अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
षट्षष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत
बालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी उनसे प्रार्थना
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु वासुदेवोऽपि वीर्यवान् ।
उपायाद् वृष्णिभिः सार्धं पुरं वारणसाह्वयम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी बीचमें परम पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण भी
वृष्णिवंशियोंको साथ लेकर हस्तिनापुर आ गये ।। १ ।।
समयं वाजिमेधस्य विदित्वा पुरुषर्षभः ।
यथोक्तो धर्मपुत्रेण प्रव्रजन् स्वपुरीं प्रति ।। २ ।।
उनके द्वारका जाते समय धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जैसी बात कही थी, उसके अनुसार
अश्वमेध यज्ञका समय निकट जानकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पहले ही उपस्थित हो
गये ।। २ ।।
रौक्मिणेयेन सहितो युयुधानेन चैव ह ।
चारुदेष्णेन साम्बेन गदेन कृतवर्मणा ।। ३ ।।
सारणेन च वीरेण निशठोन्मुखेन च ।
उनके साथ रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, गद, कृतवर्मा, सारण,
वीर निशठ और उल्मुक भी थे ।। ३ १/२ ।।
बलदेवं पुरस्कृत्य सुभद्रासहितस्तदा ।। ४ ।।
द्रौपदीमुत्तरां चैव पृथां चाप्यवलोककः ।
समाश्वासयितुं चापि क्षत्रिया निहतेश्वराः ।। ५ ।।
वे बलदेवजीको आगे करके सुभद्राके साथ पधारे थे। उनके शुभागमनका उद्देश्य था
द्रौपदी, उत्तरा और कुन्तीसे मिलना तथा जिनके पति मारे गये थे, उन सभी क्षत्राणियोंको
आश्वासन देना—धीरज बँधाना ।। ४-५ ।।
तानागतान् समीक्ष्यैव धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
प्रत्यगृह्लाद् यथान्यायं विदुरश्च महामनाः ।। ६ ।।
उनके आगमनका समाचार सुनते ही राजा धृतराष्ट्र और महामना विदुरजी खड़े हो गये
और आगे बढ़कर उन्होंने उन सबका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया ।। ६ ।।
तत्रैव न्यवसत् कृष्णः स्वर्चितः पुरुषोत्तमः ।
विदुरेण महातेजास्तथैव च युयुत्सुना ।। ७ ।।
विदुर और युयुत्सुसे भलीभाँति पूजित हो महातेजस्वी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहीं
रहने लगे ॥ ७ ॥
वसत्सु वृष्णिवीरेषु तत्राथ जनमेजय ।
जज्ञे तव पिता राजन् परिक्षित् परवीरहा ॥ ८ ॥
जनमेजय! उन वृष्णिवीरोंके वहाँ निवास करते समय ही तुम्हारे पिता शत्रुवीरहन्ता
परीक्षित्का जन्म हुआ था ॥ ८ ॥
स तु राजा महाराज ब्रह्मास्त्रेणावपीडितः ।
शवो बभूव निश्चेष्टो हर्षशोकविवर्धनः ॥ ९ ॥
महाराज! वे राजा परीक्षित् ब्रह्मास्त्रसे पीड़ित होनेके कारण चेष्टाहीन मुर्देके रूपमें
उत्पन्न हुए, अतः स्वजनोंका हर्ष और शोक बढ़ानेवाले हो गये थे* ॥ ९ ॥
हृष्टानां सिंहनादेन जनानां तत्र निःस्वनः ।
प्रविश्य प्रदिशः सर्वाः पुनरेव व्युपरमत् ॥ १० ॥
पहले पुत्र-जन्मका समाचार सुनकर हर्षमें भरे हुए लोगोंके सिंहनादसे एक महान्
कोलाहल सुनायी पड़ा, जो सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रविष्ट हो पुनः शान्त हो गया ॥ १० ॥
ततः सोऽतित्वरः कृष्णो विवेशान्तःपुरं तदा ।
युयुधानद्वितीयो वै व्यथितेन्द्रियमानसः ॥ ११ ॥
इससे भगवान् श्रीकृष्णके मन और इन्द्रियोंमें व्यथा-सी उत्पन्न हो गयी। वे सात्यकिको
साथ ले बड़ी उतावलीसे अन्तःपुरमें जा पहुँचे ॥ ११ ॥
ततस्त्वरितमायान्तीं ददर्श स्वां पितृष्वसाम् ।
क्रोशन्तीमभिधावेति वासुदेवं पुनः पुनः ॥ १२ ॥
वहाँ उन्होंने अपनी बुआ कुन्तीको बड़े वेगसे आती देखा, जो बारंबार उन्हींका नाम
लेकर 'वासुदेव! दौड़ो-दौड़ो' की पुकार मचा रही थी ॥ १२ ॥
पृष्ठतो द्रौपदीं चैव सुभद्रां च यशस्विनीम् ।
सविक्रोशं सकरुणं बान्धवानां स्त्रियो नृप ॥ १३ ॥
राजन्! उनके पीछे द्रौपदी, यशस्विनी सुभद्रा तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंकी स्त्रियाँ भी
थीं, जो बड़े करुण स्वरसे बिलख-बिलखकर रो रही थीं ॥ १३ ॥
ततः कृष्णं समासाद्य कुन्तिभोजसुता तदा ।
प्रोवाच राजशार्दूल बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १४ ॥
नृपश्रेष्ठ! उस समय श्रीकृष्णके निकट पहुँचकर कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती नेत्रोंसे आँसू
बहाती हुई गद्गद वाणीमें बोली— ॥ १४ ॥
वासुदेव महाबाहो सुप्रजा देवकी त्वया ।
त्वं नो गतिः प्रतिष्ठा च त्वदायत्तमिदं कुलम् ॥ १५ ॥
'महाबाहु वसुदेव-नन्दन! तुम्हें पाकर ही तुम्हारी माता देवकी उत्तम पुत्रवाली मानी
जाती हैं। तुम्हीं हमारे अवलम्ब और तुम्हीं हमलोगोंके आधार हो। इस कुलकी रक्षा तुम्हारे
ही अधीन है ॥ १५ ॥
यदुप्रवीर योऽयं ते स्वस्त्रीयस्यात्मजः प्रभो ।
अश्वत्थाम्ना हतो जातस्तमुज्जीवय केशव ॥ १६ ॥
'यदुवीर! प्रभो! यह जो तुम्हारे भानजे अभिमन्युका बालक है, अश्वत्थामाके अस्त्रसे
मरा हुआ ही उत्पन्न हुआ है। केशव! इसे जीवन-दान दो ॥ १६ ॥
त्वया ह्येतत् प्रतिज्ञातमैषीके यदुनन्दन ।
अहं संजीवयिष्यामि मृतं जातमिति प्रभो ॥ १७ ॥
'यदुनन्दन! प्रभो! अश्वत्थामाने जब सींकके बाणका प्रयोग किया था, उस समय तुमने
यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं उत्तराके मरे हुए बालकको भी जीवित कर दूँगा ॥ १७ ॥
सोऽयं जातो मृतस्तात पश्यैनं पुरुषर्षभ ।
उत्तरां च सुभद्रां च द्रौपदीं मां च माधव ॥ १८ ॥
'तात! वही यह बालक है, जो मरा हुआ ही पैदा हुआ है। पुरुषोत्तम! इसपर अपनी
