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अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

समाहृष्य तु वार्ष्णेयी वैराटीमब्रवीदिदम् ।। ३९ ।।
'यदुकुलभूषण! तत्पश्चात् ब्राह्मणोंको बहुत-सी गौएँ दान देकर कुन्तीने विराटकुमारी
उत्तरासे कहा— ।। ३९ ।।
वैराटि नेह संतापस्त्वया कार्यो ह्यनिन्दिते ।
भर्तारं प्रति सुश्रोणि गर्भस्थं रक्ष वै शिशुम् ।। ४० ।।
'अनिन्द्य गुणोंवाली विराटराजकुमारी! अब तुम्हें यहाँ पतिके लिये संताप नहीं करना
चाहिये। सुन्दरि! तुम्हारे गर्भमें जो अभिमन्युका बालक है, उसकी रक्षा करो' ।। ४० ।।
एवमुक्त्वा ततः कुन्ती विरराम महाद्युते ।
तामनुज्ञाप्य चैवेमां सुभद्रां समुपानयम् ।। ४१ ।।
'महाद्युते! ऐसा कहकर कुन्तीदेवी चुप हो गयीं। उन्हींकी आज्ञासे मैं इस सुभद्रा देवीको
साथ लाया हूँ ।। ४१ ।।
एवं स निधनं प्राप्तो दौहित्रस्तव मानद ।
संतापं त्यज दुर्धर्ष मा च शोके मनः कृथाः ।। ४२ ।।
'मानद! इस प्रकार आपका दौहित्र अभिमन्यु मृत्युको प्राप्त हुआ है। दुर्धर्ष वीर! आप
संताप छोड़ दें और मनको शोकमग्न न करें' ।। ४२ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वसुदेवसान्त्वने
एकषष्टितमोऽध्यायः ।। ६१ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें वसुदेवको
सान्त्वनाविषयक इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६१ ।।

द्विषष्टितमोऽध्यायः
वसुदेव आदि यादवोंका अभिमन्युके निमित्त श्राद्ध करना
तथा व्यासजीका उत्तरा और अर्जुनको समझाकर
युधिष्ठिरको अश्वमेधयज्ञ करनेकी आज्ञा देना
वैशम्पायन उवाच
एतच्छ्रुत्वा तु पुत्रस्य वचः शूरात्मजस्तदा ।
विहाय शोकं धर्मात्मा ददौ श्राद्धमनुत्तमम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! अपने पुत्र श्रीकृष्णकी बात सुनकर शूरपुत्र
धर्मात्मा वसुदेवजीने शोक त्याग दिया और अभिमन्युके लिये परम उत्तम श्राद्धविषयक
दान दिया ॥ १ ॥
तथैव वासुदेवश्च स्वस्त्रीयस्य महात्मनः ।
दयितस्य पितुर्नित्यमकरोदौर्ध्वदेहिकम् ॥ २ ॥
इसी प्रकार भगवान् श्रीकृष्णने भी अपने महामनस्वी भानजे अभिमन्युका, जो उनके
पिता वसुदेवजीका सदा ही परम प्रिय रहा, श्राद्धकर्म सम्पन्न किया ॥ २ ॥
षष्टिं शतसहस्राणि ब्राह्मणानां महौजसाम् ।
विधिवद् भोजयामास भोज्यं सर्वगुणान्वितम् ॥ ३ ॥
उन्होंने साठ लाख महातेजस्वी ब्राह्मणोंको विधिपूर्वक सर्वगुणसम्पन्न उत्तम अन्न
भोजन कराया ॥ ३ ॥
आच्छाद्य च महाबाहुर्धनतृष्णामपानुदत् ।
ब्राह्मणानां तदा कृष्णस्तदभूल्लोमहर्षणम् ॥ ४ ॥
महाबाहु श्रीकृष्णने उस समय ब्राह्मणोंको वस्त्र पहनाकर इतना धन दिया, जिससे
उनकी धनविषयक तृष्णा दूर हो गयी। यह एक रोमांचकारी घटना थी ॥ ४ ॥
