ऐसे, लघु राजाओं, ठाकुरों जागीरदारों आदि के भवनों के आगे
सिंहकर्ण से युक्त विभूषित दो स्तम्भों पर उत्तरंग अर्थात् छाबना बनाकर नपुंसक
जाति का, बिना कर्णों का तोरण बनाया जाए।
स्तम्भयुग्मोर्ध्वतः कुर्यात्पत्रमालात्रयं तथा।
विप्रेषु क्षत्रियोक्ताश्चं मालायुग्मं च वैश्यके ॥ 26 ॥
उक्त तोरण के दोनों स्तम्भों के ऊपर तीन पत्रमालाएँ बनाकर उनका सुन्दर
अलङ्करण करें। इसके अतिरिक्त विप्रों, क्षत्रियों के लिए भी ऐसे ही अर्थात् तीन
पत्रमाला युक्त तोरण बनाए। वैश्यों के भवन के तोरण में दो माला का तोरण
अलङ्करण करें।
एकमाला तु शूद्राणां स्तम्भोर्ध्वं वंशकोच्छ्रिताः।
वंशोच्छ्रिता विना स्तम्भैः प्रकृतीनां च सर्वशः ॥ 27 ॥
इसी प्रकार शूद्रों के भवन में एकमाला के तोरण अलङ्करणार्थ बनाए जाए
जिनमें स्तम्भ एक बाँस की ऊँचाई के प्रमाण वाले हों। इनके अतिरिक्त सभी

सूत्र-८१ 479
प्राकृतजनों अर्थात् सर्वसामान्य ग्रामीणों और नगरवासियों के घरों के द्वार बिना
स्तम्भों वाले ही एक बाँस की ऊँचाई के बनाने चाहिए।
इत्यमनन्तर आसनविधानमाह —
तोरणं कथितं वत्स आसनं शृणु साम्प्रतम्।
आसनं कथयिष्यामि दिव्यमानेन सुव्रत ॥ २८ ॥
अब तक तोरणों के बारे में कहा गया। अब हे वत्स ! तुम आसनों के विषय में
सुनो। मैं आसनों का दिव्यमान कहता हूँ।
युक्तं च षष्टि₆₀ पञ्चाश₅₀ च्चत्वारिंश₄₀ द्विरङ्गुलैः।
महाराजेषूचितं वै इत्थं सिंहासनं त्रिधा₃ ॥ २९ ॥
इनमें पूर्वोक्त सुव्रत नाम के उत्तम आसन साठ, पचास और चालीस अङ्गुल
मान के होते हैं जो महाराज चक्रवर्तियों के लिए ही उचित है। इस तरह आसन
ज्येष्ठ (60 अङ्गुल), मध्यम (50) और कनिष्ठ (40 अङ्गुल) मान से तीन प्रकार
के कहे गए हैं।
भद्रासनं महाराष्‍ट्रे विलासैः पद्मासञ्ज्ञकम्।
विस्तारिका तु सामन्तैः चातुरी मन्त्रिमण्डले ॥ ३० ॥
ऐसे राजगद्दी वाले सिंहासन महाराष्ट्र अर्थात् बड़े महाराजाओं के लिए भद्रासन;
विलास के लिए पद्मासन (कमलपीठ) का प्रयोग करें। मन्त्रिमण्डल के लिए चातुरी
(चौकी, कुर्सी) और सामन्तों के लिए विस्तारिका (तिपाई) नामके आसन बनाएँ।
अन्येषां स्वल्पराज्यानां दातव्यं तु मसूरकम्।
गदिका पट्टगद्दी च सर्वस्मिञ्जनसङ्कुले ॥ ३१ ॥
आसनं सिंहसञ्ज्ञं तु शयनं सुखमुत्तमम्।
अन्य छोटे राजाओं के लिए तो केवल मसूरक ही देना चाहिए अर्थात् उनके
लिए केवल तकिया या मोढ़ा-मसन्द ही उचित है। अन्य सभी जन सङ्कुल के लिए
तो आसन के रूप में गदरे अथवा पट्टगद्दी, जाजम-बिछात का प्रयोग करना चाहिए।
सिंहसंज्ञक जो आसन होते हैं, वे शयन के प्रयोजन से बड़े सुखदायी हैं।¹
यानं सुखासनं चैव यानं रथ उच्यते ॥ ३२ ॥
यानं महागजपृष्ठं यानं विद्याद्विसारयोः।

  1. सम्भवतः ये आधुनिक सोफासेट की तरह कोमल, गद्दीदार और आरामदायक बनते होंगे और राजा-महाराजा,
