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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 15, कुल 535 में से

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XVI
6. कृषिशास्त्र : इसके अन्तर्गत जलाशय माहात्म्य, कलियुग और लोकोत्तर
प्रश्न, सुभिक्ष-दुर्भिक्ष लक्षण, कलियुग में तारण के लिए शस्योद्भव, जलोत्थान यन्त्र
और जल बचत के निर्देश अध्ययन-अनुसरण के योग्य हैं।
7. पशुपालनशास्त्र : इस विषय के अन्तर्गत भद्रादि जातियों के गज और
उनके उत्पत्ति एवं विहार योग्य वन तथा अश्व और उनकी विप्रादि प्रजातियों सहित
दन्तिन्यादि गजशालाएँ एवं अश्वशाला बनाने के नियमों के निर्देश ज्ञातव्य है। यह
वर्णन परम्परित रूप से संहिता ग्रन्थों के अनुसार मानक है। शस्यावतार सूत्र में बैलों
की महिमा भी आई है।
8. शिल्पशास्त्र : राजोपस्कारक वस्तुओं के अन्तर्गत आसन व मसूरक,
गदिका एवं पट्टगदी, राजच्छत्र, सिंहासन, नौ प्रकार के रथ, नन्दादि सभाष्टक
लक्षण, चतुर्विध वेदी, कवच-आयुध आदि का निर्माण निर्देश ज्ञातव्य है।
9. प्रतिमाशास्त्र : इस शास्त्र के अन्तर्गत लिङ्गार्चादि उपयोगी शिलाओं के
लक्षण, हस्त-कम्बी प्रमाण, परमाणु प्रमाण, उत्तम-मध्यम-अधम हस्त मान,
कम्बिका के वास्तु देवता, उत्तम-मध्यम-अधम कम्बिका और उसका पूजन,
शल्यदोष, विविध प्रकार के लिङ्गों व उनकी पीठिकाओं के लक्षण और शिव सहित
विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, देवियों और जिन देवताओं उनके लाञ्छनों, यक्षों, शासन देवी-
देवताओं की प्रतिमाओं का वर्णन भी ज्ञातव्य है। स्वच्छन्द भैरव के अवतार व
उनके रूप-आयुधों का वर्णन पठनीय है। इसी प्रकार प्रतिमाओं के ताल-मान,
पूजा-मन्त्र आदि का विवरण भी पठनीय है।
10. चित्रशास्त्र : इसके अन्तर्गत चित्रों व पत्रों की उत्पत्ति, पत्रजाति,
कण्टकभेद जीव सूत्र निर्णय, जातिक्रम छन्द से आठ कण्टक, पत्राकारादि का
वर्णन, पट्ट, पत्र, वर्तना निर्णय, लेपकर्म विधि, गुरु-शिष्य सम्बन्ध व उनके लक्षण,
रूपालङ्कार संयुत् चित्रकर्म कथन, षोडश व्यालों, स्त्री-पुरुष के लक्षण आदि ज्ञातव्य
है।
11. आयुध-आभरणशास्त्र : इस विषय के अन्तर्गत कवच और आयुधों की
संख्या एवं लक्षणादि का वर्णन तथा सोलह आभूषणों का वर्णन ज्ञातव्य है।
12. गान्धर्वशास्त्र : नाट्य शास्त्रसम्मत इस विषयानुशासन में ताल एवं वादित्र
लक्षण, ताल के प्रकार, वाद्यों के प्रकार, सात स्वर, राग और रागिनियाँ, चौदह
प्रकार के गीतों के दोष और नौ प्रकार के ताण्डव नृत्यों का वर्णन पठनीय है।