सुवर्णं चैव गाश्चैव शयनाच्छादनानि च ।
दीयमानं तदा विप्रा वर्धतामिति चाब्रुवन् ॥ ५ ॥
ब्राह्मणलोग सुवर्ण, गौ, शय्या और वस्त्रका दान पाकर अभ्युदय होनेका आशीर्वाद देने
लगे ॥ ५ ॥
वासुदेवोऽथ दाशार्हो बलदेवः ससात्यकिः ।
अभिमन्योस्तदा श्राद्धमकुर्वन् सत्यकस्तदा ॥ ६ ॥
भगवान् श्रीकृष्ण, बलदेव, सत्यक और सात्यकिने भी उस समय अभिमन्युका श्राद्ध
किया ॥ ६ ॥

अतीव दुःखसंतप्ता न शमं चोपलेभिरे ।
तथैव पाण्डवा वीरा नगरे नागसाह्वये ॥ ७ ॥
नोपागच्छन्त वै शान्तिमभिमन्युविनाकृताः ।
वे सबके सब अत्यन्त दुःखसे संतप्त थे। उन्हें शान्ति नहीं मिलती थी। उसी प्रकार
हस्तिनापुरमें वीर पाण्डव भी अभिमन्युसे रहित होकर शान्ति नहीं पाते थे ॥ ७ १/२ ॥
सुबहूनि च राजेन्द्र दिवसानि विराटजा ॥ ८ ॥
नाभुङ्क्त पतिदुःखार्ता तदभूत् करुणं महत् ।
कुक्षिस्थ एव तस्याथ गर्भो वै सम्प्रलीयत ॥ ९ ॥
राजेन्द्र! विराटकुमारी उत्तराने पतिके दुःखसे आतुर हो बहुत दिनोंतक भोजन ही नहीं
किया। उसकी वह दशा बड़ी ही करुणाजनक थी। उसके गर्भका बालक उदरहीमें पड़ा-
पड़ा क्षीण होने लगा ॥ ८-९ ॥
आजगाम ततो व्यासो ज्ञात्वा दिव्येन चक्षुषा ।
समागम्याब्रवीद् धीमान् पृथां पृथुलोचनाम् ॥ १० ॥
उत्तरां च महातेजाः शोकः संत्यज्यतामयम् ।
भविष्यति महातेजाः पुत्रस्तव यशस्विनि ॥ ११ ॥
उसकी इस दशाको दिव्य दृष्टिसे जानकर महान् तेजस्वी बुद्धिमान् महर्षि व्यास वहाँ
आये और विशाल नेत्रोंवाली कुन्ती तथा उत्तरासे मिलकर उन्हें समझाते हुए इस प्रकार
बोले—'यशस्विनि उत्तरे! तुम यह शोक त्याग दो। तुम्हारा पुत्र महातेजस्वी
होगा ॥ १०-११ ॥

प्रभावाद् वासुदेवस्य मम व्याहरणादपि ।
पाण्डवानामयं चान्ते पालयिष्यति मेदिनीम् ॥ १२ ॥
‘भगवान् श्रीकृष्णके प्रभावसे और मेरे आशीर्वादसे वह पाण्डवोंके बाद सम्पूर्ण
पृथ्वीका पालन करेगा’ ॥ १२ ॥
धनंजयं च सम्प्रेक्ष्य धर्मराजस्य शृण्वतः ।
व्यासो वाक्यमुवाचेदं हर्षयन्निव भारत ॥ १३ ॥
भारत! तत्पश्चात् व्यासजीने धर्मराज युधिष्ठिरको सुनाते हुए अर्जुनकी ओर देखकर
उनका हर्ष बढ़ाते हुए-से कहा— ॥ १३ ॥
पौत्रस्तव महाभागो जनिष्यति महामनाः ।
पृथ्वीं सागरपर्यन्तां पालयिष्यति धर्मतः ॥ १४ ॥
तस्माच्छोकं कुरुश्रेष्ठ जहि त्वमरिकर्शन ।
विचार्यमत्र न हि ते सत्यमेतद् भविष्यति ॥ १५ ॥
‘कुरुश्रेष्ठ! तुम्हें महान् भाग्यशाली और महामनस्वी पौत्र होनेवाला है, जो समुद्रपर्यन्त
सारी पृथ्वीका धर्मतः पालन करेगा; अतः शत्रुसूदन! तुम शोक त्याग दो। इसमें कुछ विचार
करनेकी आवश्यकता नहीं है। मेरा यह कथन सत्य होगा ॥ १४-१५ ॥

यच्चापि वृष्णिवीरेण कृष्णेन कुरुनन्दन ।
पुरोक्तं तत् तथा भावि मा तेऽत्रास्तु विचारणा ॥ १६ ॥
‘कुरुनन्दन! वृष्णिवंशके वीर पुरुष भगवान् श्रीकृष्णने पहले जो कुछ कहा है, वह सब
