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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 9, कुल 535 में से

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पृष्ठ 9

श्रीमान् शर्मा साहब ने बहुत मनोयोग से इसके कई सूत्रों के भाव को ग्रहण किया
और मैंने इसकी विषय वस्तु सहित आधारभूत ग्रन्थों पर ध्यान दिया। उनके द्वारा
अनुवाद रूप में यह प्रथम ग्रन्थ था किन्तु मुझे अनेक स्थलों के अनुवाद को लेकर
भय था और जब समराङ्गणसूत्रधार का अनुवाद सम्पन्न हुआ तो आत्मविश्वास हो
गया कि इसका अनुवाद ठीक हो गया है। समराङ्गण. का सम्पादन-अनुवाद करते -
करते ही इस ग्रन्थानुवाद का संशोधन भी होता चला गया। इसलिए इसके प्रकाशन
में भी किञ्चित विलम्ब हुआ, अन्यथा यह अनुवाद 2007 ई. में ही प्रकाशित हो
जाता। मैं मानता हूँ कि भगवान् विश्वकर्मा ने ही स्वयं इस ग्रन्थ की गुत्थियों को
खोला है क्योंकि अनेक स्थल ऐसे थे जो बहुत जटिल थे और प्रकाशित पाठ में
अनेकत्र त्रुटियाँ थी, कई स्थलों पर प्रश्नवाचक चिह्न थे। इसे एक प्रकार से
पुनर्सम्पादित किया गया है। पाठकों और विद्वानों को ऐसा सर्वत्र प्रतीत होगा, इसमें
कई श्लोक नए भी जुड़े हैं जिन्होंने खण्डित पाठ की पूर्ति की है, इस सम्बन्ध में
भूमिका में चर्चा की गई है और सूत्रस्थलों पर भी यथोचित पाद टिप्पणियाँ दी गई
हैं।
मैं श्रीमान् शर्मा साहब का आभार मानूँ या उनको धन्यवाद दूँ, कह नहीं पा
रहा हूँ। यह तो अनुग्रह ही है कि विश्वकर्मा-वंशज स्वयं इस महत् कार्य में सूत्रधार
बने। मैं उनके ऋणि होने की बात कहता हूँ तो वे कहते हैं कि आपके अभियान के
साथ जुड़कर मुझे अपना जीवन सार्थक होता प्रतीत हो रहा है। उनकी पहल ने इस
ग्रन्थ के अनुवादोद्धार की दिशा में एक सशक्त ताल दी तो मैंने और मेरे परिवार के
सदस्यों ने भी कदम बढ़ाए। अनुदित स्वरूप को मैंने उत्स ढूँढ़कर पूर्णतः शास्त्र-
सम्मत स्वरूप देने के लिए जीतोड़ प्रयास किया है, मेरी कनिष्ठ पुत्री अनुकृति
चौहान ने इसका मूलपाठ टंकित किया तो इसकी टिप्पणियों को खोजने का श्रम
ज्येष्ठ पुत्री आयुष्मति अनुभूति चौहान और अनुज अरविन्द चौहान ने किया है।
सहधर्मिणी पुष्पा चौहान भी बहुत मददगार रही, पुत्र गौरव चौहान ने भी सहयोग
किया। यह एक समूह-श्रम ही कहा जाएगा। मैं परिजनों के स्नेहाधीन और श्रीमान्
शर्मा साहब के अनुग्रह से अभिषिंचित हूँ।
इस क्रम में मैं बड़ौदा ऑरियण्टल इंस्टिट्यूट के निदेशक प्रो. मुकुन्दलालजी
वाडेकर का भी आभार मानता हूँ कि जिन्होंने इसके अनुवाद की सदिच्छा प्रकट
की और प्रोत्साहन दिया। उन्होंने इस ग्रन्थ की मातृकाओं के पृष्ठ भी उपलब्ध
करवाए और यह कहा कि इस अनुवाद से इस ग्रन्थ के अध्ययन-अध्यापन और
अभ्यास का कार्य आगे बढ़ेगा। मैं डूंगरपुर (राजस्थान) के वयोवृद्ध शिल्पी श्रीमान्