कृपादृष्टि डालो। माधव! इसे जीवित करके ही उत्तरा, सुभद्रा और द्रौपदीसहित मेरी रक्षा
करो ॥ १८ ॥
धर्मपुत्रं च भीमं च फाल्गुनं नकुलं तथा ।
सहदेवं च दुर्धर्ष सर्वान् नस्त्रातुमर्हसि ॥ १९ ॥
'दुर्धर्ष वीर! धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी भी रक्षा करो।
तुम हम सब लोगोंका इस संकटसे उद्धार करनेयोग्य हो ॥ १९ ॥
अस्मिन् प्राणाःसमायत्ताः पाण्डवानां ममैव च ।
पाण्डोश्च पिण्डो दाशार्ह तथैव श्वशुरस्य मे ॥ २० ॥
'मेरे और पाण्डवोंके प्राण इस बालकके ही अधीन हैं। दशार्हकुलनन्दन! मेरे पति
पाण्डु तथा श्वशुर विचित्रवीर्यके पिण्डका भी यही सहारा है ॥ २० ॥
अभिमन्योश्च भद्रं ते प्रियस्य सदृशस्य च ।
प्रियमुत्पादयाद्य त्वं प्रेतस्यापि जनार्दन ॥ २१ ॥
'जनार्दन! तुम्हारा कल्याण हो। जो तुम्हें अत्यन्त प्रिय और तुम्हारे ही समान परम
सुन्दर था, उस परलोकवासी अभिमन्युका भी प्रिय करो—उसके इस बालकको जिला
दो ॥ २१ ॥
उत्तरा हि पुरोक्तं वै कथयत्यरिसूदन ।
अभिमन्योर्वचः कृष्ण प्रियत्वात् तन्न संशयः ॥ २२ ॥
'शत्रुसूदन श्रीकृष्ण! मेरी बहूरानी उत्तरा अभिमन्युकी पहलेकी कही हुई एक बात
अत्यन्त प्रिय होनेके कारण बार-बार दुहराया करती है। उस बातकी यथार्थतामें तनिक भी
संदेह नहीं है ।। २२ ।।
अब्रवीत् किल दाशार्ह वैराटीमार्जुनिस्तदा ।
मातुलस्य कुलं भद्रे तव पुत्रो गमिष्यति ।। २३ ।।
गत्वा वृष्ण्यन्धककुलं धनुर्वेदं ग्रहीष्यति ।
अस्त्राणि च विचित्राणि नीतिशास्त्रं च केवलम् ।। २४ ।।
‘दाशार्ह! अभिमन्युने उत्तरासे कभी स्नेहवश कहा था—‘‘कल्याणी! तुम्हारा पुत्र मेरे
मामाके यहाँ जायगा-वृष्णि एवं अन्धकोंके कुलमें जाकर धनुर्वेद, नाना प्रकारके विचित्र
अस्त्र-शस्त्र तथा विशुद्ध नीतिशास्त्रकी शिक्षा प्राप्त करेगा’’ ।। २३-२४ ।।
इत्येतत् प्रणयात् तात सौभद्रः परवीरहा ।
कथयामास दुर्धर्षस्तथा चैतन्न संशयः ।। २५ ।।
‘तात! शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले दुर्धर्ष वीर सुभद्रकुमारने जो प्रेमपूर्वक यह बात
कही थी, यह निस्संदेह सत्य होनी चाहिये ।। २५ ।।
तास्त्वां वयं प्रणम्येह याचामो मधुसूदन ।
कुलस्यास्य हितार्थं तं कुरु कल्याणमुत्तमम् ।। २६ ।।
‘मधुसूदन! इस कुलकी भलाईके लिये हम सब लोग तुम्हारे पैरों पड़कर भीख माँगती
हैं, इस बालकको जिलाकर तुम कुरुकुलका सर्वोत्तम कल्याण करो’ ।। २६ ।।
एवमुक्त्वा तु वार्ष्णेयं पृथा पृथुललोचना ।
उच्छ्रित्य बाहू दुःखार्ता ताश्चान्याः प्रापतन् भुवि ।। २७ ।।
श्रीकृष्णसे ऐसा कहकर विशाललोचना कुन्ती दोनों बाँहें ऊपर उठाकर दुःखसे आर्त हो
पृथ्वीपर गिर पड़ीं। दूसरी स्त्रियोंकी भी यही दशा हुई ।। २७ ।।
अब्रुवंश्च महाराज सर्वाः सास्त्राविलेक्षणाः ।
स्वस्त्रीयो वासुदेवस्य मृतो जात इति प्रभो ।। २८ ।।
समर्थ महाराज! उन सबकी आँखोंसे आँसुओंकी धारा बह रही थी और वे सभी रो-
रोकर कह रही थीं कि ‘हाय! श्रीकृष्णके भानजेका बालक मरा हुआ पैदा हुआ’ ।। २८ ।।
एवमुक्ते ततः कुन्तीं पर्यगृह्णाज्जनार्दनः ।
भूमौ निपतितां चैनां सान्त्वयामास भारत ।। २९ ।।
भरतनन्दन! उन सबके ऐसा कहनेपर जनार्दन श्रीकृष्णने कुन्तीदेवीको सहारा देकर
बैठाया और पृथ्वीपर पड़ी हुई अपनी बुआको वे सान्त्वना देने लगे ।। २९ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि परीक्षिञ्जन्मकथने
षट्षष्टितमोऽध्यायः ।। ६६ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें परीक्षित्के जन्मका
वर्णनविषयक छाछठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६६ ।।
- पहले तो पुत्र-जन्मके समाचारसे सबको अपार हर्ष हुआ; किंतु उनमें जीवनका कोई चिह्न न देखकर तत्काल
शोकका समुद्र उमड़ पड़ा।
सप्तषष्टितमोऽध्यायः
परीक्षित्को जिलानेके लिये सुभद्राकी श्रीकृष्णसे प्रार्थना
वैशम्पायन उवाच
उत्थितायां पृथायां तु सुभद्रा भ्रातरं तदा ।
दृष्ट्वा चुक्रोश दुःखार्ता वचनं चेदमब्रवीत् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! कुन्तीदेवीके बैठ जानेपर सुभद्रा अपने भाई
श्रीकृष्णकी ओर देखकर फूट-फूटकर रोने लगी और दुःखसे आर्त होकर यों बोली
—॥ १ ॥
पुण्डरीकाक्ष पश्य त्वं पौत्रं पार्थस्य धीमतः ।
परिक्षीनेषु कुरुषु परिक्षीणं गतायुषम् ॥ २ ॥
'भैया कमलनयन! तुम अपने सखा बुद्धिमान् पार्थके इस पौत्रकी दशा तो देखो।
कौरवोंके नष्ट हो जानेपर इसका जन्म हुआ; परंतु यह भी गतायु होकर नष्ट हो
गया ॥ २ ॥
इषीका द्रोणपुत्रेण भीमसेनार्थमुद्यता ।
सोत्तरायां निपतिता विजये मयि चैव ह ॥ ३ ॥
'द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने भीमसेनको मारनेके लिये जो सींकका बाण उठाया था, वह
उत्तरापर, तुम्हारे सखा विजयपर और मुझपर गिरा है ॥ ३ ॥
सेयं विदीर्णे हृदये मयि तिष्ठति केशव ।
यन्न पश्यामि दुर्धर्ष सहपुत्रं तु तं प्रभो ॥ ४ ॥
'दुर्धर्ष वीर केशव! प्रभो! वह सींक मेरे इस विदीर्ण हुए हृदयमें आज भी कसक रही
है; क्योंकि इस समय मैं पुत्रसहित अभिमन्युको नहीं देख पाती हूँ ॥ ४ ॥
किं नु वक्ष्यति धर्मात्मा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भीमसेनार्जुनौ चापि माद्रवत्याः सुतौ च तौ ॥ ५ ॥
श्रुत्वाभिमन्योस्तनयं जातं च मृतमेव च ।
मुषिता इव वार्ष्णेय द्रोणपुत्रेण पाण्डवाः ॥ ६ ॥
'अभिमन्युका बेटा जन्म लेनेके साथ ही मर गया—इस बातको सुनकर धर्मात्मा राजा
युधिष्ठिर क्या कहेंगे? भीमसेन, अर्जुन तथा माद्रीकुमार नकुल-सहदेव भी क्या सोचेंगे?
