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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

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पृष्ठ 51

2 अपराजितपृच्छा
हंसकारण्डवाकीर्णे चक्रवाकोपशोभिते ।¹
नीलजीमूतसङ्काशे तरुणादित्यसप्रभे ॥ 5 ॥
उच्छ्रयाकाशशिखरे रत्नधातुपशोभिते ।
अनन्तगह्वरे रम्ये यथाख्यातात्य (दृ ?) हासके² ॥ 6 ॥
हंस और बतखों के समूहों से भरपूर और चक्रवाकों के शोभित नीले वर्ण के
बादलों के समान शोभित और मध्याह्न के सूर्य के समान तेज प्रभाववाले ऊँचे-ऊँचे
गगनचुम्बी शिखरों वाला, रत्न और धातुओं से उपशोभित, अनेकों गह्वर गुहाओं से
रमणीयता को वैसे ही लिए हुए हैं जैसे कि इतिहासों में उसकी ख्याति है।
महाद्रुमलताकीर्णे वनोपवनकानने ।
दिव्यासनसभारम्ये सरितां तटवासिते ॥ 7 ॥
इदं वै आश्रमं रम्यं पर्वते गन्धमादने ।
भूर्भुवनेश्वरं देवं तच्छिलापृष्ठशायिनम् ॥ 8 ॥
वहाँ महावृक्षों, लताओं से युक्त वनोप