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अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

सूत्र-७८ 455
युध्यमानास्तथा ¹कुर्यान्तरांश्च मारणे रतान् ॥ ३६ ॥
गजोद्भवा तत्र माता अश्वमाता सन्धोद्गमैः ? ।
सभा के अवसर पर राजा व सभासद के सामने निरीक्षण के लिए सजे-धजे,
आभरणों से भूषित, महोत्कट गजदलों को लाया जाता है जो युद्ध में लड़ने के
निमित्त ही तैयार किए हों तथा नरों को मारने में रत रहने के लिए पूरी तरह से
सिखाए गए हों। यह चतुर्थ गजोद्भवा माता के बारे में कहा गया, इसी तरह पाँचवीं
अश्वमाता के बारे में भी सन्धिकाल को समझें।
परराष्ट्रोद्भवा ये च समये तत्र दर्शयेत् ॥ ३७ ॥
तस्यां ? मनोभवः कम्पः स्वराज्यं च स्वर्गा( ?-र्गा )त्पतिः ।
लघुराष्ट्रोद्भवा ये च प्रसङ्गे दर्शयेदपि ॥ ३८ ॥
इस बीच, सभा में कोई परराष्ट्र में जन्मे व्यक्ति तथा राजदूत आदि दिखाई देते
हों तो राजा उनके मनोभाव, कम्प-दशा, उनके राज्य के बारे में जानकारी प्राप्त करने
के लिए भेंट करें, उनके पूर्वजों के बारे में भी जानकारी लें। इसी तरह लघु राष्ट्रों में
उत्पन्न कोई लोग इस प्रसङ्ग में दिखाई दें तो उनसे भी प्रेमपूर्वक भेंट का अवसर
प्राप्त किया जाए।
महाराजाधिराजश्च परमेश्वरसञ्ज्ञितः ।
भुवनैकनाथो महाराजचक्रचूडामणिः ॥ ३९ ॥
क्योंकि, यह ज्ञातव्य है कि महाराजाधिराज एक प्रकार से परमेश्वर स्वरूप हैं
जो इस पृथ्वी का एकमेव स्वामी है और महाराज चक्रचूड़ामणि हैं अर्थात् एक
चक्रवर्ती, एकछत्र महाराजाधिराज है।
भूपालः सर्वकलाकुशलः उमापतिवरलब्धप्रतापतेजाः ।
तथाऽन्यनृपाद्यमुखदर्पणो धर्मादिप्रशस्यावतारः ॥ ४० ॥
ऐसा भूपाल सब कलाओं में कुशल और उसे उमापति भगवान् शिव का
वरदान प्राप्त है और उसी के प्रताप, तेज से तथा अन्य राजाओं के लिए मुखदर्पण
की तरह आदर्श रूप है जो धर्मादि के प्रशस्त-मान्य अवतार स्वरूप ही है।
इति सूत्रसन्तानगुणकीर्तिप्रकाशप्रोक्तश्रीभुवनदेवाचार्योक्तापराजितपृच्छायां
महाराजाधिराजाधिकारो नामाष्टसप्ततितमं सूत्रम् ॥ 78 ॥
इस प्रकार भुवनदेवाचार्य कृत सूत्रसन्तानगुणकीर्ति प्रकाश या अपराजितपृच्छा में
महाराजाधिराज अधिकार नामक अठहत्तरवाँ सूत्र पूर्ण हुआ ॥ 78 ॥

  1. 'कुर्यान्नृवांश्च' इति प्रकाशित पाठः।

430 ...क्षा
गजशालाप्रमाणहस्तिलक्षणकमेकोनाशीतितमं सूत्रम् ॥ 79 ॥
अधुना गजशालार्थं क्षेत्रभक्तिविधिं। विश्वकर्मोवाच —
लक्षणं गजशालानां कथयिष्याम्यनुक्रमात् ।
षट्त्रिंशद्भिः पदैर्भक्तं क्षेत्रं विंशतिभिः करैः ॥ 1 ॥
विश्वकर्मा बोले कि अब मैं अनुक्रम से गजशालाओं (हाथी बान्धने के ठाणों,
पीलखाना) के बारे में कहता हूँ और उनके लक्षण बताता हूँ। इसके लिए सर्वप्रथम
बीस गज के लम्बे चौड़े क्षेत्र को छत्तीस पदों में विभक्त करें।
वेदांशमध्यगर्भाढ्यं गजस्थानं महोत्तमम्।
दृढस्तम्भं भवेन्मध्यं घटैर्नवकरैर्युतम् ॥ 2 ॥
उन छत्तीस पदों में मध्य के चार पदों के गर्भस्थान को महोत्तम गजस्थान
अर्थात् गज का ठाण समझें। इस गजस्थान के मध्य में नौ गज के पाषाण के घड़े
हुए दृढ़ स्तम्भ अर्थात् खुमाल बनाएँ।
अलिन्दवेष्टितं भागे भागे भित्त्या च संयुतम्।
विस्तरोच्छ्रयतुल्यश्च पट्टानामुदयो भवेत् ॥ 3 ॥
इसके लिए अलिन्द या बरामदा बनाएँ जिसके बाहर भींत बनी हों। उस भींत
की ऊँचाई उसके विस्तार के बराबर हो अर्थात् क्षेत्र के दो पद लगभग सात गज
(चौदह फीट) हो और उस पर पट्टियों की छवाई की छत बनाई जाएँ।
भित्तित्रयसमायुक्तं द्वारमग्रदिशान्तिके।
छाद्यत्रयं क्रमयुक्तं घण्टाकलशभूषितम् ॥ 4 ॥
तीन ओर तीन भित्ति हो और आगे का भाग द्वार के रूप में खुला छोड़ें और
तीन ओर की छत की छवाई पर गुम्बज और कलश बनाकर उसको सुन्दर रचना
प्रदान करें।¹

  1. अमरकोश में गजशाला को वारी कहा गया है— वारी तु गजबन्धनीयत्यमरः। वराहमिहिर ने योगयात्रा
    में वारी या गजशाला के निर्माण की विधि इस प्रकार दी है— 150 हाथ लम्बा और 120 हाथ चौड़ी
    चतुष्कोण या वृत्ताकार हस्तिशाला के लिए वृद्धिकारक होती है। दस हाथ ऊँचा, दस हाथ लम्बा व
    चौड़ा तथा एक हाथ गहरा हस्तिस्थान बनाना चाहिए। हस्तिशाला का द्वार पूर्व दिशा में होना चाहिए,
    उत्तर में भी द्वार शुभदायक होता है किन्तु दक्षिण या पश्चिम में कभी द्वार नहीं रखना चाहिए। पूर्व व
    उत्तर दिशा में द्वार स्तम्भ गाड़ना चाहिए। उसमें सुदृढ काष्ठदण्डों को जोड़ना चाहिए तथा पश्चिम से पूर्व
    और दक्षिण से उत्तर की ओर अर्गला बनानी चाहिए। द्वार का विस्तार दस हाथ चौड़ा और दस हाथ
    ऊँचा रखना चाहिए। द्वार स्तम्भ के दोनों ओर चार-चार हाथ गड्डा खोदना चाहिए। द्वार के स्तम्भ की
    ऊँचाई चौदह हाथ से अधिक रखनी चाहिए। हस्तिशाला के द्वार के बाद घेरा बनाने में एक बड़े स्तम्भ