श्रीकृष्ण! आज द्रोणपुत्रने पाण्डवोंका सर्वस्व लूट लिया ॥ ५-६ ॥
अभिमन्युः प्रियः कृष्ण भ्रातृणां नात्र संशयः ।
ते श्रुत्वा किं नु वक्ष्यन्ति द्रोणपुत्रास्त्रनिर्जिताः ॥ ७ ॥
‘श्रीकृष्ण! अभिमन्यु पाँचों भाइयोंको अत्यन्त प्रिय था—इसमें संशय नहीं है। उसके
पुत्रकी यह दशा सुनकर अश्वत्थामाके अस्त्रसे पराजित हुए पाण्डव क्या कहेंगे? ।। ७ ।।
भवेतातः परं दुःखं किं तदन्यज्जनार्दन ।
अभिमन्योः सुतात् कृष्ण मृताज्जातादरिंदम ।। ८ ।।
‘शत्रुसूदन! जनार्दन! श्रीकृष्ण! अभिमन्यु-जैसे वीरका पुत्र मरा हुआ पैदा हो, इससे
बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है? ।। ८ ।।
साहं प्रसादये कृष्ण त्वामद्य शिरसा नता ।
पृथेयं द्रौपदी चैव ताः पश्य पुरुषोत्तम ।। ९ ।।
‘पुरुषोत्तम! श्रीकृष्ण! आज मैं तुम्हारे चरणोंपर मस्तक रखकर तुम्हें प्रसन्न करना
चाहती हूँ। बूआ कुन्ती और बहिन द्रौपदी भी तुम्हारे पैरोंपर पड़ी हुई हैं। इन सबकी ओर
देखो ।। ९ ।।
यदा द्रोणसुतो गर्भान् पाण्डूनां हन्ति माधव ।
तदा किल त्वया द्रौणिः क्रुद्धेनोक्तोऽरिमर्दन ।। १० ।।
‘शत्रुमर्दन माधव! जब द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पाण्डवोंके गर्भकी भी हत्या करनेका
प्रयत्न कर रहा था, उस समय तुमने कुपित होकर उससे कहा था ।। १० ।।
अकामं त्वां करिष्यामि ब्रह्मबन्धो नराधम ।
अहं संजीवयिष्यामि किरीटितनयात्मजम् ।। ११ ।।
‘ब्रह्मबन्धो! नराधम! मैं तेरी इच्छा पूर्ण नहीं होने दूँगा। अर्जुनके पौत्रको अपने
प्रभावसे जीवित कर दूँगा ।। ११ ।।
इत्येतद् वचनं श्रुत्वा जानानाहं बलं तव ।
प्रसादये त्वां दुर्धर्ष जीवतामभिमन्युजः ।। १२ ।।
‘भैया! तुम दुर्धर्ष वीर हो। मैं तुम्हारी उस बातको सुनकर तुम्हारे बलको अच्छी तरह
जानती हूँ। इसीलिये तुम्हें प्रसन्न करना चाहती हूँ। तुम्हारे कृपा-प्रसादसे अभिमन्युका यह
पुत्र जीवित हो जाय ।। १२ ।।
यद्येतत् त्वं प्रतिश्रुत्य न करोषि वचः शुभम् ।
सकलं वृष्णिशार्दूल मृतां मामवधारय ।। १३ ।।
‘वृष्णिवंशके सिंह! यदि तुम ऐसी प्रतिज्ञा करके अपने मंगलमय वचनका पूर्णतः
पालन नहीं करोगे तो यह समझ लो, सुभद्रा जीवित नहीं रहेगी—मैं अपने प्राण दे
दूँगी ।। १३ ।।
अभिमन्योः सुतो वीर न संजीवति यद्ययम् ।
जीवति त्वयि दुर्धर्ष किं करिष्याम्यहं त्वया ।। १४ ।।
‘दुर्धर्ष वीर! यदि तुम्हारे जीते-जी अभिमन्युके इस बालकको जीवनदान न मिला तो
तुम मेरे किस काम आओगे ।। १४ ।।
संजीवयैनं दुर्धर्ष मृतं त्वमभिमन्युजम् ।
सदृशाक्षसुतं वीर सस्यं वर्षन्निवाम्बुदः ॥ १५ ॥
'अजेय वीर! जैसे बादल पानी बरसाकर सूखी खेतीको भी हरी-भरी कर देता है, उसी
प्रकार तुम अपने ही समान नेत्रवाले अभिमन्युके इस मरे हुए पुत्रको जीवित कर
दो ॥ १५ ॥
त्वं हि केशव धर्मात्मा सत्यवान् सत्यविक्रमः ।
स तां वाचमृतां कर्तुमर्हसि त्वमरिंदम ॥ १६ ॥
'शत्रुदमन केशव! तुम धर्मात्मा, सत्यवादी और सत्यपराक्रमी हो; अतः तुम्हें अपनी
कही हुई बातको सत्य कर दिखाना चाहिये ॥ १६ ॥
इच्छन्नपि हि लोकांस्त्रीन् जीवयेथा मृतानिमान् ।
किं पुनर्दयितं जातं स्वस्रीयस्यात्मजं मृतम् ॥ १७ ॥
'तुम चाहो तो मृत्युके मुखमें पड़े हुए तीनों लोकोंको जिला सकते हो, फिर अपने
भानजेके इस प्यारे पुत्रको, जो मर चुका है, जीवित करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात
है ॥ १७ ॥
प्रभावज्ञास्मि ते कृष्ण तस्मात् त्वां याचयाम्यहम् ।
कुरुष्व पाण्डुपुत्राणामिमं परमनुग्रहम् ॥ १८ ॥
'श्रीकृष्ण! मैं तुम्हारे प्रभावको जानती हूँ। इसीलिये तुमसे याचना करती हूँ। इस
बालकको जीवनदान देकर तुम पाण्डवोंपर यह महान् अनुग्रह करो ॥ १८ ॥
स्वसेति वा महाबाहो हतपुत्रेति वा पुनः ।
प्रपन्ना मामियं चेति दयां कर्तुमिहार्हसि ॥ १९ ॥
'महाबाहो! तुम यह समझकर कि यह मेरी बहिन है अथवा जिसका बेटा मारा गया है,
वह दुखिया है अथवा शरणमें आयी हुई एक दयनीय अबला है, मुझपर दया करने योग्य
हो' ॥ १९ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सुभद्रावाक्ये
सप्तषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सुभद्राका वचनविषयक
सरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६७ ॥