वैसा ही होगा। इस विषयमें तुम्हें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये’ ॥ १६ ॥
विबुधानां गतो लोकानक्षयानात्मनिर्जितान् ।
न स शोच्यस्त्वया वीरो न चान्यैः कुरुभिस्तथा ॥ १७ ॥
‘वीर अभिमन्यु अपने पराक्रमसे उपार्जित किये हुए देवताओंके अक्षय लोकोंमें गया है;
अतः उसके लिये तुम्हें या अन्य कुरुवंशियोंको क्षोभ नहीं करना चाहिये’ ॥ १७ ॥
एवं पितामहेनोक्तो धर्मात्मा स धनंजयः ।
त्यक्त्वा शोकं महाराज हृष्टरूपोऽभवत् तदा ॥ १८ ॥
महाराज! अपने पितामह व्यासजीके द्वारा इस प्रकार समझाये जानेपर धर्मात्मा
अर्जुनने शोक त्यागकर संतोषका आश्रय लिया ॥ १८ ॥
पितापि तव धर्मज्ञ गर्भे तस्मिन् महामते ।
अवर्धत यथाकामं शुक्लपक्षे यथा शशी ॥ १९ ॥
धर्मज्ञ! महामते! उस समय तुम्हारे पिता परीक्षित् शुक्लपक्षके चन्द्रमाकी भाँति यथेष्ट
वृद्धि पाने लगे ॥ १९ ॥
ततः संचोदयामास व्यासो धर्मात्मजं नृपम् ।
अश्वमेधं प्रति तदा ततः सोऽन्तर्हितोऽभवत् ॥ २० ॥
तदनन्तर व्यासजीने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरको अश्वमेध यज्ञ करनेके लिये आज्ञा दी
और स्वयं वहाँसे अदृश्य हो गये ॥ २० ॥
धर्मराजोऽपि मेधावी श्रुत्वा व्यासस्य तद् वचः ।
वित्तस्यानयने तात चकार गमने मतिम् ॥ २१ ॥
तात! व्यासजीका वचन सुनकर बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरने धन लानेके लिये
हिमालयकी यात्रा करनेका विचार किया ॥ २१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि वासुदेवसान्त्वने
द्विषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६२ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें श्रीकृष्णकी
सान्त्वनाविषयक बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६२ ॥

त्रिषष्टितमोऽध्यायः
युधिष्ठिरका अपने भाइयोंके साथ परामर्श करके सबको
साथ ले धन ले आनेके लिये प्रस्थान करना
जनमेजय उवाच
श्रुत्वैतद् वचनं ब्रह्मन् व्यासेनोक्तं महात्मना ।
अश्वमेधं प्रति तदा किं भूयः प्रचकार ह ॥ १ ॥
रत्नं च यन्मरुत्तेन निहितं वसुधातले ।
तदवाप कथं चेति तन्मे ब्रूहि द्विजोत्तम ॥ २ ॥
जनमेजयने पूछा—ब्रह्मन्! महात्मा व्यासका कहा हुआ यह वचन सुनकर राजा
युधिष्ठिरने अश्वमेध यज्ञके सम्बन्धमें फिर क्या किया? राजा मरुत्तने जो रत्न पृथ्वीतलपर
रख छोड़ा था, उसे उन्होंने किस प्रकार प्राप्त किया? द्विजश्रेष्ठ! यह सब मुझे
बताइये ॥ १-२ ॥
वैशम्पायन उवाच
श्रुत्वा द्वैपायनवचो धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
भ्रातृन् सर्वान् समानाय्य काले वचनमब्रवीत् ॥ ३ ॥
अर्जुनं भीमसेनं च माद्रीपुत्रौ यमावपि ।
