अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)
Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu
भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें260 अपराजितपृच्छा
बहुत द्रव्य का नाश होता है। ऐसी उच्छिन्ना भूमि (ऊँची भूमि) या ऊँची देवभूमि
ऊपर चढ़ने और पुनः उससे नीचे उतरने योग्य नहीं होती है।
अजोष्ट्रखरसंसेव्यां वर्जयेत्तादृशीं महीम्।
सशल्या बहुभक्ता च ह्यषूरा शोककारिका ॥ 28 ॥
जिस भूमि में अज-बकरी, ऊँट और गधे विचरण करते हों, जो भूमि
शल्ययुक्त (हड्डियों वाली) हो, कण्टीली हो, जगह-जगह कटी-फटी और ऊसर
भूमि हो, वे सब शोककारक होती हैं। अस्तु, ऐसी सभी भूमियाँ गृह के लिए
वर्जनीय कही गई है।
त्रिविधा स्फुटिता मृद्धी वृष्टिशुष्का रिक्ताङ्गिका।
कप्पिलः¹ भ्रमगम्भीरा घटिका त्र्यक्षसिद्धिदा ॥ 29 ॥
जो भूमि वर्षाजल रिक्त हो जाने पर, कीचड़-मिट्टी के सूख जाने से तीन प्रकार
से स्फुटित हो गई है अर्थात् मिट्टी फट गई हो, भूरे वर्ण की हो और उसमें गम्भीर
भ्रमघटिका अर्थात चक्र बने पाए जाए, तो ऐसी भूमि त्र्यक्ष (शिव, त्र्यम्बक) की
सिद्धि कराने वाली मानी जाती है।
द्रुमानुसारेणभूगुणदोषं —
वेणुगुल्मलताच्छाया द्विगुणां मध्यदूषिता।
त्रिगुणा पुन्नागवृक्षैः क्षीरवृक्षैश्चतुर्गुणा ॥ 30 ॥
अब घर पर वृक्षों की पड़ने वाली छाया के दोष बताए जाते हैं। बांसों के
झुरमुट से पड़ने वाली छाया भवनों के लिए दुगुनी मध्य दूषिता कही गई है। पुन्नाग
अथवा सुपाड़ी के वृक्षों की छाया तिगुनी और दूध वाले वृक्षों की छाया चतुर्गुणी
दूषिता है।
पञ्चधाश्वत्थवृक्षैश्च षड्धा धात्री महीरुहैः।
सप्तधा पूर्णवृक्षैश्च लिङ्गच्छाया तथाष्टधा ॥ 31 ॥
अश्वत्थ वृक्ष की छाया वाली भूमि पाँच गुणी दूषित है। इसी तरह आँवले के
पेड़ की छाया छह गुणी, पूर्ण वृक्ष की छाया वाली सात गुणी और शिवलिङ्ग की
भवन पर पड़ने वाली भूमि आठ गुणी हानिकारक है।
एताश्च्छायाः परित्यज्य वेश्म कुर्याद्यथाभयम्।
वृक्षप्रासादयोश्च्छायां गृहे त्यक्ता शुभप्रदा ॥ 32 ॥
- 'कापादैः ?' इति प्रकाशित पाठः। 'काकपदै' या 'कप्पिलः' पाठ स्यात्।