अष्टषष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका प्रसूतिगृहमें प्रवेश, उत्तराका विलाप और
अपने पुत्रको जीवित करनेके लिये प्रार्थना
वैशम्पायन उवाच
एवमुक्तस्तु राजेन्द्र केशिहा दुःखमूर्च्छितः ।
तथेति व्याजहारोच्चैर्ह्लादयन्निव तं जनम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र! सुभद्राके ऐसा कहनेपर केशिहन्ता केशव दुःखसे
व्याकुल हो उसे प्रसन्न करते हुए-से उच्च स्वरमें बोले—'बहिन! ऐसा ही होगा' ॥ १ ॥
वाक्येनेतेन हि तदा तं जनं पुरुषर्षभः ।
ह्लादयामास स विभुर्घर्मातं सलिलैरिव ॥ २ ॥
जैसे धूपसे तपे हुए मनुष्यको जलसे नहला देनेपर बड़ी शान्ति मिल जाती है, उसी
प्रकार पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णने इस अमृतमय वचनके द्वारा सुभद्रा तथा अन्तःपुरकी
दूसरी स्त्रियोंको महान् आह्लाद प्रदान किया ॥ २ ॥
ततः स प्राविशत् तूर्णं जन्मवेश्म पितुस्तव ।
अर्चितं पुरुषव्याघ्र सितैर्माल्यैर्यथाविधि ॥ ३ ॥
पुरुषसिंह! तदनन्तर भगवान् श्रीकृष्ण तुरंत ही तुम्हारे पिताके जन्मस्थान—
सूतिकागारमें गये; जो सफेद फूलोंकी मालाओंसे विधिपूर्वक सजाया गया था ॥ ३ ॥
अपां कुम्भैः सुपूर्णैश्च विन्यस्तैः सर्वतोदिशम् ।
घृतेन तिन्दुकालातैः सर्षपैश्च महाभुज ॥ ४ ॥
महाबाहो! उसके चारों ओर जलसे भरे हुए कलश रखे गये थे। घीसे तर किये हुए
तेन्दुक नामक काष्ठके कई टुकड़े जल रहे थे तथा यत्र-तत्र सरसों बिखेरी गयी थी ॥ ४ ॥
अस्त्रैश्च विमलैर्न्यस्तैः पावकैश्च समन्ततः ।
वृद्धाभिश्चापि रामाभिः परिचारार्थमावृतम् ॥ ५ ॥
दक्षैश्च परितो धीर भिषग्भिः कुशलैस्तथा ।
धैर्यशाली राजन्! उस घरके चारों ओर चमकते हुए तेज हथियार रखे गये थे और सब
ओर आग प्रज्वलित की गयी थी। सेवाके लिये उपस्थित हुई बूढ़ी स्त्रियोंने उस स्थानको घेर
रखा था तथा अपने-अपने कार्यमें कुशल चतुर चिकित्सक भी चारों ओर मौजूद थे ॥ ५½
॥
ददर्श च स तेजस्वी रक्षोघ्नान्यपि सर्वशः ॥ ६ ॥
द्रव्याणि स्थापितानि स्म विधिवत् कुशलैर्जनैः ।
तेजस्वी श्रीकृष्णने देखा कि व्यवस्थाकुशल मनुष्योंद्वारा वहाँ सब ओर राक्षसोंका
निवारण करनेवाली नाना प्रकारकी वस्तुएँ विधिपूर्वक रखी गयी थीं ॥ ६ १/२ ॥
तथायुक्तं च तद् दृष्ट्वा जन्मवेश्म पितुस्तव ॥ ७ ॥
हृष्टोऽभवद् हृषीकेशः साधु साध्विति चाब्रवीत् ।
तुम्हारे पिताके जन्मस्थानको इस प्रकार आवश्यक वस्तुओंसे सुसज्जित देख भगवान्
श्रीकृष्ण बहुत प्रसन्न हुए और ‘बहुत अच्छा’ कहकर उस प्रबन्धकी प्रशंसा करने लगे ॥ ७
१/२ ॥
तथा ब्रुवति वार्ष्णेये प्रहृष्टवदने तदा ॥ ८ ॥
द्रौपदी त्वरिता गत्वा वैराटीं वाक्यमब्रवीत् ।
जब भगवान् श्रीकृष्ण प्रसन्नमुख होकर उसकी सराहना कर रहे थे, उसी समय द्रौपदी
बड़ी तेजीके साथ उत्तराके पास गयी और बोली— ॥ ८ १/२ ॥
अयमायाति ते भद्रे श्वशुरो मधुसूदनः ॥ ९ ॥
पुराणर्षिरचिन्त्यात्मा समीपमपराजितः ।
‘कल्याणि! यह देखो, तुम्हारे श्वशुरतुल्य, अचिन्त्य-स्वरूप, किसीसे पराजित न
होनेवाले, पुरातन ऋषि भगवान् मधुसूदन तुम्हारे पास आ रहे हैं’ ॥ ९ १/२ ॥
सापि बाष्पकलां वाचं निगृह्याश्रूणि चैव ह ॥ १० ॥
सुसंवीताभवद् देवी देववत् कृष्णमीयुषी ।
सा तथा दूयमानेन हृदयेन तपस्विनी ॥ ११ ॥
दृष्ट्वा गोविन्दमायान्तं कृपणं पर्यदेवयत् ।
यह सुनकर उत्तराने अपने आँसुओंको रोककर रोना बंद कर दिया और अपने सारे
शरीरको वस्त्रोंसे ढक लिया। श्रीकृष्णके प्रति उसकी भगवद्बुद्धि थी; इसलिये उन्हें आते
देख वह तपस्विनी बाला व्यथित हृदयसे करुणविलाप करती हुई गद्गद-कण्ठसे इस प्रकार
बोली— ॥ १०-११ १/२ ॥
पुण्डरीकाक्ष पश्यावां बालेन हि विनाकृतौ ।
अभिमन्युं च मां चैव हतौ तुल्यं जनार्दन ॥ १२ ॥
‘कमलनयन! जनार्दन! देखिये, आज मैं और मेरे पति दोनों ही संतानहीन हो गये।
आर्यपुत्र तो युद्धमें वीरगतिको प्राप्त हुए हैं; परंतु मैं पुत्रशोकसे मारी गयी। इस प्रकार हम
दोनों समान रूपसे ही कालके ग्रास बन गये ॥ १२ ॥
वार्ष्णेय मधुहन् वीर शिरसा त्वां प्रसादये ।
द्रोणपुत्रास्त्रनिर्दग्धं जीवयैनं ममात्मजम् ॥ १३ ॥
‘वृष्णिनन्दन! वीर मधुसूदन! मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर आपका कृपाप्रसाद
प्राप्त करना चाहती हूँ। द्रोणपुत्र अश्वत्थामाके अस्त्रसे दग्ध हुए मेरे इस पुत्रको जीवित कर