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! व्यासजीकी बात सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने
भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव—इन सभी भाइयोंको बुलवाकर यह समयोचित वचन
कहा— ॥ ३ १/२ ॥
श्रुतं वो वचनं वीराः सौहृदाद् यन्महात्मना ॥ ४ ॥
कुरूणां हितकामेन प्रोक्तं कृष्णेन धीमता ।
‘वीर बन्धुओ! कौरवोंके हितकी कामना रखनेवाले बुद्धिमान् महात्मा श्रीकृष्णने
सौहार्दवश जो बात कही थी, वह सब तो तुमने सुनी ही थी ॥ ४ १/२ ॥
तपोवृद्धेन महता सुहृदां भूतिमिच्छता ॥ ५ ॥
गुरुणा धर्मशीलेन व्यासेनाद्भुतकर्मणा ।
भीष्मेण च महाप्राज्ञा गोविन्देन च धीमता ॥ ६ ॥
संस्मृत्य तदहं सम्यक् कर्तुमिच्छामि पाण्डवाः ।
आयत्यां च तदात्वे च सर्वेषां तद्धि नो हितम् ॥ ७ ॥
‘सुहृदोंकी भलाई चाहनेवाले महान् तपोवृद्ध महात्मा धर्मशील गुरु व्यासने, अद्भुत
पराक्रमी भीष्मने तथा बुद्धिमान् गोविन्दने समय-समयपर जो सलाह दी है, उसे याद करके

मैं उनके आदेशका भलीभाँति पालन करना चाहता हूँ। महाप्राज्ञ पाण्डवो! उन
महात्माओंका यह वचन भविष्य और वर्तमानमें भी हम सबके लिये हितकारक है ॥ ५—
७॥
अनुबन्धे च कल्याणं यद् वचो ब्रह्मवादिनः ।
इयं हि वसुधा सर्वा क्षीणरत्ना कुरूद्वहाः ॥ ८ ॥
तच्चाचष्ट तदा व्यासो मरुत्तस्य धनं नृपाः ।
'ब्रह्मवादी महात्मा व्यासजीका वचन परिणाममें हमारा कल्याण करनेवाला है।
कौरवो! इस समय इस सारी पृथिवीपर रत्न एवं धनका नाश हो गया है; अतः हमारी आर्थिक
कठिनाई दूर करनेके लिये व्यासजीने उस दिन हमें मरुत्तके धनका पता बताया था ॥ ८ १/२
॥
यद्येतद् वो बहुमतं मन्यध्वं वा क्षमं यदि ॥ ९ ॥
तथा यथाऽऽह धर्मेण कथं वा भीम मन्यसे ।
'यदि तुमलोग उस धनको पर्याप्त समझो और उसे ले आनेकी अपनेमें सामर्थ्य देखो
तो व्यासजीने जैसा कहा है, उसीके अनुसार धर्मतः उसे प्राप्त करनेका यत्न करो। अथवा
भीमसेन! तुम बोलो, तुम्हारा इस सम्बन्धमें क्या विचार है?' ॥ ९ १/२ ॥
इत्युक्तवाक्ये नृपतौ तदा कुरुकुलोद्वह ॥ १० ॥
भीमसेनो नृपश्रेष्ठं प्राञ्जलिर्वाक्यमब्रवीत् ।
रोचते मे महाबाहो यदिदं भाषितं त्वया ॥ ११ ॥
व्यासाख्यातस्य वित्तस्य समुपानयनं प्रति ।
कुरुकुलशिरोमणे! राजा युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर भीमसेनने हाथ जोड़कर उन
नृपश्रेष्ठसे इस प्रकार कहा—'महाबाहो! आपने जो कुछ कहा है, व्यासजीके बताये हुए
धनको लानेके विषयमें जो विचार व्यक्त किया है, वह मुझे बहुत पसंद है ॥ १०-११ १/२ ॥
यदि तत् प्राप्नुयामेह धनमाविक्षितं प्रभो ॥ १२ ॥
कृतमेव महाराज भवेदिति मतिर्मम ।
'प्रभो! महाराज! यदि हमें मरुत्तका धन प्राप्त हो जाय तब तो हमारा सारा काम बन
ही जाय। यही मेरा मत है ॥ १२ १/२ ॥
ते वयं प्रणिपातेन गिरीशस्य महात्मनः ॥ १३ ॥