    बड़े लोगों में तब भी प्रयोग में आते ही होंगे। आज भी उसी परम्परा में ड्राइंगरूमों की शोभा बढ़ा रहे हैं।

480 अपराजितपृच्छा ⸱
गजपृष्ठे च यद्वद्धं विद्धि तत्सिंह सञ्ज्ञकम् ॥ ३३ ॥
व्याघ्ररूपं विद्धि शिखि-कलापकभवं पुनः।
एवं विविधरूपाणि पताका छत्रमण्डलम् ॥ ३४ ॥
यान-वाहन, रथों आदि में भी बैठने के सुखासन बनाने चाहिए। जब महागजपृष्ठ
अर्थात् हाथी की पीठ को यान बनाना हो तो उस महागज की पीठ पर विसार अर्थात्
बड़ा बिछौना, गादी युक्त लगा देना चाहिए (इसे आजकल झूल कहा जाता है)। इसी
तरह हाथी की पीठ के ऊपर बान्धकर जो आसन लगाए जाते हैं, उन्हें सिंहासन कहा
जाता है (यथा— आधुनिक हौदा, ऐसे हौदे कई रूपों से सजाए जाते हैं, उनके पाये
तथा दस्ते व्याघ्र के मुख बनाकर अलंकृत किए जाते हैं। कहीं-कहीं तो उन पर
मोरपङ्खों के अलङ्करणों की भी साज-सज्जा होती है। उन पर विविध प्रकार की
पताका, झण्डियाँ फहराती हैं तथा उन पर छत्र-मण्डल भी बनाए जाते हैं।
अधुना छत्रप्रमाणमाह —
चतुरशी

सूत्र-८१ 481
कलश की शोभा की जाए। महामण्डलेश्वरों के छत्रों पर मोरपट्टों की शर्करी अर्थात्
सजावट की जानी चाहिए।
चामरालङ्कारयुक्तं महाराजेश्वरं विदुः ।
इत्येवमुक्तामाला च राज्ञोऽलङ्कारशोभना ॥ ३८ ॥
महाराजाओं के छत्रों के साथ चामरों के भी अलङ्करण हों और ऐसे
महाराजेश्वरों को मोतियों की मालाओं के अलङ्कार या गहने धारण करके
शोभायमान होना चाहिए।
लक्ष्मीश्च रमते नित्यं तथा सा चक्रपाणिना ।
तपसार्थयता येन प्रतापकीर्त्तिवर्द्धनम् ॥ ३९ ॥
ऐसे चक्रपाणि राजाओं के राज्य में नित्य ही लक्ष्मी का वास होता है और
लक्ष्मी के रमते रहने से उनके सभी तपों की सार्थकता प्रकट होती है। उनके प्रताप,
कीर्ति का भी नित्य वर्द्धन होता रहता है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्त्तिप्रकाशप्रोक्तृ श्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
राजालयसिंहासनछत्रप्रमाणाधिकारोनामैकाशीतितमं सूत्रम् ॥ 81 ॥¹

  1. जोधपुर भेदपाठः- सामन्तसञ्ज्ञकं नाम ग्रामस्यायुता द्वयम्। अष्ट चत्वारिंशत्करं तद्भवनं कुर्यात्
    शोभनम् ॥ 8 ॥ अयुतार्द्धग्रामाणां च यश्च लघुसामन्तकः। कराष्ट त्रिंशद्ध्यक्तं च तद्भवनं अर्थ कामदम् ॥
    9 ॥ सहस्त्रैकं तु ग्रामाणां सभवेच्चतुराशिकः। अष्टाविंश करं कुर्यात् वेश्मशान्ति प्रदं सदा ॥ 10 ॥ विंश
    ग्रामे यदा भुक्ती ग्रामं तु दशपञ्चकम्। ग्रामे यत्रमेकं तु भुक्ती पर्याय संस्थितम् ॥ 11 ॥ शतमेकं तु ग्रामाणां
    शल्यराष्ट्रसु सञ्ज्ञकम्। अष्टादश करं वेश्म कर्तव्यं सर्व कामदम् ॥ 12 ॥ करमष्टादशमध्यस्थ कर्त्तव्यं