दीजिये ॥ १३ ॥
यदि स्म धर्मराज्ञा वा भीमसेनेन वा पुनः ।
त्वया वा पुण्डरीकाक्ष वाक्यमुक्तमिदं भवेत् ॥ १४ ॥
अजानतीमिषीकेयं जनित्रीं हन्त्विति प्रभो ।
अहमेव विनष्टा स्यां नैतदेवंगते भवेत् ॥ १५ ॥
'प्रभो! पुण्डरीकाक्ष! यदि धर्मराज अथवा आर्य भीमसेन या आपने ही ऐसा कह दिया
होता कि यह सींक इस बालकको न मारकर इसकी अनजान माताको ही मार डाले, तब
केवल मैं ही नष्ट हुई होती। उस दशामें यह अनर्थ नहीं होता ॥ १४-१५ ॥
गर्भस्थस्यास्य बालस्य ब्रह्मास्त्रेण निपातनम् ।
कृत्वा नृशंसं दुर्बुद्धिर्द्रौणिः किं फलमश्नुते ॥ १६ ॥
'हाय! इस गर्भके बालकको ब्रह्मास्त्रसे मार डालनेका क्रूरतापूर्ण कर्म करके दुर्बुद्धि
द्रोणपुत्र अश्वत्थामा कौन-सा फल पा रहा है ॥ १६ ॥
सा त्वां प्रसाद्य शिरसा याचे शत्रुनिबर्हणम् ।
प्राणांस्त्यक्ष्यामि गोविन्द नायं संजीवते यदि ॥ १७ ॥
'गोविन्द! आप शत्रुओंका संहार करनेवाले हैं। मैं आपके चरणोंमें मस्तक रखकर
आपको प्रसन्न करके आपसे इस बालकके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ। यदि यह जीवित नहीं
हुआ तो मैं भी अपने प्राण त्याग दूँगी ॥ १७ ॥
अस्मिन् हि बहवः साधो ये ममासन् मनोरथाः ।
ते द्रोणपुत्रेण हताः किं नु जीवामि केशव ॥ १८ ॥
'साधुपुरुष केशव! इस बालकपर मैंने जो बड़ी-बड़ी आशाएँ बाँध रखी थीं, द्रोणपुत्र
अश्वत्थामाने उन सबको नष्ट कर दिया। अब मैं किसलिये जीवित रहूँ? ॥ १८ ॥
आसीन्मम मतिः कृष्ण पुत्रोत्सङ्गा जनार्दन ।
अभिवादयिष्ये हृष्टेति तदिदं वितथीकृतम् ॥ १९ ॥
'श्रीकृष्ण! जनार्दन! मेरी बड़ी आशा थी कि अपने इस बच्चेको गोदमें लेकर मैं
प्रसन्नतापूर्वक आपके चरणोंमें अभिवादन करूँगी; किंतु अब वह व्यर्थ हो गयी ॥ १९ ॥
चपलाक्षस्य दायादे मृतेऽस्मिन् पुरुषर्षभ ।
विफला मे कृताः कृष्ण हृदि सर्वे मनोरथाः ॥ २० ॥
'पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण! चंचल नेत्रोंवाले पतिदेवके इस पुत्रकी मृत्यु हो जानेसे मेरे हृदयके
सारे मनोरथ निष्फल हो गये ॥ २० ॥
चपलाक्षः किलातीव प्रियस्ते मधुसूदन ।
सुतं पश्य त्वमस्यैनं ब्रह्मास्त्रेण निपातितम् ॥ २१ ॥
'मधुसूदन! सुनती हूँ कि चंचल नेत्रोंवाले अभिमन्यु आपको बहुत ही प्रिय थे। उन्हींका
बेटा आज ब्रह्मास्त्रकी मारसे मरा पड़ा है। आप इसे आँख भरकर देख लीजिये ॥ २१ ॥
कृतघ्नोऽयं नृशंसोऽयं यथास्य जनकस्तथा ।
यः पाण्डवीं श्रियं त्यक्त्वा गतोऽद्य यमसादनम् ॥ २२ ॥
‘यह बालक भी अपने पिताके ही समान कृतघ्न और नृशंस है, जो पाण्डवोंकी
राजलक्ष्मीको छोड़कर आज अकेला ही यमलोक चला गया ।। २२ ।।
मया चैतत् प्रतिज्ञातं रणमूर्धनि केशव ।
अभिमन्यौ हते वीर त्वामेष्याम्यचिरादिति ॥ २३ ॥
‘केशव! मैंने युद्धके मुहानेपर यह प्रतिज्ञा की थी कि ‘मेरे वीर पतिदेव! यदि आप मारे
गये तो मैं शीघ्र ही परलोकमें आपसे आ मिलूँगी ।। २३ ।।
तच्च नाकरवं कृष्ण नृशंसा जीवितप्रिया ।
इदानीं मां गतां तत्र किं नु वक्ष्यति फाल्गुनिः ॥ २४ ॥
‘परंतु श्रीकृष्ण! मैंने उस प्रतिज्ञाका पालन नहीं किया। मैं बड़ी कठोरहृदया हूँ। मुझे
पतिदेव नहीं, ये प्राण ही प्यारे हैं। यदि इस समय मैं परलोकमें जाऊँ तो वहाँ अर्जुनकुमार
मुझसे क्या कहेंगे?’ ।। २४ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तरावाक्ये
अष्टषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तराका वाक्यविषयक
अड़सठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६८ ।।
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः
उत्तराका विलाप और भगवान् श्रीकृष्णका उसके मृत
बालकको जीवन-दान देना
वैशम्पायन उवाच
सैवं विलप्य करुणं सोन्मादेव तपस्विनी ।
उत्तरा न्यपतद् भूमौ कृपणा पुत्रगृद्धिनी ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पुत्रका जीवन चाहनेवाली तपस्विनी उत्तरा
उन्मादिनी-सी होकर इस प्रकार दीनभावसे करुण विलाप करके पृथ्वीपर गिर पड़ी ॥ १ ॥
तां तु दृष्ट्वा निपतितां हतपुत्रपरिच्छदाम् ।
चुक्रोश कुन्ती दुःखार्ता सर्वाश्च भरतस्त्रियः ॥ २ ॥
जिसका पुत्ररूपी परिवार नष्ट हो गया था, उस उत्तराको पृथ्वीपर पड़ी हुई देख दुःखसे