सूत्र-७१ 457
दन्तिन्यादि षड्विधा गजशालाह —
दन्तिनी नाम विज्ञेया शाला विघ्नहरी सदा।
अलिन्दयुक्तं भूस्थानं भित्तिर्बाह्यो तु भागिका ॥ ५ ॥
तस्या द्वारप्रदेशे तु कर्तव्यौ कूर्परावुभौ ।
कर्णप्रासादिका कार्या द्वितीयालिन्दसंयुता ॥ ६ ॥
इनमें 'दन्तिनी' नाम की गजशाला सभी विघ्नों को हरने वाली समझी गई है।
यह अलिन्द अर्थात् बरामदा युक्त होती है। इसका भूमि स्थान बाहर की ओर
भित्तियुक्त होता है। उसके द्वार के प्रदेश में दो कूर्पर अर्थात् खुमाले बनाए जाए, जो
दोनों ओर हों। 'कर्णप्रासादिका' नामक गजशाला दूसरे प्रकार की है जिसके भी
आलिन्द बने होते हैं।
द्वे द्वे वातायने कुर्याद् द्विद्विदिक्षु त्रिभित्तिकाः ।
प्राग्ग्रीवोऽग्रे भवेच्छाला सुभद्रेयमुदाहृता ॥ ७ ॥
इस गजशाला के दो-दो झरोखे, वातायन प्रत्येक भींत में तीनों ओर की
दिशाओं में बनाए जाएँ और उसके पूर्व की ओर एक शाला भी बनाएँ जो सुन्दर
भद्र या दीवारों युक्त बनी हों।
अस्या एव यदा स्यातां प्राग्ग्रीवौ पार्श्वयोर्द्वयोः ।
तदा सुभोगदा नाम तृतीया परिकीर्तिता ॥ ८ ॥
ऐसी ही एक अन्य गजशाला के पूर्व की ओर आगे दोनों पाश्र्वों में शाला बनी
हो, तो ऐसी गजशाला को 'सुभोगदा' नामक तीसरी गजशाला कहा जाता है।
अस्या एव यदा पश्चात् प्राग्ग्रीवः क्रियतेऽपरः ।
भद्रिका नाम शाला सा तदा द्विरदपुष्टिदा ॥ ९ ॥
के बाद पाँच छोटे-छोटे स्तम्भ स्थापित करने चाहिए। उन स्तम्भों को चार-चार हाथ नीचे गाड़ना
चाहिए। उन स्तम्भों में क्रम से छह, सात, आठ, नौ और दस छिद्र बनाने चाहिए और मातृका यानी
कील छह अङ्गुल की बनानी चाहिए। इनको क्रमशः वेध योग्य छिद्रों में वेधित करना या ठोंकना
चाहिए। इस प्रकार हस्तिशाला का सुदृढ़ द्वार बनाना चाहिए — सार्धं हस्तशतं दैर्घ्या सविंश
विपुलाशतम्। चतुरस्राऽथवा वृत्ता वारी वारणवृद्धिदा ॥ दशावगाहेन करा विस्तीर्णा दश चोपरि। अधः
खातस्य पदवी हस्तमात्रा प्रकीर्तिता ॥ कर्तव्यं पूर्वतो द्वारमुत्तरं वा शुभावहम्। दक्षिणं पश्चिमं वाऽपि न
कर्तव्यं कथञ्चन ॥ मेढकस्तम्भ मातृणां वृक्षाग्रं नावनौ क्षिपेत्। पूर्वाग्रञ्चोत्तराग्राच्च संयोज्या नित्यमर्गला ॥
दश विस्तारतो द्वारं पार्श्वयोस्तस्य मातृकाः। चतुर्दशकरोत्सेधा निःखात्य चतुरः करान् ॥ षट्सप्तमेढान्तरस्थाश्च
मेढकाः पञ्च पञ्च च। चतुर्हस्तनिखातास्ते समुच्छ्रायान्वदाम्यतः ॥ षट्सप्ताष्टनवोत्सेधा दश चेति
यथाक्रमम्। नव वा दश वा वेधा मातृका याः षडङ्गुलाः ॥ वेधहान्यावशेषाः स्युर्मातृकाः क्रमशोऽपराः।
इति द्वारसमासोऽयं वार्य्यासम्मपरिकीर्तितः ॥ (योगयात्रा 10, 2-9)

ऐसी ही एक अन्य गजशाला के पीछे की ओर प्राग्रीव शाला बनी हो तो उसे
'भद्रिका' नामक गजशाला कहते हैं जो हाथियों को पुष्टि देने वाली मानी जाती है।
यह चौथे प्रकार की गजशाला है।
पञ्चमी चतुरश्रा स्याद् वर्षिणी नाम पूजिता।
प्राग्ग्रीवालिन्दनिर्यूह-हीना षष्ठी तथा परा ॥ 10 ॥
शाला प्रमारिका धान्यधनजीवितहारिणी।
तदेतां वर्जयेदन्याः कुर्यात्सर्वार्थसिद्धये ॥ 11 ॥
पाँचवें प्रकार की गजशाला का नाम 'वर्षिणी' है जो भी चौकोर आकार वाली
होती है। इसी तरह प्राग्रीव, अलिन्द व निर्यूह से रहित छठवें प्रकार की गजशाला
भी होती है जिसका नाम 'प्रमारिका' कहा गया है। ऐसी गजशाला धान्य, धन और
जीवन का नाश करने वाली होती है। अस्तु, यह वर्जनीय है। इसे न बनाए और
अन्य सभी पाँचों प्रकार की गजशालाएँ सर्वार्थ सिद्धिदायक होती है, अतः उन्हें
अवश्य बनाएँ।
प्रमाणमिति शालानां हस्तिशालाः क्रमोदिताः।
षड्विधच्छन्दजा उक्ता वित्तजीवितवृद्धये ॥ 12 ॥
इति षड्विधा¹ गजशालाः।
इस प्रकार मैंने गजशाला का क्रमिक प्रमाण और स्वरूप बताया, जो छह प्रकार
के छन्दों में निर्मित होती है और जिनसे धन और जनजीवन की वृद्धि होती है।
अधुना भद्रादीनां चतुर्विधा गजलक्षणमाह —
अथातः सम्प्रवक्ष्यामि हस्तिनां लक्षणं परम्।
गजा भद्रो मृगो मन्द्रः सङ्कीर्णश्च चतुर्विधाः ॥ 13 ॥
अब मैं हाथियों के प्रधान लक्षणों को कहता हूँ। हाथियों के चार प्रकार होते हैं
यथा— (1.) भद्र. (2.) मृग. (3.) मन्द्र और (4.) सङ्कीर्ण।
मुखन्ये ( स्य ) द्विगुणा दैर्घ्यं दीर्घाजे² जठरं भवेत् ? ।
जठरार्द्धं भवेद् गात्रं गात्रार्द्धं करमूलतः ॥ 14 ॥
मूलार्द्धं च भवेदग्रं तत्तुल्या दंष्ट्रिकोत्तमा।
दंष्ट्रास्थौल्यार्द्धनखाश्च क्रमेण परिकीर्तिताः ॥ 15 ॥

  1. गजशाला का उक्त वर्णन समराङ्गणसूत्रधार से उद्धृत है। (द्रष्टव्य समराङ्गण. अध्याय 32)
  2. दीर्घाद्धे- स्यात्।