    कर्त्तव्यंतु क्रमेण तु। सोपान पंक्ति पर्यायः कथितं त्वपराजितम् ॥ 13 ॥ राजालयं तु यन्मानं तदर्द्धं
    दण्डनायकम्। दण्डार्द्ध मन्त्र संस्थानं मन्त्र्यद्धं द्वारपालकम् ॥ 14 ॥ तत्समं त्रौ हितं ज्ञेयं तदर्द्ध जन
    सङ्कुलम्। अनुक्रमेमिदं सर्वं ज्येष्ठ-मध्यम-कनिष्ठकम् ॥ 15 ॥ अष्टहस्तेत्वेकभूमिं द्विभूमं अष्टदशतु। त्रिभूमं
    अष्टविंशत्यं अष्टत्रिंशैर्वेदभूमकम् ॥ 16 ॥ अष्ट चत्वारिशे भूपञ्चषड्भूम्याष्ट पञ्चाशकम्। अष्टषष्ट्यासप्तभौमं
    अष्ट भूम्याष्टसप्ततिः ॥ 17 ॥ अष्टाशीतिनवभूमं च दशभूऽष्टनव्योत्तलम्। भूमैकादशभद्रां ते अष्टोत्तरशत
    हस्तकम् ॥ 18 ॥ सिंहद्वारानुक्रमं च कथये त्वपराजित। उत्तरे च त्रयद्वारं कर्त्तव्यं चक्रवर्त्तिभिः ॥ 19 ॥
    उत्तमंदश पञ्चाशत्करैर्मध्यम च त्रयोदशं। कनिष्ठं भद्रहस्तं तु उच्छ्रायेणतु योजितम् ॥ 20 ॥ सिंहद्वारमिदं
    मानं चक्रवर्त्तित्वयोदिताः। महाराष्ट्रेश्वरे राज्ञैः महामण्डलेश्वरः ॥ 21 ॥ अनन्तरं कथयिष्यामि सिंहद्वारं यथाक्र
    मम् ॥ 22 ॥ मध्यमोत्तम चक्रवर्त्तिश्च कनिष्ठं मण्डलेश्वरः। अष्टरं कथयिष्यामिसिंहद्वार यथाक्रमम् ॥ 23 ॥
    द्वारयुग्मं तु कर्तव्यं महासामन्तदायकम्। अन्येषां स्वल्पं राजानां ये स्थितामात्य सञ्जका। तेषां च तोरणं
    दद्यात् सिंहद्वार विवर्जित ॥ 24 ॥ सिंहायुग्मार्द्धेन कुर्यात् पत्रमाला त्रयोत्तमा। विप्राद्याक्षत्रियायुक्ता
    वैश्ययुग्ममालास्थिता ॥ 25 ॥ एकमाला तु शूद्राणां स्तम्भो द्विवशोच्छ्रिताः। स्तम्भैर्विंनोच्छ्रितो वंशा
    प्रकृतीनां तु सर्वतः ॥ 26 ॥ तोरणं कथितं वत्स आसनं शृणु साम्प्रतम्। आसनं कथयिष्यामि दिव्यमानेन
    सुव्रत ॥ 27 ॥ महाराजादि सूचितं त्रिविधं च सिद्धासनम् ॥ 28 ॥ भद्रासनं महाराज्ञे विलासैः पद्यसञ्ज्ञक।
    विकासतरिका तु सामन्तैः चातुरी मन्त्रिमण्डलम् ॥ 29 ॥ अन्येषां स्वल्प राजानां दातव्यं तु मस्तूरकम्।

482 अपराजितपृच्छा
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में राजालय,
सिंहासन, छत्र प्रमाण अधिकार नामक इक्यासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 81 ॥
राजभुवनं द्व्यशीतितमं सूत्रम् ॥ 82 ॥
विश्वकर्मोवाच –
चतुरश्रीकृते क्षेत्र भजेत्षोडश₁₆ भागिकम् ।
पदसङ्ख्यामितिः ख्याता षट्पञ्चाशच्छतद्वयम्₂₅₆ ॥ 1 ॥
(चूड़ामणि महाकूट वास्तु के प्रयोजनार्थ) श्री विश्वकर्मा कहने लगे कि चौरस
समतल किए गए क्षेत्र को सोलह भागों में विभाजित करें। इस तरह इनसे बनने
वाले पदों की संख्या 16 × 16 = 256 होगी।
ब्रह्माऽऽस्ते गर्भमावृत्य षट्त्रिंशत्पदकोष्ठकैः₃₆ ।
रुद्र₁₁ सङ्ख्यापदैर्युक्ता एकैके अर्यमादयः ॥ 2 ॥
इसमें ब्रह्मा का स्थान गर्भ को घेरकर छत्तीस पद कोष्ठकों वाला होगा।