आतुर हुई कुन्तीदेवी तथा भरतवंशकी सारी स्त्रियाँ फूट-फूटकर रोने लगीं ॥ २ ॥
मुहूर्तमिव राजेन्द्र पाण्डवानां निवेशनम् ।
अप्रेक्षणीयमभवदार्तस्वनविनादितम् ॥ ३ ॥
राजेन्द्र! दो घड़ीतक पाण्डवोंका वह भवन आर्तनादसे गूँजता रहा। उस समय उसकी
ओर देखते नहीं बनता था ॥ ३ ॥
सा मुहूर्तं च राजेन्द्र पुत्रशोकाभिपीडिता ।
कश्मलाभिहता वीर वैराटी त्वभवत् तदा ॥ ४ ॥
वीर राजेन्द्र! पुत्रशोकसे पीड़ित वह विराटकुमारी उत्तरा उस समय दो घड़ीतक
मूर्च्छामें पड़ी रही ॥ ४ ॥
प्रतिलभ्य तु सा संज्ञांमुत्तरा भरतर्षभ ।
अङ्कमारोप्य तं पुत्रमिदं वचनमब्रवीत् ॥ ५ ॥
भरतश्रेष्ठ! थोड़ी देर बाद उत्तरा जब होशमें आयी, तब उस मरे हुए पुत्रको गोदमें लेकर
यों कहने लगी— ॥ ५ ॥
धर्मज्ञस्य सुतः स त्वमधर्मं नावबुध्यसे ।
यस्त्वं वृष्णिप्रवीरस्य कुरुषे नाभिवादनम् ॥ ६ ॥
'बेटा! तू तो धर्मज्ञ पिताका पुत्र है। फिर तेरे द्वारा जो अधर्म हो रहा है, उसे तू क्यों नहीं
समझता? वृष्णिवंशके श्रेष्ठ वीर भगवान् श्रीकृष्ण सामने खड़े हैं तो भी तू इन्हें प्रणाम क्यों
नहीं करता? ॥ ६ ॥
पुत्र गत्वा मम वचो ब्रूयास्त्वं पितरं त्विदम् ।
दुर्मरं प्राणिनां वीर कालेऽप्राप्ते कथंचन ।। ७ ।।
याहं त्वया विनाद्येह पत्या पुत्रेण चैव ह ।
मर्त्तव्ये सति जीवामि हतस्वस्तिरकिंचना ।। ८ ।।
‘वत्स! परलोकमें जाकर तू अपने पितासे मेरी यह बात कहना—‘वीर! अन्तकाल
आये बिना प्राणियोंके लिये किसी तरह भी मरना बड़ा कठिन होता है। तभी तो मैं यहाँ
आप-जैसे पति तथा इस पुत्रसे बिछुड़कर भी जब कि मुझे मर जाना चाहिये, अबतक जी
रही हूँ; मेरा सारा मंगल नष्ट हो गया है। मैं अकिंचन हो गयी हूँ’ ।।
अथवा धर्मराज्ञाहमनुज्ञाता महाभुज ।
भक्षयिष्ये विषं घोरं प्रवेक्ष्ये वा हुताशनम् ।। ९ ।।
‘महाबाहो! अब मैं धर्मराजकी आज्ञा लेकर भयानक विष खा लूँगी अथवा प्रज्वलित
अग्निमें समा जाऊँगी ।। ९ ।।
अथवा दुर्मरं तात यदिदं मे सहस्रधा ।
पतिपुत्रविहीनाया हृदयं न विदीर्यते ।। १० ।।
‘तात! जान पड़ता है, मनुष्यके लिये मरना अत्यन्त कठिन है, क्योंकि पति और पुत्रसे
हीन होनेपर भी मेरे इस हृदयके हजारों टुकड़े नहीं हो रहे हैं ।। १० ।।
उत्तिष्ठ पुत्र पश्येमं दुःखितां प्रपितामहीम् ।
आर्त्तामुपप्लुतां दीनां निमग्नां शोकसागरे ।। ११ ।।
‘बेटा! उठकर खड़ा हो जा। देख! ये तेरी परदादी (कुन्ती) कितनी दुखी हैं। ये तेरे लिये
आर्त, व्यथित एवं दीन होकर शोकके समुद्रमें डूब गयी हैं ।। ११ ।।
आर्यां च पश्य पाञ्चालीं सात्वतीं च तपस्विनीम् ।
मां च पश्य सुदुःखार्त्ता व्याधविद्धां मृगीमिव ।। १२ ।।
‘आर्या पांचाली (द्रौपदी)-की ओर देख, अपनी दादी तपस्विनी सुभद्राकी ओर दृष्टिपात
कर और व्याधके बाणोंसे बिंधी हुई हरिणीकी भाँति अत्यन्त दुःखसे आर्त हुई मुझ अपनी
माँको भी देख ले ।। १२ ।।
उत्तिष्ठ पश्य वदनं लोकनाथस्य धीमतः ।
पुण्डरीकपलाशाक्षं पुरेव चपलेक्षणम् ।। १३ ।।
‘बेटा! उठकर खड़ा हो जा और बुद्धिमान् जगदीश्वर श्रीकृष्णके कमलदलके समान
नेत्रोंवाले मुखारविन्दकी शोभा निहार, ठीक उसी तरह जैसे पहले मैं चंचल नेत्रोंवाले तेरे
पिताका मुँह निहारा करती थी’ ।। १३ ।।
एवं विप्रलपन्तीं तु दृष्ट्वा निपतितां पुनः ।
उत्तरां तां स्त्रियं सर्वाः पुनरुत्थापयंस्ततः ।। १४ ।।
इस प्रकार विलाप करती हुई उत्तराको पुनः पृथ्वीपर पड़ी देख सब स्त्रियोंने उसे फिर
उठाकर बिठाया ।। १४ ।।
उत्थाय च पुनर्धैर्यात् तदा मत्स्यपतेः सुता ।
प्राञ्जलिः पुण्डरीकाक्षं भूमावेवाभ्यवादयत् ॥ १५ ॥
पुनः उठकर धैर्य धारण करके मत्स्यराजकुमारीने पृथ्वीपर ही हाथ जोड़कर
कमलनयन भगवान् श्रीकृष्णको प्रणाम किया ॥ १५ ॥
श्रुत्वा स तस्या विपुलं विलापं पुरुषर्षभः ।
उपस्पृश्य ततः कृष्णो ब्रह्मास्त्रं प्रत्यसंहरत् ॥ १६ ॥
उसका महान् विलाप सुनकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्णने आचमन करके अश्वत्थामाके
चलाये हुए ब्रह्मास्त्रको शान्त कर दिया ॥ १६ ॥
प्रतिजज्ञे च दाशार्हस्तस्य जीवितमच्युतः ।
अब्रवीच्च विशुद्धात्मा सर्वं विश्रावयन् जगत् ॥ १७ ॥
तत्पश्चात् विशुद्ध हृदयवाले और कभी अपनी महिमासे विचलित न होनेवाले भगवान्
श्रीकृष्णने उस बालकको जीवित करनेकी प्रतिज्ञा की और सम्पूर्ण जगत्को सुनाते हुए इस