सूत्र-७९ 459
हाथी के प्रमाण के लिए उसके मुख को आधार माना गया है। हाथी के मुख
से उसकी लम्बाई दुगुणी होती है और लम्बाई का आधा उसका जठर या पेट होता
है। जठर का आधा उसका गात्र होता है और गात्र का आधा उसकी सूण्ड का मूल
भाग होता है। उसकी सूण्ड के मूल भाग का आधा उसकी सूण्ड का अग्रभाग होता
है और उसके बराबर ही उसके दाँत की मोटाई होती है। उसके दाँत की मोटाई से
आधा उसका नख भाग होता है, यह सब मैंने क्रमवार बता दिया है।
स्थिरास्थिरैर्न्यतस्यास्ता युग्मं कुम्भानुवृत्तोद्भवा ?।
तस्याधो चाग्रगर्भे तु वायु(क्तं) कुम्भास्तदोर्ध्वतः ?॥ 16 ॥
(पाठ अस्पष्ट है फिर भी) हाथी के स्वभावानुसार अपने सिर को स्थिर व
कभी अस्थिर रखता, इधर-उधर झूमता हुआ, सिर पर दो कुम्भों के समान गोल-
गोल कुम्भ स्थल उभरे होते हैं। उन दोनों के नीचे की ओर आगे के गर्भ भाग के
एक ओर कुम्भाकार उभार होता है, जो हाथी के ललाट का उभरा हुआ भाग होगा।
कुम्भकार¹ललिताङ्गुष्ठावुभौ दंष्ट्रानुमध्यतः ?।
निम्न निम्ना दीर्घकरैर्भूत्प्राप्ते कदस्तकुण्डलीकृता ?॥ 17 ॥
इसी तरह हाथी के दाँतों के मध्य भाग में भी दोनों ओर कुम्भ के आकार का
उभरा हुआ सुन्दर अङ्ग होता है जो दाँतो के ऊपर होठ का काम करता है और
उसके नीचे-नीचे होती हुई एक लम्बी सूण्ड भूमि तक जाती हुई आगे जाकर
कुण्डली रूप में मुड़ जाती है।
पद्मपत्रस्तदा तुष्टं विपुलं कपोलं गम्भीरतः ?।
सौम्यत्तमद गण्डस्थलः श्रवणा शोषपर्णवाकृति ? ॥ 18 ॥
उसके बड़े बड़े कमल पत्तों के समान गम्भीर कपोलों से निकले हुए दो कान
होते हैं जिनके पास के गण्डस्थल, ललाट भाग से शीतल मद झरता रहता है,
उसके कान बड़े पड्ढे की तरह बने होते हैं।
वायुकुम्भोभयपाश्र्वे सूक्ष्म पिङ्गलोद्भवाः ?।
हयखुराकारमेतद् दंष्ट्रावर्णश्च चम्पकः ॥ 19 ॥
हाथी के मस्तक के दोनों ओर वायुकुम्भ अर्थात् गलफड़े कुछ-कुछ पीलेपन
से युक्त होते हैं जो घोड़े की खुरों के आकार के होते हैं। उनसे ही चम्पक के सफेद
रङ्ग के समान रङ्ग वाले दाँत निकले होते हैं।

  1. 'कुम्भाकार'-इति स्यात्।

अग्रे तु तादिसि पुच्छान्त पृष्ठ अर्धोन्नता।¹
ग्रीवास्तु ललिताङ्गाश्च वृत्ता ²पादपोत्तमाः ॥ 20 ॥
सुविस्तीर्णा यस्य कुक्षिरर्धचन्द्राकृतिर्नखः।
सामान्यं मेढ्रमूलं च भद्राख्यः सर्वकामदः ॥ 21 ॥
आगे की ओर से पुच्छ के अन्त तक हाथी की पीठ आधे में कुछ उठी हुई
होती है और हाथी की ग्रीवा बड़ी सुन्दर अङ्ग की गोल पेड़ के आकार की यानी
पादप के गोल स्तम्भ जैसी। हाथी की काँख काफी विस्तीर्ण होती है। पाँवों के नख
अर्धचन्द्राकृति के होते हैं। हाथी का मेढ्रमूल (जननेन्द्रिय का मूल) सामान्य होता
है— ऐसे स्वरूप या लक्षण वाला 'भद्र' नामक हाथी होता है जो सकल
मनोकामना पूर्ण करता है।
वादित्रैश्च समुत्साही सङ्ग्रामे चैव दुर्धरः।
सदानन्दोद्यतकरः प्रकरे सैन्यके पतिः ॥ 22 ॥
भद्र नामक हाथी गाजे-बाजे, नगारे, रणभेरी आदि वाद्यों के बजने पर बड़ा
उत्साही हो जाता है और ऐसी स्थिति में संग्राम स्थल में बड़ा दुर्धर या पराक्रमी हो
जाता है। सदा वह आनन्द में अपनी सूण्ड को ऊपर उठाए हुए सेना के समूह का
नेतृत्व करता है मानो सेनापति स्वयं हो।
अविघ्नाक्षः साधुजने कालः क्रूरजने सदा।
महोत्कटो हस्तिबिम्बे नृपदृष्टेऽतिनन्दकृत् ॥ 23 ॥
यह भद्र हाथी बड़ा ही समझदार होता है। यह सज्जनों को कोई विघ्न नहीं
पहुँचाता परन्तु क्रूर और दुष्ट जनों के लिए यह कालरूप बन जाता है— यह उसका
सदा का ही स्वभाव है। ऐसे महोत्कट, बलवान और समझदार हाथी का बिम्ब
अर्थात् शरीर-स्वरूप राजा की दृष्टि को बड़ा आनन्द पहुँचाने वाला होता है अर्थात्
राजा ऐसे गुणवान हाथी को देख-देख कर सदा प्रसन्न रहते हैं।
पूजनीयः सदा राज्ञः तद्दन्तश्रीमहोत्तमा।
तदेवा नृप सङ्कल्पं³ सर्वानन्दकरो भवेत् ॥ 24 ॥
इसलिए ऐसा भद्रक हाथी राजा के लिए सदा पूजनीय है और उसके दाँतों की
शोभा बड़ी महान है और उसी के अनुरूप राजा के सभी सङ्कल्प भी सर्वानन्द करने

  1. 'अग्रे त चा द्रिसी पुच्छाद्यं पृष्ठ अर्धोन्नता ?' इति प्रकाशित पाठः।
  2. 'पादकोत्तमाः ?' इति प्रकाशित पाठः।
  3. 'तदेवानप सकलापं ?' इति प्रकाशित पाठः।

सूत्र-७९ 461
वाले होते हैं।
समुद्रा सवक्त्रा सारी आपसे बालदंष्ट्रिणाम्।
तस्य दन्ता भुजा सञ्ज्ञा धनुर्हस्ताबाणोत्तमैः ॥ २५ ॥¹
अपने मुख मुद्रा के ढंग से अर्थात् कठोर दाँतों से युक्त होने से उसके दाँत ही
उसकी भुजा का नाम रखने वाले और महत्व के होते हैं मानो वे हाथों में धनुष और
बाण लिए हुए हो।
रिपुराजनृपाः सर्वे चिन्तात्मानो भयातुराः ।
आयुधत्यक्ताग्रतश्च स भवेद् भुवनेश्वरः ॥ २६ ॥
इति भद्रजातिलक्षणम्।
ऐसे बलवान और उत्तम गजराज से सभी शत्रु राजागण सदा चिन्ता में रहकर
भयातुर रहते हैं और वे अपने आयुधों को उसके आगे त्याग कर ही (हथियार
डालकर) कृपाकांक्षी बने रहकर अपनी भूमि के स्वामी बने रह सकते हैं।²
अथ मृगजातिलक्षणमाह —
दीर्घवक्त्रः श्रीमुखश्चाऽपि निर्मांसकपोलकः ।
सुलोचनश्चलनेत्रः श्रवणद्वयातिक्रमः ॥ २ ॥
भूम्यन्तं करदीर्घत्वं दन्तोर्ध्वं क्षामविस्तरम्।
तनुर्दीर्घोदरं क्षामं लघुमारः पवनात्मजः ? ॥ २८ ॥
वातात्मजमहावेगोऽङ्कुशमानयते क्रमम्।
उच्चनीचसमान् भागान् क्रमते शीघ्रचेतसा ॥ २९ ॥
द्वितीय मृग जाति का गज लम्बे मुख और सुन्दर मुख वाला होने पर भी
निर्मांस कपोल, सुन्दर और चञ्चल नेत्रों वाला, बड़े-बड़े दो कानों वाला, भूमि तक
पहुँचती लम्बी सूण्ड वाला होता है। उसके दाँतों का ऊपरिभाग कम विस्तार वाला