अर्यमादि एक-एक देव रुद्रसंख्या में अर्थात् ग्यारह पदों में न्यसित करें।
चतुष्पदाष्टकर्णेषु द्वात्रिंशत्पदकल्पिताः₃₂ ।
बाह्यकर्णे तथा चाष्ट द्विपदा भक्तितो मताः ॥ 3 ॥
इसके आठों कोनों पर चार-चार पद कोष्ठकों से बत्तीस कोष्ठक कल्पित किए
जाते हैं (अर्थात् 8 × 4 = 32)। बाहरी कोनों पर बने आठ पदों को दो भागों में
विभक्त करने चाहिए।
अष्टावष्टपदा ज्ञेयाः शेषास्तु चतुरंशकाः ।
जयः सत्योऽथ वितथो गन्धर्वसुग्रीवासुराः ॥ 4 ॥
मुख्यश्चैव गिरिःख्यातः प्रत्येकं चाऽष्टपादकाः ।

गदिकापदगर्दी च सर्वेषां जनमण्डलम् ॥ 30 ॥ आसनं सन्थ सञ्ज्ञं तु शयनं सुखमुत्तमम्। यानं सुखासनं
प्रोक्तं यानं रथ समुच्यते ॥ 31 ॥ यानं महागर्ज पृष्टे यानं बिम्बादिसारयोः । गजष्टेतु भयविधं सन्धान
सञ्ज्ञकम् ॥ 32 ॥ व्यापान्रूपैर्विधिं शिखि कलापोद्भवम् । पुनएव तेध रूपाणि पताका छत्र मण्डलम् ॥ 33 ॥
चतुरशीत्यंगुल व्यासं छत्रवृतं उत्तमोत्तमम्। मध्यमं द्विसप्तसत्या षष्ठ्ययङ्गुल् कनिष्टकम् ॥ 34 ॥ शतादुर्द्धे
प्रसाद दाने शेषां प्रावृद्सु छत्रिकाः। छत्राभिकल्लीयुक़्तां षोडशाङ्गुल प्रतिष्ठां तालविनाः ॥ 35 ॥
कनकजदण्डोर्ध्व कलशं युग्म छत्रं तु भूपति। महामण्डलेश्वर कुर्यात् शिखिकलापोशर्करी ॥ 36 ॥
चामरालङ्कारयुक्तापि महाराजेश्वरं विदुः । इत्येवं क्रमाद्यो च राजालङ्कारशोभनम् ॥ 37 ॥ लक्ष्मीश्चरते नित्यं
यथा सा चक्रपाणिना। तपः समर्थ यते येन प्रतापकीर्तिवर्द्धनम् ॥ 38 ॥ (पाण्डुलिप्यात्) ।

सूत्र-८२ 483
चूडामणिर्महाकूटो वास्तु राजालयार्थकम् ॥ ५ ॥
इति चूडामणिमहाकूटवास्तुः।
ये आठ-आठ पद कहे गए हैं और शेष जो बचे, वे चतुर्थांश कहे गए है—
(1.) जय, (2.) सत्य, (3.) वितथ, (4.) गन्धर्व, (5.) सुग्रीव, (6.) असुर,
(7.) मुख्य और (8.) गिरि नाम के सभी प्रत्येक आठ पद कोष्ठकों के होते हैं।
इस प्रकार से राजालयों, राजमहलों के लिए चूड़ामणि महाकूट वास्तु बनता है।
शयनभाण्डागारवारीगृहादीनां —
वेश्ममध्यं ब्रह्मस्थानं शयनं च विवस्वतः।
भाण्डागारं क्षितिधरे मैत्रे वै वारिमन्दिरम् ॥ ६ ॥
अर्यम्णि सुरसौधं च कर्णान्तर्गुह्यवेश्मकम्।
आग्नेय्यामनलस्यैवं नैर्ऋत्यां वस्त्रसङ्ग्रहः ॥ ७ ॥
उक्त प्रकार से पद न्यास कर ब्रह्मस्थान के चार पद कोष्ठकों के मध्य के
दक्षिण- विवस्वत भाग में शयन स्थान बनाएँ। क्षितिधर और मैत्रेय के पदस्थान पर
भण्डार और जलमन्दिर बनाएँ। अर्यमा के स्थान पर देवता का गृह-सुरसौध बनाएँ
तथा कोनों पर अन्तर गुह्यगृह कोठार बनाएँ। आग्नेय भाग में, वायु भाग में और
नैर्ऋत्य भाग में वस्त्र संग्रह के भण्डार बनाए जाने चाहिए।
वायव्येचाऽष्टधातूनामीशाने शिवभाण्डकम् ।
मध्यकर्णे इमे प्रोक्ता बाह्वांश्च शृणु साम्प्रतम् ॥ ८ ॥
इसी तरह वायव्य में अष्टधातु के भाण्ड और ईशान में शिवभाण्ड रखने के