तदानयाम भद्रं ते समभ्यर्च्य कपर्दिनम् ।
'आपका कल्याण हो। हम महात्मा गिरीशके चरणोंमें प्रणाम करके उन जटाजूटधारी
महेश्वरकी सम्यक् आराधना करके उस धनको ले आवें ॥ १३ १/२ ॥
तद् वित्तं देवदेवेशं तस्यैवानुचरांश्च तान् ॥ १४ ॥
प्रसाद्यार्थमवाप्स्यामो नूनं वाग्बुद्धि कर्मभिः ।

'हम बुद्धि, वाणी और क्रियाद्वारा आराधनापूर्वक देवाधिदेव महादेव तथा उनके
अनुचरोंको प्रसन्न करके निश्चय ही उस धनको प्राप्त कर लेंगे ।। १४ १/२ ।।
रक्षन्ते ये च तद् द्रव्यं किन्नरा रौद्रदर्शनाः ।। १५ ।।
ते च वश्या भविष्यन्ति प्रसन्ने वृषभध्वजे ।
'जो रौद्ररूपधारी किन्नर उस धनकी रक्षा करते हैं, वे भी भगवान् शंकरके प्रसन्न
होनेपर हमारे अधीन हो जायेंगे ।। १५ १/२ ।।
(स हि देवः प्रसन्नात्मा भक्तानां परमेश्वरः ।
ददात्यमरतां चापि किं पुनः काञ्चनं प्रभुः ।।
'सदा प्रसन्नचित्त रहनेवाले वे सर्वसमर्थ परमेश्वर महादेव अपने भक्तोंको अमरत्व भी दे
देते हैं; फिर सुवर्णकी तो बात ही क्या? ।।
वनस्थस्य पुरा जिष्णोरस्त्रं पाशुपतं महत् ।
रौद्रं ब्रह्मशिरश्चादात् प्रसन्नः किं पुनर्धनम् ।।
'पूर्वकालमें वनमें रहते समय अर्जुनपर प्रसन्न होकर भगवान् शंकरने उन्हें महान्
पाशुपतास्त्र, रौद्रास्त्र तथा ब्रह्मास्त्र भी प्रदान किये थे। फिर धन दे देना उनके लिये कौन
बड़ी बात है ।।
वयं सर्वे च तद्भक्ताः स चास्माकं प्रसीदति ।
तत्प्रसादाद् वयं राज्यं प्राप्ताः कौरवनन्दन ।।
अभिमन्योर्वधे वृत्ते प्रतिज्ञाते धनंजये ।
जयद्रथवधार्थाय स्वप्ने लोकगुरुं निशि ।।
प्रसाद्य लब्धवानस्त्रमर्जुनः सहकेशवः ।
'कौरवनन्दन! हम सब लोग उनके भक्त हैं और वे हम लोगोंपर प्रसन्न रहते हैं। उन्हींकी
कृपासे हमने राज्य प्राप्त किया है। अभिमन्युका वध हो जानेपर जब अर्जुनने जयद्रथको
मारनेकी प्रतिज्ञा की थी, उस समय स्वप्नमें अर्जुनने श्रीकृष्णके साथ रहकर रातमें उन्हीं
लोकगुरु महेश्वरको प्रसन्न करके दिव्यास्त्र प्राप्त किया था ।।
ततः प्रभातां रजनीं फाल्गुनस्याग्रतः प्रभुः ।।
जघान सैन्यं शूलेन प्रत्यक्षं सव्यसाचिनः ।
'तदनन्तर जब रात बीती और प्रातःकाल हुआ, तब भगवान् शिवने अर्जुनके आगे
रहकर अपने त्रिशूलसे शत्रुओंकी सेनाका संहार किया था। यह बात अर्जुनने प्रत्यक्ष देखी
थी ।।
कस्तां सेनां महाराज मनसापि प्रधर्षयेत् ।।
द्रोणकर्णमुख्यैर्युक्तां महेष्वासैः प्रहारिभिः ।
ऋते देवान्महेष्वासाद् बहुरूपान्महेश्वरात् ।।

‘महाराज! द्रोणाचार्य और कर्ण-जैसे प्रहारकुशल महाधनुर्धरोंसे युक्त उस
कौरवसेनाको महान् पाशुपतधारी अनेक रूपवाले महेश्वर महादेवके सिवा दूसरा कौन
मनसे भी पराजित कर सकता था ।।
तस्यैव च प्रसादेन निहताः शत्रवस्तव ।