  1. 'समुद्र सवक्ता सारी आपसेवालदंष्ट्रिणाम् ? । तस्य दन्ता भुजा राज्ञा ? धनुर्हस्ताबाणोत्तमैः ? ॥' इति
    प्रकाशित पाठः ।
  2. पालकाप्य के गजशास्त्रम् में हाथियों का वर्णन विस्तार से हुआ है। भद्रादि संज्ञक गजों के लिए कहा
    गया है— धैर्यं शौर्यं पटुत्वं च विनीतत्वं सुकर्मता। अन्वर्थवेदिता चैव भयरूपेष्वमूढता॥ सुभगत्वं च
    वीरत्वं भद्रस्यैते गुणाः स्मृता। तेजांशकत्वाद्भद्रस्य नवपूगफलप्रभः॥ कृते कामप्रचारास्तु कामरूपधरा
    गजाः। त्रेतायां द्वापरेऽन्यत्र वाहनत्वेन योजिताः ॥ त्रेतायां तद्गुणे किञ्चिन्मन्दत्वान्मन्द उच्यते। द्वापरे तु युगे
    सर्वे मृगतां प्राप्य संस्थिताः ॥ कलौ तद्गुणसाङ्कर्यात्सङ्कीर्ण इति कथ्यते। कृते भद्रगुणाः सर्वे भवन्ति
    करिणां यतः ॥ ततस्तत्र समुद्भूतो भद्र इत्यभिधीयते। जायते समद्वारः भद्रनामा मतङ्गजः। नवा, ष्टौ, सप्त,
    चायामो सप्त, षट्, चोच्च्छ्रयः । (गज. 8, 1; तुलनीय बार्हस्पत्य संहिता वीर मित्रोदय में उद्धृत)

462 अपराजितपृच्छा
यानी पतला होता है। उदर पतला और लम्बा होता है। वह लघुमार और फुर्तीला
होता है। वह बड़ा वेगवान और कठिनाई अर्थात् धीरे-धीरे अङ्कुश में आता है।
उसके लिए उबड़-खाबड़ भूमि कोई मायने नहीं रखती। वह किसी भी प्रकार की
भूमि पर बड़ी शीघ्रता से आक्रमण कर सकता है।
वादित्रे रमणीयत्वं समुत्साहेन नन्दति।
सङ्ग्रामे दुर्धरो घोर आरोहे चाऽऽक्रमेन्महीम् ॥ ३० ॥
बाजो-गाजों के बीच रमणीय समारोह में वह बड़े उत्साह से आनन्दित होता है
और संग्राम के अवसर पर बड़ा ही दुर्धर हो जाता है तथा घोर आक्रामक होकर
भूमि पर आक्रमण के लिए उद्यत होता हुआ आरोही हो जाता है।
शृङ्गारानन्दरूपैश्च करे शृङ्गारकं विना।
मृगस्य लक्षणं चैतत् कथितं त्वपराजित ॥ ३१ ॥
इति मृगजातिलक्षणम्।
इस प्रकार के हाथी किसी भी शृङ्गार के बिना भी शृङ्गारानन्द प्रदान करते हैं।
ये सब सुन्दर लक्षण हे अपराजित ! मैंने तुम्हें मृग संज्ञक हाथी के बताए हैं।¹
अथ मन्द्रजातिलक्षणमाह —
मन्द्रं च कथयिष्यामि शृणु चैकाग्रमानसः।
सुभरौ कपोलावङ्गं आत्मा गम्भीर एव च ॥ ३२ ॥
अब मैं मन्द्र गज के लक्षण कहता हूँ जिसे एकाग्र मानस से सुनो। ऐसा मन्द्र
नामक हाथी भरे हुए कपोलयुक्त होता है। उसकी आत्मा भी बड़ी गम्भीर होती है।
बृहच्च जठरं कुक्षी विपुले विस्तृतेऽन्यतः।
रक्ताक्षोऽधोवक्त्रकश्च क्षुद्रदृष्टिनिरीक्षकः ॥ ३३ ॥
दुःखितौ च यदा कुम्भौ आद्येकादिषु पते ध्रुवम् ?।
मदं विना समोदश्च रतो वै तारकर्मणि ॥ ३४ ॥
उसका जठर भी बड़ा होता है। उसकी कमर भी काफी विस्तृत और फैली हुई
होती है। उसकी आँखें लाल-लाल होती है और वह सदा नीचे की और मुख
लटकाए और क्षुद्र दृष्टि अर्थात् आस-पास ही देखता है। यदि इस प्रकार के हाथी

  1. पालकाप्य का मत है— कृशकरचरणग्रीवाः स्थूलाक्षाः ह्रस्ववालमेढ्रोष्ठाः। संक्षिप्तपृष्ठवंशाः तनुमृगदन्ता
    मृगा ज्ञेयाः। नाहायामप्रहीणः कृशनिखिलतनुः धूसरच्छायदेहः। जिह्यो द्युत्तानवेदी चपलगतिमतिः क्रोधनः
    सिन्धुचारी। स्थूलाक्षो द्वापरस्थः शुभगतिरलसः राजसो ह्रस्ववालः चण्डः पित्तप्रधानो मृग इति कथितो
    दीर्घदन्तः सुगात्रः ॥ (गज. 8, मृग. 3)

सूत्र-७९ 463
के कुम्भ स्थल में कोई दर्द उठता है अर्थात् शिरःशूल होता है अथवा वह बिना
किसी मदपान के भी आनन्द में होता है तो वह ऊँची कर्कश आवाज में चिङ्घाड़ने
में मस्त हो जाता है।
कृष्णशिराः श्वेतदन्तो न क्षमे ? प्रतिबन्धकः।
वादित्रैर्भक्तिशब्दैश्च किञ्चित्कोपः प्रशाम्यति ॥ ३५ ॥
इसकी रक्तवाहिनी शिराएँ काली होती हैं। इसके दाँत श्वेत रङ्ग के होते हैं और
यह किसी भी प्रतिबन्धक को सहन नहीं करता है। इसे उत्पात से काबू में लाने के
लिए बाजों-गाजों से, मीठे शब्दों से फुसलाकर और बीच-बीच में कुछ-कुछ कोप
दिखलाते हुए प्रशमित किया जाता है।
स्वसैन्ये परसैन्ये वा दुर्धरः रक्तगन्धतः।
एवमादिगुणैर्युक्तो मन्दजातिर्गजोत्तमः ॥ ३६ ॥
इति मन्दजातिलक्षणम्।
यह हाथी अपनी सेना या शत्रु की सेना में रक्त की गन्ध पाते ही बड़ा दुर्धर
और असाध्य हो जाता है। उक्त गुणों से युक्त यह मन्द जाति का गज बड़ा उत्तम
होता है।¹
अथ सङ्कीर्णजातिगजलक्षणमाह —
वृत्ताकारसंयुक्त आपादतलमस्तकम्।
रूपवाँल्ललिताङ्गश्च दृढकायो लघुस्वहृत् ॥ ३७ ॥
चतुर्थ प्रकार का गज आपाद मस्तक गोल-मटोल आकार का, भरा-पूरा शरीराङ्ग
वाला होता है। यह बड़ा रूपवान्, सुन्दर अङ्गों और दृढ़ शरीर वाला होता है।
जनाकुले भीचकितो वादित्रैर्गच्छति ध्रुवम्।
प्रतिबिम्बेन प्रविष्टो दन्तं दत्ते न वै रथे ॥ ३८ ॥
यह हाथी भारी भीड़ में भय से चकित हो जाता है और बाजों-गाजों से
चमककर भागने लगता है, ऐसा निश्चय समझें। अपना प्रतिबिम्ब देखकर भी यह

  1. पालकाप्य ने इसके लिए मन्द संज्ञा दी है। उसका मत है— विपुलकरकर्णवदनाः महोदराः
    स्थूलपेचकविषाणाः। बहुलबललम्बमांसाः हर्यक्षाः कुञ्जराः मन्दाः॥ (गज. 8, 2)
    वराहमिहिर ने कहा है कि जिसके छाती और कक्षावलय या देह के मध्य का वलय ढीले हों, उदर
    लम्बा, चमड़ा स्थूल, कण्ठ, पेट और पूँछ के जड़ा हो और सिंह के समान निगाह हो, वह मन्द संज्ञक
    होता है— वक्षोऽथ कक्षावलयः श्लथाश्च लम्बोदरस्त्वग्बृहति गलश्च। स्थूला च कुक्षिः सह पेचकेन सैंही
    च दृङ्मन्दमतङ्गजस्य ॥ (बृहत्संहिता 67, 2)