भण्डार बनाएँ। अब तक तो ये सब मध्य कर्ण में करने के कार्य बताए, आगे बाह्य
भाग में करने के कार्यों के बारे में सुनो।
अर्चनागृहमहासनकोष्ठागारशस्त्रागारमाह —
ईशाने चाऽर्चनावेश्म आग्नेय्यां च महानसम्।
कोष्ठागारं तु वायव्ये नैर्ऋत्ये शस्त्रमण्डपम् ॥ ९॥
ईशान कोण में अर्चनावेश्म अर्थात् देवपूजा-अर्चन का स्थान बनाएँ। आग्नेय
कोण में महानस अर्थात् बड़ा रसोईघर बनाएँ। वायव्य कोण में कोष्ठागार अर्थात्
बड़ा कोठार या समस्त सामग्रियों को रखने का स्थान बनाएँ। नैर्ऋत्य कोण के भाग
में शस्त्रागार रखने का शस्त्रमण्डप बनाया जाना चाहिए।
राजपदमकराक्षमाह —
याम्यस्थं वारुणस्थं च सौम्यस्थं चैव लक्षयेत्।

484 अपराजितपृच्छा
इदं स्थानं राजपदं कर्त्तव्यं शान्तिमिच्छता ॥ 10 ॥
यथोत्तरं मकराक्षं निर्गमे मकरान्वितम् ।
मत्तवरणछाद्यं च क्षेत्रपादैस्तु निर्गतम् ॥ 11 ॥
शान्ति के आकांक्षी को दक्षिण दिशा में, पश्चिम तथा उत्तर दिशा में कहीं भी
लक्ष्य करके या देखकर इन स्थानों में राजपद स्थान बनाना चाहिए। उत्तर दिशा की
ओर मकाराकृति युक्त निकले हुए मकराक्ष बनाए, जो क्षेत्र के पदों के बाहर की
ओर निकले हुए मत्तवारण युक्त छाजों से बने हों।
सभाष्टकानुसारेण पुष्पकसिंहासनमाह -
सभाष्टकयुक्तछन्देषु पूर्ववच्चाग्रनिर्गमः ।
वेद्युत्तरमुखं कार्यं पुष्पकं सिंहमासनम् ॥ 12 ॥
सुवर्णस्फटिकोपेतं नैकरत्नैर्विभूषितम् ।
पुष्पकं चतुःस्तम्भाढ्यं छाद्यघण्टाद्यलङ्कृतम् ॥ 13 ॥
सभाष्टक के युक्त छन्दों में पहले वर्णन किए गए तरीकों से बाहर की ओर
निर्गतम या निकले हुए ढंग में उत्तर दिशा की और मुख किए हुए वेदी बनाएँ और
उस पर पुष्पक नाम का सिंहासन लगाएँ, जो सोने और स्फटिक मणियों तथा
अनेकानेक रत्नों से विभूषित हो। पुष्पक सिंहासन के चारों स्तम्भाढ्य, विशाल स्तम्भ
भी छज्जों, चन्दोवों और घण्ट अर्थात् गुम्बजों से अलंकृत होने चाहिए।
हेमरत्नादिकोपेतं मुक्ताफलविभूषितम् ।
राजासनं मध्यपीठं कर्तव्यं शुभलक्षणम् ॥ 14 ॥
ऐसे सिंहासन के मध्य पीठ को सोने, रत्नों और मोतियों से विभूषित, शुभ
लक्षणों वाली राजासन से युक्त बनाना चाहिए।
दन्तिशालामाह -
सिंहद्वारं तु तस्याग्रे गजक्रीडा याम्योत्तरे।
सिंहद्वाराग्रतः कार्ये दन्तिशाले तथोभयोः ॥ 15 ॥
इस सभा के आगे सिंहद्वार अर्थात् बड़ी पोल बनानी चाहिए जिसके दायें-बायें
अर्थात् दक्षिण और उत्तर दोनों ओर गजक्रीड़ा के योग्य चौगान क्षेत्र बनाने चाहिए।
तदग्रे विजयद्वारं कर्णावुभौ च स्वाग्रतः ।
प्रतोल्या च तथोपेतं प्राकारैः परिवेष्टितम् ॥ 16 ॥
इसके लिए सिंहद्वार अर्थात् बड़ी पोल के आगे ही दोनों ओर दो दन्तिशालाएँ
(गजशाला. हाथियों के ठाण) बनाने चाहिए। इसके बाद, सभा मण्डप के चौक या