अश्वमेधस्य संसिद्धिं स तु सम्पादयिष्यति ॥)
‘उन्हींके कृपाप्रसादसे आपके शत्रु मारे गये हैं। वे ही अश्वमेध यज्ञको सफलतापूर्वक
सम्पन्न करेंगे’ ।।
श्रुत्वैवं वदतस्तस्य वाक्यं भीमस्य भारत ।। १६ ।।
प्रीतो धर्मात्मजो राजा बभूवातीव भारत ।
अर्जुनप्रमुखाश्चापि तथेत्येवाब्रुवन् वचः ।। १७ ।।
भारत! भीमसेनका यह कथन सुनकर धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर बहुत प्रसन्न हुए। अर्जुन
आदिने भी बहुत ठीक कहकर उन्हींकी बातका समर्थन किया ।। १६-१७ ।।
कृत्वा तु पाण्डवाः सर्वे रत्नाहरणनिश्चयम् ।
सेनामाज्ञापयामासुर्नक्षत्रेऽहनि च ध्रुवे ।। १८ ।।
इस प्रकार समस्त पाण्डवोंने रत्न लानेका निश्चय करके ध्रुवसंज्ञक* नक्षत्र एवं दिनमें
सेनाको यात्राके लिये तैयार होनेकी आज्ञा दी ।। १८ ।।
ततो ययुः पाण्डुसुता ब्राह्मणान् स्वस्ति वाच्य च ।
अर्चयित्वा सुरश्रेष्ठं पूर्वमेव महेश्वरम् ।। १९ ।।
मोदकैः पायसेनाथ मांसापूपैस्तथैव च ।
आशास्य च महात्मानं प्रययुर्मुदिता भृशम् ।। २० ।।
तदनन्तर ब्राह्मणोंसे स्वस्तिवाचन कराकर सुरश्रेष्ठ महेश्वरकी पहले ही पूजा करके
मिष्टान्न, खीर, पूआ तथा मांसापूपोंसे उन महेश्वरकी पूजा करके उनका आशीर्वाद ले
समस्त पाण्डवोंने अत्यन्त प्रसन्नतापूर्वक यात्रा प्रारम्भ की ।। १९-२० ।।
तेषां प्रयास्यतां तत्र मङ्गलानि शुभान्यथ ।
प्राहुः प्रहृष्टमनसो द्विजाग्र्या नागराश्च ते ।। २१ ।।
जब वे यात्राके लिये उद्यत हुए, उस समय समस्त श्रेष्ठ ब्राह्मणों और नागरिकोंने
प्रसन्नचित्त होकर उनके लिये शुभ मंगल-पाठ किया ।। २१ ।।
ततः प्रदक्षिणीकृत्य शिरोभिः प्रणिपत्य च ।
ब्राह्मणानग्निसहितान् प्रययुः पाण्डुनन्दनाः ।। २२ ।।
तत्पश्चात् पाण्डवोंने अग्निसहित ब्राह्मणोंकी परिक्रमा करके उनके चरणोंमें मस्तक
झुकाकर वहाँसे प्रस्थान किया ।। २२ ।।
समनुज्ञाप्य राजानं पुत्रशोकसमाहतम् ।
धृतराष्ट्रं सभार्यं वै पृथां च पृथुलोचनाम् ।। २३ ।।

प्रस्थानके पूर्व उन्होंने पुत्रशोकसे व्याकुल राजा धृतराष्ट्र, गान्धारी देवी तथा
विशाललोचना कुन्तीसे आज्ञा ले ली थी ॥ २३ ॥
मूले निक्षिप्य कौरव्यं युयुत्सुं धृतराष्ट्रजम् ।
सम्पूज्यमानाः पौरैश्च ब्राह्मणैश्च मनीषिभिः ॥ २४ ॥
(प्रययुः पाण्डवा वीरा नियमस्थाः शुचिव्रताः ।)
अपने कुलके मूलभूत धृतराष्ट्र, गान्धारी और कुन्तीके समीप उनकी रक्षाके लिये
कुरुवंशी धृतराष्ट्रपुत्र युयुत्सुको नियुक्त करके मनीषी ब्राह्मणों और पुरवासियोंसे पूजित होते
हुए वीर पाण्डवोंने वहाँसे प्रस्थान किया। वे सब-के-सब उत्तम व्रतका पालन करते हुए
शौच, संतोष आदि नियमोंमें दृढ़तापूर्वक स्थित थे ॥ २४ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि द्रव्यानयनोपक्रमे