464 अपराजितपृच्छा
दाँतों से भेंटी मारने पर उद्यत हो जाता है और कभी-कभी रथों, गाड़ियों से भी
भड़क जाता है और उन्हें उलटाने लगता है।
अनेकाडम्बरं दृष्ट्वा त्रासमेति निनादतः।
आरेकान्ते पारवश्ये शीघ्रपादगतिक्रमः ॥ ३९ ॥
वह अनेक आडम्बरों को देखकर डर जाता है जोर-जोर से चिङ्घाड़ने लगता है
और एकान्त की ओर परवश होकर शीघ्रता से भागने लगता है।
भङ्गेन दापयेतस्य दुर्धरकारयेत्किलम्।¹
एभिर्गुणैश्च संयुक्तो नाम्ना सङ्कीर्णको गजः ॥ ४० ॥
इति सङ्कीर्णजातिलक्षणम् ॥
इसको भागते हुए रोकना कठिन होता है, इसको उत्कीलन करना भी निश्चित
रूप से दुर्धर होता है। इन गुणों से युक्त यह सङ्कीर्ण जाति का सङ्कीर्ण गज नाम से
विख्यात है।²
अथ गजवननिरूपणमाह —
अष्टौ वनानि ज्ञेयानि यतो गजसमुद्भवः ।
प्राचीलोहितके चैव पौरकौशलके अपि ॥ ४१ ॥
कच्छाख्यं चैव कृष्णाख्यं दाशेरं चैव सप्तमम्।
अष्टमं माणिकं दण्डवनान्यष्टौ भवन्ति हि ॥ ४२ ॥
अब हाथियों के उद्भव होने के स्थानों में मुख्य आठ वनों के बारे में कहते हैं—
(१.) प्राची, (२.) लोहित, (३.) पौर, (४.) कौशल, (५.) कच्छ, (६.) कृष्ण,
(७.) दाशेर और (८.) माणिक। इस तरह हाथियों के दण्डवन आठ होते हैं।³

  1. 'भृङ्गो न दापयेत्तस्य ? दुर्धरः कारयेत्कलिम्' इति प्रकाशित पाठः ।
  2. लक्षणप्रकाश में 'पाराशरसंहिता' का मत उद्धृत करते हुए कहा गया है कि सङ्कीर्ण को ही मिश्र कहा
    जाता है। वह भद्र, मन्द्र, मृग तीनों का मिश्रण होता है— मिश्रस्तु तेषां परस्परसंयोगजः सर्वसङ्कुललक्षण
    इति। मिश्र एव सङ्कीर्ण इति कथ्यते। विष्णुधर्मोत्तर में आया है— सङ्कीर्णलक्षणो नागः सङ्कीर्णश्च
    निगद्यते॥ पालकाप्य के एक अन्य पाठ में आया है— बह्वाशी बह्वालीकश्च दन्तपातेषु चाक्षमः ।
    गच्छेद्वक्रद्रुतवेगश्च भारं प्राप्यावसीदति ॥ कृच्छ्राच्चाप्यायते नागः क्षिप्रं च परिहीयते। कट्वम्ललवणैश्चैव
    रूक्षैश्चातुरतां व्रजेत्॥ नित्यं च सान्त्वयेदेनं न चैनमभितापयेत्। सर्वेषां लक्षणैः कैश्चिद्युक्तो मिश्रो
    भवेद्गजः ॥ (वीरमित्रोदय, पृष्ठ 352) इसी प्रकार लक्षणप्रकाशकार ने बार्हस्पत्यसंहिता से भी अनेक
    श्लोक उद्धृत किए हैं।
  3. पालकाप्य की संज्ञाएं किञ्चित् पृथक् हैं— पूर्वं नागवनं प्राच्यं ततश्चैदिकरूषकम्। दशार्णकं ततो विद्यात्
    ततः स्याद्वाङ्गरेयिकम ॥ कालिङ्गकं पञ्चमं स्यात षष्ठं स्यादपराजितम । सौराष्ट्रके सप्तमं स्यात ततः पाञ्चनदं

सूत्र-७९ 465
पूर्वे वेगवती तीरे प्राचीवनसमुद्भवः ।
जालन्धरकाश्मीरान्तं लोहितं वनमुच्यते ॥ ४३ ॥
पूर्व दिशा में वेगवती नदी के किनारे पर 'प्राची' वन नामक प्रदेश है। जालन्धर
से लेकर काश्मीर के अन्त तक के भाग को 'लोहित' वन कहते हैं।
वारुणोदधिमासाद्य वनं कच्छाभिधानकम् ।
गोदावरीदण्डकाख्यं कृष्णं तद्वनमुच्यते ॥ ४४ ॥
समुद्र के साथ लगा हुआ जो भाग है वहाँ 'कच्छ' वन नामक भूभाग है। गोदावरी
नदी के किनारे दण्डक वन नामक स्थान पर 'कृष्ण' नामक वन कहा गया है।
श्रीशैलः स्वामिदेवश्च मलयो नीलपर्वतः ।
त्रिकूटः पर्वतोश्चैते वनं दाशेरसञ्ज्ञकम् ॥ ४५ ॥
श्रीशैल, स्वामीदेव, मलय, नीलपर्वत तथा त्रिकूट पर्वतों के वन को 'दाशेर'
वन कहते है।
विन्ध्याख्यास्तु पर्यन्तं कलिङ्गरत्नपुरोदः ? ।
मणिकदण्डाभिधानं वनानामुत्तमोत्तमम् ॥ ४६ ॥
विन्ध्याचल पर्वत से लेकर कलिङ्ग, रत्नपुर तक के भूभाग को 'मणिक' दण्ड
वन नाम से वनों में सर्वोत्तम वन कहा गया है।
चौडबङ्गे कौशले च पौरे सौराष्ट्रके तथा।
बदरीकोपकण्ठे च विदुर्घोरवनानि च ॥ ४७ ॥
चौडप्रदेश बङ्ग प्रदेश के वनों को 'कौशल' वन नाम से जाना जाता है। इसके
अतिरिक्त सौराष्ट्र प्रदेश में पौर और बदरी के उपकण्ठ प्रदेश के वन को उर्घोरवन
नाम से विद्वान लोग वनों को जानते हैं।
परस्पर वनस्थितिं -
प्राचीलोहितयोर्मध्यं सामान्यं पौरकौशले ।
कच्छे कृष्णे उत्तमं च दाशेर मणिकेऽधिकम् ॥ ४८ ॥
अब इन वनों की पारस्परिक तुलना करके देख रहे हैं। प्राची वन और लोहित
वन के बीच में पौर और कौशल वन सामान्य कहे गए हैं। कच्छ के वन और कृष्ण
वन उत्तम और दाशेर तथा मणिक वन तो इनसे भी अधिक उत्तम कह गए हैं।
परस्पर गजस्थितिं -
सामान्ये चैव सङ्कीर्णो मन्द्रश्चैवं त मध्यमे।

466 अपराजितपृच्छा
उत्तमे मृगरूपश्च भद्राख्यश्चोत्तमोत्तमे ॥ 49 ॥
अब हाथियों की भी परस्पर तुलना करके देखें। सङ्कीर्ण नामक गज सामान्य
होता है। मन्द्र नामक गज मध्यम होता है। मृग नामक गज उत्तम और भद्र नामक
गज सर्वोत्तम होता है।
स्वके स्वके वने चैव एकैकं च चतुर्विधम्।
प्रमाणानि ततो वक्ष्ये हस्तसङ्ख्यादितः क्रमात् ॥ 50 ॥
सामान्यस्त्वेव षड्ढस्तो मध्यमः सप्तहस्तकः।
उत्तमश्चाष्टहस्तो नवहस्त उत्तमोत्तमः ॥ 51 ॥
अब अपने-अपने वन के एक-एक के चार प्रकार और प्रमाण तथा उनके क्रम
से विस्तार का हस्त संख्या प्रमाण दिया जाता है। सामान्य वन का हाथी 6 गज की
लम्बाई वाला, मध्यम वन का हाथी 7 गज, उत्तम वन का हाथी 8 गज तथा
उत्तमोत्तम वन का हाथी 9 गज की लम्बाई वाला कहा गया है।¹
मन्द्रो मृगश्च भद्रश्च सङ्कीर्णश्च चतुर्विधाः।
प्रमाणानि च ख्यातानि कथितान्यपराजित ॥ 52 ॥
इस तरह हे अपराजित! मैंने तुम्हें 1. मन्द्र, 2. मृग, 3. भद्र और 4. सङ्कीर्ण
चारों प्रकार के हाथियों के प्रमाण एवं उनकी ख्याति कही है।
अन्यदप्याह —
हस्तिधामश्रयं कुर्यात् पञ्च पञ्च त्रयाङ्कुशाम्।
द्वार समद्भवोक्त्या सङ्ख्याश्च दशमेव च ॥ 53 ॥
पञ्चाश्रयाश्रयी शाला रन्ध सप्तहस्तोद्भवा।
खण्डवार हारत्रयं कार्या सन्ताप शमको विदुः ॥ 54 ॥²
(उक्त दोनों श्लोक भ्रष्ट हैं, साधु पाठ कल्पित करने पर निम्न अर्थ होगा)
हस्तिधाम अर्थात् गजशाला के आश्रय में पाँच-पाँच त्रयांशक (सम्भवतया त्रिशूल
जैसे भाले) जो हस्तिशाला के द्वारों की ऊँचाई के बराबर लम्बे हों और उनकी इस