सूत्र-८३ 485
चौगान के उपरान्त, आगे की ओर दोनों कोनों पर और सामने के भाग में विजयद्वार
अर्थात् विजय पोल बनानी चाहिए जिनके बाहर प्रतोल्या स्तम्भ युक्त पोलें प्राकार
अर्थात् परकोटे से वेष्टित बनाई जाए।
राजवेश्मोभयपक्षे राज्ञीनां भवनादिकम्।
द्विभूमोच्छ्रयहीनानि शेषाणां क्रमयोगतः॥ 17 ॥
इसी प्रकार राजवेश्म अर्थात् राजा के रहने के राजमहल के दोनों पक्षों में, दोनों
ओर रानियों के भवनादि बनाने चाहिए। शेष अन्य सभी के भवन रानियों के भवनों
से दो मंजिल या द्वितल कम रखने चाहिए।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
राजभुवनाधिकारो नाम द्व्यशीतितमं सूत्रम्॥ 82 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में राजभुवन
अधिकार नामक बयासीवाँ सूत्र पूर्ण हुआ॥ 82 ॥
एकत्रिपञ्चप्रतोली नाम त्र्यशीतितमं सूत्रम्॥ 83 ॥
विश्वकर्मोवाच —
प्रतोलीश्च प्रवक्ष्यामि कनिष्ठ-मध्यमो-त्तमाः।
उच्छ्रयस्त्रिविधो वत्स द्वारां प्राकारतोऽपि च॥ 1 ॥
विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! अब मैं प्रतोली अर्थात् पोलों के बारे में कहता
हूँ। ये इनकी ऊँचाई के अनुसार और द्वारों के प्राकार अर्थात् परकोटे के अनुसार भी
तीन प्रकार की होती हैं— कनिष्ठ, मध्यम और उत्तम।
प्रतोल्योच्छ्रयप्रमाणमाह —
प्रतोल्या द्वारउत्सेधः पञ्चदशकरैः₁₅ शुभः।
मध्यस्त्रयोदशकरैः₁₃ रुद्रहस्तैः₁₁ कनिष्ठकः॥ 2 ॥
इन प्रतोलियों में उत्तम प्रतोली के द्वार की ऊँचाई पन्द्रह गज की शुभ कही गई
है, मध्यम की तेरह गज और कनिष्ठ की ग्यारह गज की ऊँचाई शुभ है।
कनिष्ठमेकभूमं₁ च द्विभूमं₂ चैव मध्यमम्।
उत्तमं च त्रिभूमं₃ स्यात् त्रिधोदितक्रमागतम्॥ 3 ॥
इनमें कनिष्ठ पोल या प्रतोली एक मंजिला ही होती है परन्तु मध्यम जाति की
प्रतोली दो मंजिला होती है और उत्तम जाति की प्रतोली तो तीन मंजिला होती है।
इस तरह क्रम से ये तीन प्रकार की ऊँचाई युक्त बनाई जाती हैं।

486
तत्रैव विस्तारमाह —
उत्तमं चाऽष्टहस्तैश्च₈ सप्तहस्तैश्च₇ मध्यमम्।
कनिष्ठं चैव षड्ढस्तैर्विस्तार₆स्त्रिविधो₃ मतः ॥ 4 ॥
इनमें उत्तम प्रतोली या पोल की चौड़ाई (विस्तार) आठ गज की, मध्यम
प्रतोली की चौड़ाई सात गज की और कनिष्ठ प्रतोली की चौड़ाई छह गज की होती
है। इस तरह इनकी चौड़ाई भी तीन प्रकार की बताई गई है।
नवहस्तोच्छ्रिता₉ स्तम्भाः कुम्भकैः सुसमन्विताः।
ऊर्ध्वमेक₁ द्वि₂ त्रिक्षणा₃ मालिकाश्च ह्यनुक्रमात् ॥ 5 ॥
नौ गज ऊँचाई के स्तम्भ कुम्भकों से युक्त हों और उनके ऊपर एक, दो अथवा
तीन क्षणामालिका अनुक्रम से बनाई जाए अर्थात् एक, दो या तीन अवसर, खाली
स्थान छोड़ते हुए मालिका अर्थात् माल अनुक्रम से बनाएँ।
मदलाःशीर्षस्तम्भिका निर्व्यूहे मदलाः पुनः।