प्रकार कहा— ॥ १७ ॥
न ब्रवीम्युत्तरे मिथ्या सत्यमेतद् भविष्यति ।
एष संजीवयाम्येनं पश्यतां सर्वदेहिनाम् ॥ १८ ॥
‘बेटी उत्तरा! मैं झूठ नहीं बोलता। मैंने जो प्रतिज्ञा की है, वह सत्य होकर ही रहेगी।
देखो, मैं समस्त देहधारियोंके देखते-देखते अभी इस बालकको जिलाये देता हूँ ॥ १८ ॥
नोक्तपूर्वं मया मिथ्या स्वैरेष्वपि कदाचन ।
न च युद्धात् परावृत्तस्तथा संजीवतामयम् ॥ १९ ॥
‘मैंने खेल-कूदमें भी कभी मिथ्या भाषण नहीं किया है और युद्धमें पीठ नहीं दिखायी
है। इस शक्तिके प्रभावसे अभिमन्युका यह बालक जीवित हो जाय ॥ १९ ॥
यथा मे दयितो धर्मो ब्राह्मणश्च विशेषतः ।
अभिमन्योः सुतो जातो मृतो जीवत्वयं तथा ॥ २० ॥
‘यदि धर्म और ब्राह्मण मुझे विशेष प्रिय हों तो अभिमन्युका यह पुत्र, जो पैदा होते ही
मर गया था, फिर जीवित हो जाय ॥ २० ॥
यथाहं नाभिजानामि विजये तु कदाचन ।
विरोधं तेन सत्येन मृतो जीवत्वयं शिशुः ॥ २१ ॥
‘मैंने कभी अर्जुनसे विरोध किया हो, इसका स्मरण नहीं है; इस सत्यके प्रभावसे यह
मरा हुआ बालक अभी जीवित हो जाय ॥ २१ ॥
यथा सत्यं च धर्मश्च मयि नित्यं प्रतिष्ठितौ ।
तथा मृतः शिशुरयं जीवतादभिमन्युजः ॥ २२ ॥
‘यदि मुझमें सत्य और धर्मकी निरन्तर स्थिति बनी रहती हो तो अभिमन्युका यह मरा
हुआ बालक जी उठे ॥ २२ ॥
यथा कंसश्च केशी च धर्मेण निहतौ मया ।
तेन सत्येन बालोऽयं पुनः संजीवतामयम् ॥ २३ ॥
'मैंने कंस और केशीका धर्मके अनुसार वध किया है, इस सत्यके प्रभावसे यह बालक
फिर जीवित हो जाय' ॥ २३ ॥
इत्युक्तो वासुदेवेन स बालो भरतर्षभ ।
शनैः शनैर्महाराज प्रास्पन्दत सचेतनः ॥ २४ ॥
भरतश्रेष्ठ! महाराज! भगवान् श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर उस बालकमें चेतना आ गयी।
वह धीरे-धीरे अंग-संचालन करने लगा ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि परिक्षित्संजीवने
एकोनसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ६९ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें परिक्षित्को
जीवनदानविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६९ ॥
सप्ततितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णद्वारा राजा परिक्षित्का नामकरण तथा पाण्डवोंका
हस्तिनापुरके समीप आगमन
वैशम्पायन उवाच
ब्रह्मास्त्रं तु यदा राजन् कृष्णेन प्रतिसंहृतम् ।
तदा तद् वेश्म त्वत्पित्रा तेजसाभिविदीपितम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजन्! भगवान् श्रीकृष्णने जब ब्रह्मास्त्रको शान्त कर
दिया, उस समय वह सूतिकागृह तुम्हारे पिताके तेजसे देदीप्यमान होने लगा ॥ १ ॥
ततो रक्षांसि सर्वाणि नेशुस्त्यक्त्वा गृहं तु तत् ।
अन्तरिक्षे च वागासीत् साधु केशव साध्विति ॥ २ ॥
फिर तो बालकोंका विनाश करनेवाले समस्त राक्षस उस घरको छोड़कर भाग गये।
इसी समय आकाशवाणी हुई—'केशव! तुम्हें साधुवाद! तुमने बहुत अच्छा कार्य
किया' ॥ २ ॥
तदस्त्रं ज्वलितं चापि पितामहमगात् तदा ।
ततः प्राणान् पुनर्लेभे पिता तव नरेश्वर ॥ ३ ॥
साथ ही वह प्रज्वलित ब्रह्मास्त्र ब्रह्मलोकको चला गया। नरेश्वर! इस तरह तुम्हारे
पिताको पुनर्जीवन प्राप्त हुआ ॥ ३ ॥
व्यचेष्टत च बालोऽसौ यथोत्साहं यथाबलम् ।
बभूवुर्मुदिता राजंस्ततस्ता भरतस्त्रियः ॥ ४ ॥
राजन्! उत्तराका वह बालक अपने उत्साह और बलके अनुसार हाथ-पैर हिलाने लगा,
यह देख भरतवंशकी उन सभी स्त्रियोंको बड़ी प्रसन्नता हुई ॥ ४ ॥
ब्राह्मणान् वाचयामासुर्गोविन्दस्यैव शासनात् ।
ततस्ता मुदिताः सर्वाः प्रशंसुर्जनार्दनम् ॥ ५ ॥
उन्होंने भगवान् श्रीकृष्णकी आज्ञासे ब्राह्मणोंद्वारा स्वस्तिवाचन कराया। फिर वे सब
आनन्दमग्न होकर श्रीकृष्णके गुण गाने लगीं ॥ ५ ॥
स्त्रियो भरतसिंहानां नावं लब्ध्वेव पारगाः ।
कुन्ती द्रुपदपुत्री च सुभद्रा चोत्तरा तथा ॥ ६ ॥
स्त्रियश्चान्या नृसिंहानां बभूवुर्हृष्टमानसाः ।
जैसे नदीके पार जानेवाले मनुष्योंको नाव पाकर बड़ी खुशी होती है, उसी प्रकार
भरतवंशी वीरोंकी वे स्त्रियाँ—कुन्ती, द्रौपदी, सुभद्रा, उत्तरा एवं नरवीरोंकी स्त्रियाँ उस
बालकके जीवित होनेसे मन-ही-मन बहुत प्रसन्न हुईं ।। ६१ १/२ ।।
तत्र मल्ला नटाश्चैव ग्रन्थिकाः सौख्यशायिकाः ।। ७ ।।