  1. उत्पलभट्ट ने इस प्रसङ्ग में पराशरसंहिता का मत उद्धृत किया है— परिणाहौ दशसमो नवायामः स
    उच्छ्रयः। सप्तज्येष्ठप्रमाणस्य नागस्य समुदाहृतः॥ ज्येष्ठात् सप्तमभागोनो मध्यमो मध्यमाद्गजः। अन्त्यः
    षड्भागहीनः स्यादतोऽन्यो न स पूजितः॥ मुखादापेचकं दैर्घ्यं पृथुपार्श्वोदरान्तरम्। अनाह उच्छ्रयः
    पादाद्विज्ञेयो यावदासनम्॥ (बृहत्संहिता 67, 4 पर उद्धृत)
  2. 'हस्तिधामत्रयं कुर्यात् पञ्च पञ्च त्रयांकुशाम्?। द्वाद (र) सम (मु) दोक्त्व्या वंस्थाश्च दशमेव च ?॥ पञ्च
    (श्रा) श्रम तत्र यतारा गन्ध सप्तविधोद्भवा?। षड्द्वार हारत्रयकामं संतापशमक्तो विदुः?॥' इति प्रकाशित

अपि रदभङ्गखण्डने" -> वाम-प्य-र-द-भ-ङ्ग-ख-ण्ड-ने!
वा (1)
म (2)
प्य (3) - वामप्य्!
र (4)
द (5)
भ (6)
ङ्ग (7)
ख (8)
ण्ड (9)
ने (10) - wait, that's only 10!
Wait, is the meter 11 syllables?
What about:
"क्षीरवृक्षफलपुष्पपादपेष्वापगातटविघट्टनेन वा।"
क्षी-र-वृ-क्ष-फ-ल-पु-ष्प-पा-द-पे-ष्वा-प-गा-त-ट-वि-घट्-ट-ने-न वा
Count:
क्षी (1) र (2) वृ (3) क्ष (4) फ (5) ल (6) पु (7) ष्प (8) पा (9) द (10) पे (11) ष्वा (12) प (13) गा (14) त (15) ट (16) वि (17) घट् (18) ट (19) ने (20) न (21) वा (22)
Wait! That's 22 syllables! That's NOT Trishtubh!
22 syllables in half a verse? That means

468
विश्वकर्मा बोले कि हे वत्स! अब तक तो मैंने हाथियों के बारे में कहा था।
अब तुम अश्वाख्यान भी सुनो। ये अश्व आदि तेजोमय रूप है और समुद्र से उत्पन्न
हुए हैं।
अथाश्वोत्पत्तिदेशाः –
तुरकाद्भवा विख्याताः प्रान्ता दक्षराष्ट्रोद्भवाः।
महावन्तन्तोद्भवा¹ वेण्वा वेगवती तटे ॥ २ ॥
चञ्चलाश्चाण्डदेशे च डाहाले प्रतिचारकाः।
एते चाष्टविधा₈ अश्वाश्चातुर्वर्ण्यं च कथ्यते ॥ ३ ॥
सामान्यतया तुरक देश में उत्पन्न अश्व विख्यात है। दक्षराष्ट्रोद्भव, महावनों के
अन्त में उत्पन्न होने वाले, वेणु, वेगवती नदी के तट पर उत्पन्न होने वाले, चञ्चला,
चण्ड देश में उत्पन्न होने वाले, डाहल में प्रतिचार करने वाले— ये आठ प्रकार के
अश्व होते हैं। इनमें भी पृथक-पृथक चार वर्ण होते हैं।²
अथाश्वाश्चातुर्वर्ण्यमाह –
विप्रक्षत्रियविट्शूद्रा अश्वाश्चत्वार उत्तमाः।
इनमें (१.) ब्राह्मण, (२.) क्षत्रिय, (३.) वैश्य और (४.) शूद्र– ये चार
प्रकार के उत्तम अश्व होते हैं।
बहूदके प्रविष्टश्च पिबेत्तोयं शिरोद ये ॥ ४ ॥
स्थिरक्रमाद् गच्छति चाऽऽसने शुद्धमना स्थिरः।
स्वामिनो रोहणे चेतः पश्येद्धृदयचक्षुषा ॥ ५ ॥
शब्दैश्च गर्जनाकारैः सङ्ग्रामे स्वामितारणः।
एभिर्गुणैः समायुक्तः सोऽश्वो वै विप्रजातिकः ॥ ६ ॥
जो गहरे पानी में प्रवेश करके सिर तक डुबकी लगा कर पानी पीते हैं, जो
स्थिरतापूर्वक क्रम से चलते हैं, स्वामी के आसन ग्रहण करते समय भी स्थिर चित्त
से खड़े रहते हैं, स्वामी की सवारी को मन-ही-मन अनुभव करते हैं यानी मन की
१. 'महावनान्तरुद्वेगा ?' इति प्रकाशित पाठः।
२. हमारे यहाँ पर अश्वशास्त्र की विस्तृत परम्परा देखने में आती है। नकुल का अश्वशास्त्र, पराशरसंहिता,
वररुचि कृत अश्वविद्या, किल्हण का सारसमुच्चय, गणकृत अश्वायुर्वेद, जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद, भोजकृत
शालीहोत्रम् आदि ग्रन्थ प्रसिद्ध है। नकुलकृत अश्वचिकित्सा में चार प्रकार अश्वों का वर्णन है। देश भेद
से उत्पन्न अश्वों का वर्णन इस प्रकार आया है— चतुर्धा वाजिनो भूमौ जायन्ते देशसंश्रयात्। ताजिकाः

सूत्र-८० 469
आँख से देखते हैं। इनका हिनहिनाने का शब्द बड़ी गर्जनाकार का होता है और ये
इतने स्वामीभक्त होते हैं कि संग्राम में कोई कठिन परिस्थिति आ पड़े तो अपने
स्वामी को बचाकर निकल जाते हैं। इन गुणों वाला जो अश्व समझदार और
स्वामीभक्त होता है वह विप्र जाति का अश्व माना गया है।
द्रुहोत्प्रविष्ट उदकेऽन्यशब्दे विद्रुतो भवेत्।
स्वामिनं रोहयेच्छुद्धश्चान्यं तु परिपातयेत् ॥ 7 ॥
सङ्ग्रामे दुर्धरश्चाश्वो जैत्रहारी प्रबुध्यति।
कामातुरश्च शूरश्च जात्या क्षत्रियसञ्ज्ञकः ॥ 8 ॥
जो अश्व पानी में उतरते समय अड़चन करे, विरोध करे, अचकचाए और
किसी अन्य व्यक्ति का शब्द सुनके भड़क उठे, चमके तथा अपने स्वामी को
पहचान करके उसके अश्वारोहण के समय तो शुद्ध मन से स्थिर रहे परन्तु स्वामी के
सिवाय अन्य कोई आरोहण करने की चेष्टा करे तो वह उसे तुरन्त पटक देता हो,
ऐसा अश्व संग्राम में बड़ा दुर्धर यानी खतरनाक हो जाता है परन्तु अपने अश्वार