स्वस्तिकाद्वयं शीर्षोर्ध्व निर्व्यूहे मदलाः पुनः ॥ 6 ॥
जैसे कि मदल स्तम्भ के शीर्ष पर बनाएँ और फिर निर्यूह (नेजू) बनाकर उन
पर पुनः मदल की रचना करें और उनके शीर्ष पर दो स्वस्तिक बनाकर निर्यूह
बनाए तथा उन पर पुनः मदल की रचना करनी चाहिए।
शीर्षोर्ध्वे च भवेत्पट्टः शाखाद्यं चोत्तराङ्गकम्।
तुला जयन्ती पीता सा ? निर्मलं कपिशीर्षकम् ॥ 7 ॥
इसके उपरान्त उसके शीर्ष के ऊपर छाबने का पाट धरें जो शाखा से लेकर
उत्तराङ्ग अर्थात् छाबना बनें, यह जयन्ती नामक तोरण तुला कहलाती है जो निर्मल
है और उसके ऊपर कँगूरे बने होते हैं।
तदूर्ध्वे च पुनर्भूमिंश्चतुर्द्वारं तृतीयके।
दृढार्गलाः कपाटाश्चाऽपवरकास्ततः परम् ॥ 8 ॥
इनके ऊपर पुनः तीसरी भूमि अर्थात् तीसरी मंजिल के चार द्वार बनाए जाए
जिनके दृढ़ किंवाड़ हों और उनके बन्द करने अर्गला-आगल लगाने की व्यवस्था
हो जिससे द्वार के किंवाड़ सुदृढ़ रूप से बन्द रहें तथा उसके परे भी दूसरे द्वार और
कपाट अपवरक— इस प्रकार दृढ़तर बनाएँ।
प्रतोलीचतुष्टये मुखद्वारमाह —
वक्त्रद्वाराणि वक्ष्यामि प्रतोलीनां चतुष्टयम्।
अनुक्रमेण कर्तव्यं कश्यापि यथावत ॥ 9 ॥

सूत्र-८३ 487
अब मैं प्रतोली चतुष्टय के मुख-द्वारों के बारे में क्रम से निर्माण-विधि संक्षेप
से कहता हूँ।
उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च हीनबाहुस्तथापरः।
प्रतिकाय इति प्रोक्तं प्रतोलीनां चतुष्टयम् ॥ 10 ॥
प्रतोली-चतुष्टय में एक द्वार उत्सङ्ग, दूसरा पूर्णबाहु, तीसरा हीनबाहु एवं चौथा
प्रतिकाय संज्ञक होता है।
उत्तरामुख उत्सङ्गः पूर्णबाहुश्च पूर्वतः।
अपरे हीनबाहुश्च प्रतिकायस्तु दक्षिणे ॥ 11 ॥
इसमें उत्तरामुखी द्वार उत्संग होता है, पूर्णबाहु पूर्व दिशा सम्मत, हीनबाहु
पश्चिमाभिमुख एवं प्रतिकाय दक्षिणाभिमुख होता है।
सृष्टिप्रवेश उत्सङ्गः प्रतिकायोऽपसव्यतः।
पूर्णबाहुः पूर्ववक्त्रो वामास्यो हीनबाहुकः ॥ 12 ॥
सृष्टि-प्रवेश (सृष्टिक्रम से) द्वार उत्सङ्ग कहा जाएगा, अपसव्य क्रम से
प्रतिकाय होगा अर्थात् दायीं ओर होगा। पूर्णबाहु पूर्वमुख होता है और हीनबाहुक
दक्षिणमुखी।¹
वामभागे दिशि दिशि वामावर्तोद्भवस्तु ये।
द्वारं च दक्षिणावर्तं कथितं त्वपराजित ॥ 13 ॥
इसके वाम भाग या बायें भाग में प्रत्येक दिशा में आवर्त (परिक्रमणक) होते
हैं। इनके द्वार दक्षिणावर्त होते हैं। हे अपराजित ! ऐसा कहा गया है।
पोलसमूहमाह -
एकपोल्यं त्रिपोल्यं वा पञ्चपोल्यमथोच्यते ।
एवंविधः प्रकर्तव्यः पोल्यानां तु समुच्चयः ॥ 14 ॥
अब पोल समूह के बारे में कहता हूँ। ये तीन प्रकार की होती है— एक पोल
वाली, त्रिपोल्य या तीन पोल वाली तथा पञ्चपोल्य या पाँच पोल वाली।

