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सर्वकोश
अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

अपराजितपृच्छा (भुवनदेवाचार्य - प्राचीन मन्दिर, प्रासाद, कला एवं वास्तु महाग्रन्थ सटीक)

Aparajitapriccha of Bhuvanadeva with Commentary by Shrikrishna Jugnu

भुवनदेवाचार्य (टीकाकार: डॉ. श्रीकृष्ण 'जुगनू') द्वारा

DevanagariHindipublished535 पृष्ठ

पृष्ठ 13, कुल 535 में से

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xiv
महत्त्वपूर्ण विषयों के प्रतिपादन के साथ ही सत्त्व-रज-तम गुणों के लक्षणों का
वर्णन भी ज्ञातव्य है। देश जाति, कुल, स्थान, वर्ण भेद तत्कालीन स्थितियों का
द्योतक है।
2. कल्प व अवतारशास्त्र : इस क्रम में कल्पान्त क्रम, कल्प के देवता,
पञ्चलिंग, हरिक्षेत्र, मत्स्यादि दस अवतारों का वर्णन, एकादश रुद्र, विश्वकर्मा, बारह
शिवरात्रि निर्णय, शिव पूजन विधि व माहात्म्य वर्णित है। इसी में विश्वकर्मावतार के
साथ ही पृथु-पृथ्वी संवाद में पृथ्वी की रचना और जय-विजय-सिद्धार्थ पृच्छा और
अपराजित के प्रश्न से पुनः पौराणिक विषयों का वर्णन ज्ञेय है। इसमें सप्तद्वीप,
सागर, पर्वत, महाशैल, भारत के ग्रामों, नृपराज्यों का प्रमाण, महावन, उपवन एवं
वनयात्रा का रोचक विवरण है।
3. ज्योतिषशास्त्र : इस क्रम में विष्णु व लिंगादि महापुराणों के अनुसार
ग्रहादि ध्रुव मण्डल, सूर्यादि नव ग्रहों के बिम्बों के मान, ग्रहादिकों की ध्रुव प्रदक्षिण
गति, काल-संख्या प्रमाण, तिथियों, कलाओं, पक्ष, मास, ऋतु, साठ संवत्सरों, युगों
के भेद, चौदह मन्वन्तर का वर्णन और फिर ज्योतिष पञ्चाङ्ग वासना के अन्तर्गत
आवश्यक निर्देश एवं नष्ट ध्रुवक ज्ञात करना, तिथि भुक्ति, संक्रांति, दिन नक्षत्र, महा
नक्षत्र भुक्ति, योग निकालना, करण, सात वार, तिथि, अश्विनी आदि नक्षत्रों, योगों
के नाम, अवकहॊडा ज्योतिष चक्र, नक्षत्र देवताओं के नाम, योनि वैर, आठ वर्ण,
सूर्यादि ग्रहों की दशाओं के फलाफल, चन्द्रमा की बारह अवस्था व उसके फल
और ज्योतिष लक्षण वर्णित है।
4. गणित-मपितशास्त्र : ग्रन्थ में संख्याओं की गणना व पहचान दी गई है
वहीं गणित शब्द निघण्टु आया है। शिलामान निकालने, वृत्तफल, गोलफल,
अष्टकोण फल, षट्कोण क्षेत्रफल, धनुषाकार क्षेत्रफल, त्रिकोणादि आकार सहित
पिण्ड के क्षंत्रफल को निकालने के सूत्र दिए गए हैं। आयादि वास्तु-गणित भी
ज्ञातव्य है।
5. वास्तुशास्त्र : इस क्रम में मानव वास्तु और देववास्तु का प्रधानता से वर्णन
अवलोकनीय है। इसमें क्रमशः भूमि परीक्षण, शकुन निरीक्षण, ग्रह पूजा,
वास्तुपूजा, आचार्यादि पूजन, सूत्रधार परीक्षा, भूपरिग्रह, कीलकारोपण,
कूर्मप्रमाणपद प्रतिष्ठा, वास्तु की उत्पत्ति का आख्यान, देवता न्यास, सोलह सन्धि,
अष्टाङ्ग, अष्टसूत्र पञ्चक्षेत्र का वास्तु स्वरूप एवं वास्तुदेवता निघण्टु ज्ञेय है। इसमें
स्वस्तिकादि विभिन्न वास्तु क्षेत्रों, उनके पदों की संख्या, स्थान, चतुरश्रादि क्षेत्र व
उनके प्रयोजन, वास्तु मर्म निर्णय, दिव्पालादि वास्तुदेव पूजा-बलि कर्मयुक्ति,