470 अपराजितपृच्छा
वैश्य जाति के अश्वों का स्वर मधुर होता है। इसके विपरीत शूद्र जाति के अश्व
का शब्द कर्कश होता है। जो अश्व किसी क्षण में शुद्धासन या आरोहण के समय
स्वस्थ, शान्त रहे, संग्राम में भी सावधान किन्तु चञ्चल रहे परन्तु किसी क्षण में
घोड़ियों की ओर आकर्षित होकर आतुर हो उठे एवं किसी क्षण पुनः स्वस्थ और
शान्तचित्त होकर स्थिर रहे, ऐसे सभी अश्व शूद्र संज्ञक यानी चतुर्थ जाति के माने
गए हैं।
इत्युत्तमा मता अश्वाः शेषाः प्रकृतिजातकाः ।
इति ज्ञातिप्रभेदाः स्युः प्रमाणं सप्तधोत्तमम् ॥ 13 ॥
सुन्दरश्चाऽथ श्रीवत्स आह्लादश्च मनोहरः ।
विजयो विभवः शान्तः सप्ताऽश्वा उत्तमात्तमाः ॥ 14 ॥
उक्त वर्णित उत्तम अश्व माने गए हैं। अन्य शेष को सामान्य प्रकृतिजात अश्व
समझें। ये सभी जातिभेद बताए, जिनके प्रमाण भी सात प्रकार के उत्तमोत्तम कहे
गए हैं जो इस प्रकार है— (1.) सुन्दर, (2.) श्रीवत्स, (3.) आह्लाद, (4.)
मनोहर, (5.) विजय, (6.) विभव और (7.) शान्त— ये सातों प्रकार के
उत्तमोत्तम अश्व होते हैं।
तथा चोच्छ्रयादीनां प्रमाणमाह —
षष्ट्यङ्गुलः₆₀ सुन्दरः स्याच्छ्रीवत्सश्चतुःषष्टिभिः₆₄ ।
अष्टषष्टिभिराह्लादो₆₈ द्वासप्तत्या₇₂ मनोहरः ॥ 15 ॥
षट्सप्तत्या₇₆ च विजयो विभवोऽशीतिभिस्तथा₈₀ ।
चतुरशीतिभिः₈₄ शान्तः प्रमाणं सप्तधा₇ विदुः ॥ 16 ॥
अब इन घोड़ों के उक्त नामानुसार उनकी ऊँचाई आदि के प्रमाण कहते हैं।
सामान्यतया (1) सुन्दर जाति का घोड़ा 60 अङ्गुल ऊँचा होता है, (2) श्रीवत्स
जाति का घोड़ा 64 अङ्गुल, (3) आह्लाद जाति का घोड़ा 68 अङ्गुल, (4) मनोहर
जाति का घोड़ा 72 अङ्गुल, (5) विजय जाति का घोड़ा 76 अङ्गुल, (6) विभव
नाम की जाति का घोड़ा 80 अङ्गुल तथा (7) शान्त जाति का घोड़ा 84 अङ्गुल की
ऊँचाई लिए होता है। इस प्रकार विद्वानों ने घोड़ों के सात प्रकार से प्रमाण कहे हैं।
अशुभाश्वलक्षणमाह —
ककुद्वान् कुम्भिकावांश्च कराली कृष्णतालुकः ।
हीनदन्तोऽधिकदन्तः षडश्वाः स्वामिघातकाः ॥ 17 ॥
अब अशुभ अश्वों की पहचान कहते हैं। जो घोड़े कूबड़ वाले, कुम्भ वाले,

कराली अर्थात् भयानक दाँत वाले, काले तालु वाले, कम दाँत वाले या अधिक दाँत
वाले हो तो ये छह प्रकार के घोड़े स्वामी घातक होते हैं।¹
अथाश्वशाला लक्षणं —
अश्वशालां प्रवक्ष्यामि चतुःषष्टिकरायता₆₄।
शतार्द्धस्ता₅₀ मध्या स्यात् चत्वारिंशत्करेत्तरा₄₀ ॥ 18 ॥
पञ्चदशकरा₁₅ ज्येष्ठा त्रयोदशकरेत्तरा₁₃।
कनिष्ठैकादशकरा₁₁ पृथुत्वं त्रिविधं मतम् ॥ 19 ॥
अब अश्वशाला बनाने के बारे में प्रमाण कहते हैं— 1. ज्येष्ठ अश्वशाला 64
गज (हाथ) की लम्बाई या आयत तथा 15 गज की चौड़ाई वाली होती है; 2.
मध्यम अश्वशाला 50 गज की लम्बाई और 13 गज की चौड़ाई वाली होती है तथा
3. कनिष्ठ अश्वशाला 40 गज की लम्बाई और 11 गज की चौड़ाई वाली होती है।
तत्रैव क्रूरार्थपात्रलक्षणमाह —
सप्त₇ पञ्च₅ त्रि₃ हस्तं च विस्तरे त्रिविधं स्मृतम्।
द्विहस्तमुच्छ्रितं₂ कुर्यात् क्रूरार्थं लक्षणान्वितम् ॥ 20 ॥
तस्य बाह्ये भवेद् भित्तिरेक₁हस्ता च वेष्टने ।
अब घोड़ों की ठाण में चरने के लिए बनाई जाने वाली कुण्डी के प्रमाणों को
कहा जाता है— 7 गज लम्बी 2 गज चौड़ी ज्येष्ठ; 5 गज लम्बी 2 गज चौड़ी
मध्यम, और 3 गज लम्बी तथा 2 गज चौड़ी कुण्डी कनिष्ठ कही गई है। ऐसी
कुण्डियाँ क्रूरार्थ अर्थात् घोड़े के लिए चरने, भोजन करने की सामग्री रखने के लिए
बनाई जाए। उस कुण्डी की दीवार का घेरा एक गज ऊँचाई वाला बनाएँ।


  1. विष्णुधर्मोत्तर में आए श्लोक उक्त श्लोकों से पर्याप्त साम्यता लिए हैं— हीनदन्तोऽधिदन्तश्च कराली
    कृष्णतालुकः। कृष्णजिह्वश्च यमजो जातमुष्कश्च यस्तथा॥ द्विशफश्च तथा शृङ्गी त्रिकर्णी व्याघ्रवर्णकः।
    खरवर्णो भस्मवर्णो जातवर्णश्च काकुदी॥ श्वित्री च काकसादी च खरसारस्तथैव च। वानराक्षः कृष्णसटः
    कृष्णमुष्कस्तथैव च॥ कृष्णप्रोथश्च मूकश्च यश्च तित्तिरसन्निभः। विषमश्वेतपादस्तु ध्रुवावर्त्तविवर्जितः॥
    अशुभावर्त्तसंयुक्तो वर्जनीयस्तुरङ्गमः।
    जयदत्तकृत अश्वायुर्वेद में भी ये ही लक्षण आए हैं। यथा— आवर्तो यस्य ककुदे काकुदी स उदाहृतः।
    करालाश्चाधरा दन्ता जायन्ते यस्य चोत्तरे॥ स कराली इति प्रोक्तो भर्तुः पुत्रादिभक्षकः॥ चतुर्भिः पञ्चभिर्वाथैव
    हीनदन्तः प्रकीर्तितः। सप्तभिर्भाभिर्नैर्जातस्तथाधिकदन्तकः। अङ्गुष्ठपर्वसङ्काशो छागशृङ्गोपमं तथा।
    जम्बूबदररूपं च तथा चामलकोपमम् ॥ आप्रास्थिसदृशं चापि हरितक्याः फलोपमम्। दग्धचर्मनिभं चापि
    वालसंस्थानमेव च॥ कीलं कर्णान्तरे यस्य देशान्ते चापि दृश्यते। धौरेयः सर्वपापानां वाह शृङ्गी स
    कीर्तितः ॥ एवं विधेन शृङ्गे शृङ्गी राष्ट्रे न वासयेत् ॥ इत्यादि... । (लक्षणप्रकाश पृष्ठ 483-484 पर उद्धृत)