सूतमागधसंघाश्चाप्यस्तुवंस्तं जनार्दनम् ।
कुरुवंशस्तवख्याभिराशीर्भिर्भरतर्षभ ।। ८ ।।
भरतश्रेष्ठ! तदनन्तर मल्ल, नट, ज्योतिषी, सुखका समाचार पूछनेवाले सेवक तथा
सूतों और मागधोंके समुदाय कुरुवंशकी स्तुति और आशीर्वादके साथ भगवान् श्रीकृष्णका
गुणगान करने लगे ।। ७-८ ।।
उत्थाय तु यथाकालमुत्तरा यदुनन्दनम् ।
अभ्यवादयत प्रीता सह पुत्रेण भारत ।। ९ ।।
भरतनन्दन! फिर प्रसन्न हुई उत्तरा यथासमय उठकर पुत्रको गोदमें लिये हुए यदुनन्दन
श्रीकृष्णके समीप आयी और उन्हें प्रणाम किया ।। ९ ।।
तस्य कृष्णो ददौ हृष्टो बहुरत्नं विशेषतः ।
तथान्ये वृष्णिशार्दूला नाम चास्याकरोत् प्रभुः ।। १० ।।
पितुस्तव महाराज सत्यसंधो जनार्दनः ।
भगवान् श्रीकृष्णने भी प्रसन्न होकर उस बालकको बहुत-से रत्न उपहारमें दिये। फिर
अन्य यदुवंशियोंने भी नाना प्रकारकी वस्तुएँ भेंट कीं। महाराज! इसके बाद सत्यप्रतिज्ञ
भगवान् श्रीकृष्णने तुम्हारे पिताका इस प्रकार नामकरण किया ।। १० १/२ ।।
परिक्षीणे कुले यस्माज्जातोऽयमभिमन्युजः ।। ११ ।।
परिक्षिदिति नामास्य भवत्वित्यब्रवीत् तदा ।
'कुरुकुलके परिक्षीण हो जानेपर यह अभिमन्युका बालक उत्पन्न हुआ है। इसलिये
इसका नाम परिक्षित् होना चाहिये।' ऐसा भगवान्ने कहा ।। ११ १/२ ।।
सोऽवर्धत यथाकालं पिता तव जनाधिप ।। १२ ।।
मनःप्रह्लादनश्चासीत् सर्वलोकस्य भारत ।
नरेश्वर! इस प्रकार नामकरण हो जानेके बाद तुम्हारे पिता परिक्षित् कालक्रमसे बड़े
होने लगे। भारत! वे सब लोगोंके मनको आनन्दमग्न किये रहते थे ।। १२ १/२ ।।
मासजातस्तु ते वीर पिता भवति भारत ।। १३ ।।
अथाजग्मुः सुबहुलं रत्नमादाय पाण्डवाः ।
वीर भरतनन्दन! जब तुम्हारे पिताकी अवस्था एक महीनेकी हो गयी, उस समय
पाण्डवलोग बहुत-सी रत्नराशि लेकर हस्तिनापुरको लौटे ।। १३ १/२ ।।
तान् समीपगतान् श्रुत्वा निर्ययुर्वृष्णिपुङ्गवाः ।। १४ ।।
वृष्णिवंशके प्रमुख वीरोंने जब सुना कि पाण्डव लोग नगरके समीप आ गये हैं, तब वे
उनकी अगवानीके लिये बाहर निकले ।। १४ ।।
अलंचक्रुश्च माल्यौघैः पुरुषा नागसाह्वयम् ।
पताकाभिर्विचित्राभिर्ध्वजैश्च विविधैरपि ।। १५ ।।
पुरवासी मनुष्योंने फूलोंकी मालाओं, वन्दनवारों, भाँति-भाँतिकी ध्वजाओं तथा
विचित्र-विचित्र पताकाओंसे हस्तिनापुरको सजाया था ।। १५ ।।
वेश्मानि समलंचक्रुः पौराश्चापि जनेश्वर ।
देवतायतनानां च पूजाः सुविविधास्तथा ।। १६ ।।
संदिदेशाथ विदुरः पाण्डुपुत्रप्रियेप्सया ।
राजमार्गाश्च तत्रासन् सुमनोभिरलंकृताः ।। १७ ।।
नरेश्वर! नागरिकोंने अपने-अपने घरोंकी भी सजावट की थी। विदुरजीने पाण्डवोंका
प्रिय करनेकी इच्छासे देवमन्दिरोंमें विविध प्रकारसे पूजा करनेकी आज्ञा दी। हस्तिनापुरके
सभी राजमार्ग फूलोंसे अलंकृत किये गये थे ।। १६-१७ ।।
शुशुभे तत्पुरं चापि समुद्रौघनिभस्वनम् ।
नर्तकैश्चापि नृत्यद्भिर्गायकानां च निःस्वनैः ।। १८ ।।
नाचते हुए नर्तकों और गानेवाले गायकोंके शब्दोंसे उस नगरकी बड़ी शोभा हो रही
थी। वहाँ समुद्रकी जलराशिकी गर्जनाके समान कोलाहल हो रहा था ।। १८ ।।
आसीद् वैश्रवणस्येव निवासस्तत्पुरं तदा ।
वन्दिभिश्च नरै राजन् स्त्रीसहायैश्च सर्वशः ।। १९ ।।
तत्र तत्र विविक्तेषु समन्तादुपशोभितम् ।
पताका धूयमानाश्च समन्तान्मातरिश्वना ।। २० ।।
अदर्शयन्निव तदा कुरून् वै दक्षिणोत्तरान् ।
राजन्! उस समय वह नगर कुबेरकी अलकापुरीके समान प्रतीत होता था। वहाँ सब
ओर एकान्त स्थानोंमें स्त्रियोंसहित बंदीजन खड़े थे, जिनसे उस पुरीकी शोभा बढ़ गयी थी।
उस समय हवाके झोंकेसे नगरमें सब ओर पताकाएँ फहरा रही थीं, जो दक्षिण और उत्तर
कुरु नामक देशोंकी शोभा दिखाती थीं ।। १९-२०३/२ ।।
अघोषयंस्तदा चापि पुरुषा राजधूर्गताः ।
सर्वराष्ट्रविहारोऽद्य रत्नाभरणलक्षणः ।। २१ ।।
राज-काज सँभालनेवाले पुरुषोंने सब ओर यह घोषणा करा दी कि आज समूचे राष्ट्रमें
उत्सव मनाया जाय और सब लोग रत्नोंके आभूषण या उत्तमोत्तम गहने-कपड़े पहनकर
इस उत्सवमें सम्मिलित हों ।। २१ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि पाण्डवागमने
सप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें पाण्डवोंका
आगमनविषयक सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७० ॥