त्रिषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६३ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें द्रव्य लानेका
उपक्रमविषयक तिरसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६३ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके ८ १/२ श्लोक मिलाकर कुल ३२ १/२ श्लोक हैं)

चतुःषष्टितमोऽध्यायः
पाण्डवोंका हिमालयपर पहुँचकर वहाँ पड़ाव डालना और
रातमें उपवासपूर्वक निवास करना
वैशम्पायन उवाच
ततस्ते प्रययुर्हृष्टाः प्रहृष्टनरवाहनाः ।
रथघोषेण महता पूरयन्तो वसुंधराम् ॥ १ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! पाण्डवोंके साथ जो मनुष्य और वाहन थे, वे
सब-के-सब बड़े हर्षमें भरे हुए थे। वे स्वयं भी अपने रथके महान् घोषसे इस पृथ्वीको
गुँजाते हुए प्रसन्नतापूर्वक यात्रा कर रहे थे ॥ १ ॥
संस्तूयमानाः स्तुतिभिः सूतमागधवन्दिभिः ।
स्वेन सैन्येन संवीता यथादित्याः स्वरश्मिभिः ॥ २ ॥
सूत, मागध और वन्दीजन अनेक प्रकारके प्रशंसासूचक वचनोंद्वारा उनके गुण गाते
चलते थे। अपनी सेनासे घिरे हुए पाण्डव ऐसे जान पड़ते थे, मानो अपनी किरणमालाओंसे
मण्डित सूर्य प्रकाशित हो रहे हों ॥ २ ॥
पाण्डुरेणातपत्रेण ध्रियमाणेन मूर्धनि ।
बभौ युधिष्ठिरस्तत्र पौर्णमास्यामिवोडुराट् ॥ ३ ॥
राजा युधिष्ठिरके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिससे वे वहाँ पूर्णमासीके
चन्द्रमाके समान शोभा पा रहे थे ॥ ३ ॥
जयाशिषः प्रहृष्टानां नराणां पथि पाण्डवः ।
प्रत्यगृह्णाद् यथान्यायं यथावत् पुरुषर्षभः ॥ ४ ॥
मार्गमें बहुत-से मनुष्य प्रसन्न होकर राजा युधिष्ठिरको विजयसूचक आशीर्वाद देते थे
और वे पुरुषशिरोमणि नरेश यथोचितरूपसे सिर झुकाकर उन यथार्थ वचनोंको ग्रहण करते
थे ॥ ४ ॥
तथैव सैनिका राजन् राजानमनुयान्ति ये ।
तेषां हलहलाशब्दो दिवं स्तब्ध्वा व्यतिष्ठत ॥ ५ ॥
राजन्! राजा युधिष्ठिरके पीछे-पीछे जो बहुत-से सैनिक चल रहे थे, उनका महान्
कोलाहल आकाशको स्तब्ध करके गूँज उठता था ॥ ५ ॥
सरांसि सरितश्चैव वनान्युपवनानि च ।
अत्यक्रामन्महाराजो गिरिं चाप्यन्वपद्यत ॥ ६ ॥
तस्मिन् देशे च राजेन्द्र यत्र तद् द्रव्यमुत्तमम् ।

राजन्! अनेकानेक सरोवरों, सरिताओं, वनों, उपवनों तथा पर्वतको लाँघकर महाराज
युधिष्ठिर उस स्थानमें जा पहुँचे, जहाँ वह (राजा मरुत्तका रखा हुआ) उत्तम द्रव्य संचित
था ।। ६ १/२ ।।
चक्रे निवेशनं राजा पाण्डवः सह सैनिकैः ।
शिवे देशे समे चैव तदा भरतसत्तम ।। ७ ।।
अग्रतो ब्राह्मणान् कृत्वा तपोविद्यादमान्वितान् ।
पुरोहितं च कौरव्य वेदवेदाङ्गपारगम् ।
आग्निवेश्यं च राजानो ब्राह्मणाः सपुरोधसः ।। ८ ।।
कृत्वा शान्तिं यथान्यायं सर्वशः पर्यवारयन् ।
कृत्वा तु मध्ये राजानममात्यांश्च यथाविधि ।। ९ ।।