472 ...पृच्छा
अश्वशालाप्रमाण —
¹पञ्च₇हस्तोच्छ्रितां भित्तिरर्द्धपञ्च₅ ॥ करोऽथवा ॥ २१ ॥
सप्त₇हस्तोच्छ्रितं कार्यं द्वाभ्यां₂ पक्षस्तम्भकम्।
तोरणं सप्त₇हस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत् ॥ २२ ॥
अण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्तोराणय स्तम्भकम्।
तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता अङ्गुल्यो द्वादशायतः ॥ २३ ॥
तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्यादण्डच्छाद्यत्रयं तथा।
कलशास्तत्र दातव्याः प्रतिछाद्यमथोपरि ॥ २४ ॥
पूर्वापरमुखा अशस्ता तेजो अर्थप्रतापक्षयः।
तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः ॥ २५ ॥
दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः।
नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः ॥ २६ ॥
अश्वशाला में भित्ति की ऊँचाई पाँच गज या साढ़े पाँच गज की हो तथा उसके
दोनों पक्षों पर सात-सात गज ऊँचे दो स्तम्भ बनाए जाएँ। उन स्तम्भों की ऊँचाई के
सात गज के अन्तिम भाग पर तोरण बनाने के लिए उत्तर स्तम्भक बनाए। जहाँ तक
तोरण के स्तम्भ बने हुए हों वहाँ तक 3 गज ऊँची अण्डछाद्य अर्थात् अण्डाकार
गुम्बज की छत बनाएँ। उसके ऊपर अन्तरपत्र 12 अङ्गुल की ऊँचाई के बनाएँ।
फिर, उसके ऊपर अण्डाकार तीन गज ऊँची गुम्बजयुक्त छत बनाएँ और फिर उन
छतों पर प्रत्येक पर कलश लगाएँ। इन अश्वशालाओं में पूर्व और पश्चिम दिशोन्मुखी
शालाएँ अप्रशस्त मानी गई है। इन पूर्वमुखी-पश्चिममुखी शालाओं को तेज, अर्थ,
प्रताप और तेज वृद्धि को क्षय करने वाली माना गया है और कहा गया है कि ऐसी
शालाओं से तेज वैसे ही क्षय हो जाता है जैसे कृष्णपक्ष का चन्द्रमा दिन-दिन क्षय
को प्राप्त होता हुआ अन्त में अमावस्या को प्राप्त करके पूरा क्षय हो जाता है। (घोड़ों
को इस प्रकार से बान्धने से भी यही परिणाम होता है¹)। इसके विपरीत दक्षिणमुखी
व उत्तरमुखी अश्वशाला प्रशस्त कही गई है। ये स्वामी के प्रताप और कीर्ति को

  1. 'पञ्चहस्तोच्छ्रिता भित्तिरर्थपञ्चस्वरोऽथवा ? ॥ सप्तहस्तोच्छ्रितं कार्यमुदाढ्या ? पक्षस्तम्भकम्। तोरणं
    सप्तहस्तान्ते उत्तरस्तम्भको भवेत्॥ दण्डच्छाद्यत्रयोच्छ्रिता यावत्ताराढ्यस्तम्भकम्। तत्रान्तरपत्रोच्छ्रिता
    अङ्गुल्यो द्वादशाऽन्यतः॥ तदूर्ध्वं तु पुनः कुर्याद्दण्डच्छाद्यत्रयं तथा। कलशास्तत्र दातव्याः
    प्रतिक्षणमथोपरि॥ पूर्वापरमुखास्त्रस्तास्तेजोऽर्थप्रतापक्षयः ?। तेजोवृद्धिः क्षीयते च यथा कृष्णे निशाकरः॥
    दक्षोत्तरमुखाः शस्ताः प्रतापकीर्तिवर्द्धनाः। नित्यं कल्याणकारिण्यः सर्वकामफलप्रदाः॥' इति प्रकाशित
    पाठः।

च। उत्तराभिमुखा श्रेणी तुरगाणां विधीयते॥ दक्षिणाभिमुखा वाथ परिशिष्टास्तु`

Line 27:
गर्हिताः। तुरगास्ते तथा धार्याः प्रदीपैः सार्वरात्रिकैः॥ कुक्कुटान् वानरांश्चैव मर्कटांश्च विशेषतः।

Line 28:
धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा। गोगजाश्वादिशालासु

Line 29:
तत्पुरीषस्य निर्गमः॥ अस्तं गते न कर्तव्यो देवदेवे दिवाकरे। तत्र तत्र यथास्थानं राजा विज्ञाय सारथीन्॥

Line 30:
(मत्स्य. 217, 19-23)

Line 31:
2. यह सूत्र प्राच्यविद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर में विद्यमान 'अपराजितपृच्छा' की खण्डित मातृका (संख्या

Line 32:
18078-12) से उद्धृत और तद्नुसार पुनर्सम्पादित किया गया है।

Wait, let's verify line 28:
`धारयेदश्वशालासु सवत्सां धेनुमेव च॥ अजाश्च धार्या यत्नेन तुरगाणां हितैषिणा। गोगजा

पृथिव्याश्च यदा राजाभुङ्क्तेऽर्द्धं पर मेव च।
तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं शतं हीनकरद्वयम् <sub>98</sub>॥ ३॥
जो राजा इससे आधे भूभाग का भोग करने वाला हो उसके लिए राजभवन सौ
से दो गज हीन अर्थात् अठानवे गज के विस्तार वाला बनाए।
तथा महीत्रिभागं च भुङ्क्ते यो वै नराधिपः।
अष्टाशीतिकरं <sub>80</sub> वेश्म महीशानां त्रिधा <sub>3</sub> मतम्॥ ४॥
जो राजा एक तिहाई भूमि का भोक्ता हो, ऐसे राजा के लिए अस्सी गज के
विस्तार वाला राजभवन बनाना चाहिए। इस तरह उक्त राजभवनों के तीन प्रकार
माने गए हैं।
लक्षग्रामाधिपो यस्तु स महामण्डलेश्वरः।
तस्य वेश्म प्रकर्त्तव्यं द्विहीनाशीतिहस्तकम् <sub>78</sub>॥ ५॥
जो राजा एक लाख ग्रामों को अधिपति हो, उसकी संज्ञा मण्डलेश्वर होती है।
उसका राजभवन अस्सी में दो कम अर्थात् अठत्तर गज विस्तार का होना चाहिए।
लक्षार्द्धं यदा भुङ्क्ते मण्डलीकोऽभिधानतः।
अष्टषष्टिकरं <sub>68</sub> तस्य कर्त्तव्यं भवनोत्तमम्॥ ६॥
जो राजा आधे लाख ग्रामों का भोग करने वाला हो उसका 'मण्डलीक' नाम
दिया गया है। उसका राजभवन अड़सठ गज का होना चाहिए॥ ६॥
अयुतद्वयग्रामाणां महा सामन्तसञ्ज्ञकः।
तस्य वेश्माऽष्टपञ्चाशत् <sub>58</sub> करं कामफलप्रदम्॥ ७॥
राजा दो अयुत (20 हजार) ग्रामों का स्वामी हो, उसे 'महासामन्त' नाम दिया
गया है। उसका राजभवन अट्ठावन गज विस्तार का होना चाहिए, जो उसकी
कामना को फलवती बनाता है।
सामन्तसञ्ज्ञकः सोऽत्राऽयुतग्रामाधिपश्च यः।
अष्टचत्वारिंशद्धस्तं <sub>48</sub> भवनं शोभनम्॥ ८॥
जो एक अयुत ( 10 हजार) ग्राम का अधिकारी हो उसे 'सामन्त' संज्ञा दी गई
है। उसका राजभवन अड़तालीस गज के विस्तार वाला होना चाहिए, जो सब तरह
से शोभा वाला होता है।
ईशोऽयुतार्द्धग्रामाणां लघुसामन्तक सञ्ज्ञकः।
अष्टत्रिंशत्करैर्युक्तं <sub>38</sub> भवनं तस्य कामदम्॥ ९॥