  1. यह वर्णन समराङ्गण. में द्वार के प्रसंग में आया है-उत्सङ्गो हीनबाहुश्च पूर्णबाहुस्तथापरः। प्रत्यक्षायश्चतुर्थश्च
    निवेशः परिकीर्तितः ॥ उत्सङ्ग एवदीक्षाभ्यां (?) द्वाराणां वास्तुवेश्मनोः। स
    सौभाग्यप्रजावृद्धिधनधान्यजयप्रदः ॥ यत्र प्रवेशतो वास्तु गृहं भवति वामतः। तद्धीनबाहुकं वास्तु निन्दितं
    वास्तुचिन्तकैः ॥ तस्मिन् वसन्प्रव्यथितः स्वल्पमित्रोऽल्पबान्धवः । स्त्रीजितश्च भवेन्नित्यं विविधव्याधिपीडितः ॥
    वास्तुप्रवेशतो यत् तु गृहं दक्षिणतो भवेत्। प्रदक्षिणप्रवेशत्वात् तद् विद्यात् पूर्णबाहुकम् ॥ तत्र पुत्रांश्च पौत्रांश्च
    धनधान्यसुखानि च। प्राप्नुवन्ति नरा नित्यं वसन्तो वास्तुनि ध्रुवम् ॥ गृहपृष्ठं समाश्रित्य वास्तुद्वारं यदा भवेत्।
    प्रत्यक्षायस्त्वसौ निन्द्यो वामावर्तप्रवेशवन् ॥ (समराङ्गण. 39, 11-17)

488
एकपोल्यं वक्त्रद्वारं त्रिपोल्यं भ्रमणीद्वयम्।
पञ्चपोल्यं तु चित्राढ्यं कर्तव्यं सर्वकामदम्॥ 15 ॥
एक पोल का तो मुख्य द्वार एक ही होता है परन्तु त्रिपोलिया में दो भ्रमणी
होती है तथा पञ्चपोल्य में तरह-तरह के चित्र अर्थात् मूर्ति अलङ्करणों की आढ्य-
भरमार होनी चाहिए जो सर्व कामनाओं को पूर्ण करने वाली है।
तस्य प्रकारलक्षणमाह —
प्राकारादियुक्तभागैर्विस्तरो भागषट्कतः।
निर्गमश्च चतुर्भागैः प्राकारो यत्र वाञ्छितः॥ 16 ॥
इन पोलों के प्राकार अर्थात् परकोटे भी समुचित भागों के विस्तार वाले होते
हुए छह भाग तक होते हैं। जहाँ-जहाँ प्राकार-परकोटा वाञ्छित है, वहाँ-वहाँ
उसका निकास-निर्गम चार भागों तक का होना चाहिए।
याम्यपार्श्वे समस्तत्र विस्तरस्तु त्रिभागिकः₃।
निर्गमश्च त्रिभागैश्च₃ सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 17 ॥
बायें भाग के समस्त अर्थात् बायीं बाजू के समस्त परकोटे तीन भाग के
विस्तार-चौड़ाई वाले होने चाहिए। उनका निकास भी तीन भाग का होना चाहिए।
ये सब मेरे द्वारा संक्षेप में कह दिया गया।
अन्यदप्याह —
त्रिभागं दक्षिणे त्यक्त्वा द्विभागं च तथोत्तरे।
शेषा प्रतोली चैकांशा भागं दक्षिणभित्तिका॥ 18 ॥
तीन भाग दक्षिण की ओर छोड़कर तथा दो भाग उत्तर की ओर छोड़े; एक
अंश-भाग प्रतोली की दक्षिणी भित्ति का होता है।
भवेत् भागोत्तरा भित्तिः कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃।
दक्षिणे भित्तिपार्श्वेऽग्रे कर्णान्ते वलणं त्रिभिः₃॥ 19 ॥
जो भाग उत्तर की ओर की भित्ति का होता है, उसके कोने तक तीन वलण
(घूमाव) होते हैं तथा उसके दक्षिण की भित्ति के पार्श्व में भी आगे की ओर कोने
तक तीन वलण होते हैं।
द्विभागं विस्तरं कुर्याद् वक्त्रमार्गप्रवेशनम्।
एकपोल्यमिति ख्यातं सङ्क्षेपात्कथितं मया॥ 20 ॥
द्वार के मुखमार्ग में प्रवेश करने के लिए दो भाग का विस्तार होना चाहिए। इस