कुरुवंशी भरतश्रेष्ठ! वहाँ एक समतल एवं सुखद स्थानमें पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने
तप, विद्या और इन्द्रिय-संयमसे युक्त ब्राह्मणों एवं वेद-वेदांगके पारगामी विद्वान्
राजपुरोहित धौम्य मुनिको आगे रखकर सैनिकोंके साथ पड़ाव डाला। बहुत-से राजा,
ब्राह्मण और पुरोहितने यथोचित रीतिसे शान्तिकर्म करके युधिष्ठिर और उनके मन्त्रियोंको
विधिपूर्वक बीचमें रखकर उन्हें सब ओरसे घेर रखा था ।। ७—९ ।।
षट्पदं नवसंख्यानं निवेशं चक्रिरे द्विजाः ।
मत्तानां वारणेन्द्राणां निवेशं च यथाविधि ।। १० ।।
कारयित्वा स राजेन्द्रो ब्राह्मणानिदमब्रवीत् ।
ब्राह्मणोंने जो छावनी वहाँ बनायी थी, उसमें पूर्वसे पश्चिमको और उत्तरसे दक्षिणको
जानेवाली तीन-तीनके क्रमसे कुल छः सड़कें थीं तथा उस छावनीके नौ खण्ड थे। महाराज
युधिष्ठिरने मतवाले गजराजोंके रहनेके लिये भी स्थानका विधिवत् निर्माण कराकर
ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा— ।। १० १/२ ।।
अस्मिन् कार्ये द्विजश्रेष्ठा नक्षत्रे दिवसे शुभे ।। ११ ।।
यथा भवन्तो मन्यन्ते कर्तुमर्हन्ति तत् तथा ।
न नः कालात्ययो वै स्यादिहैव परिलम्बताम् ।। १२ ।।
इति निश्चित्य विप्रेन्द्राः क्रियतां यदनन्तरम् ।
‘विप्रवरो! किसी शुभ नक्षत्र और शुभ दिनको इस कार्यकी सिद्धिके लिये आपलोग जो
भी ठीक समझें, वह उपाय करें। ऐसा न हो कि यहीं लटके रहकर हमारा बहुत अधिक
समय व्यतीत हो जाय। द्विजेन्द्रगण! इस विषयमें कुछ निश्चय करके इस समय जो करना
उचित हो, उसे आप लोग अविलम्ब करें’ ।। ११-१२ १/२ ।।
श्रुत्वैतद् वचनं राज्ञो ब्राह्मणाः सपुरोधसः ।
इदमूचुर्वचो हृष्टा धर्मराजप्रियेप्सवः ।। १३ ।।

धर्मराज राजा युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर उनका प्रिय करनेकी इच्छावाले ब्राह्मण
और पुरोहित प्रसन्नतापूर्वक इस प्रकार बोले— ॥ १३ ॥
अद्यैव नक्षत्रमहश्च पुण्यं
यतामहे श्रेष्ठतमक्रियासु ।
अम्भोभिरद्येह वसाम राज-
न्नुपोष्यतां चापि भवद्भिरद्य ॥ १४ ॥
'राजन्! आज ही परम पवित्र नक्षत्र और शुभ दिन है; अतः आज ही हम श्रेष्ठतम कर्म
करनेका प्रयत्न आरम्भ करते हैं। हमलोग तो आज केवल जल पीकर रहेंगे और
आपलोगोंको भी आज उपवास करना चाहिये' ॥ १४ ॥
श्रुत्वा तु तेषां द्विजसत्तमानां
कृतोपवासा रजनीं नरेन्द्राः ।
ऊषुः प्रतीताः कुशसंस्तरेषु
यथाध्वरे प्रज्वलिता हुताशाः ॥ १५ ॥
उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंका यह वचन सुनकर समस्त पाण्डव रातमें उपवास करके कुशकी
चटाइयोंपर निर्भय होकर सोये। वे ऐसे जान पड़ते थे, मानो यज्ञमण्डपमें पाँच वेदियोंपर
स्थापित पाँच अग्नि प्रज्वलित हो रहे हों ॥ १५ ॥
ततो निशा सा व्यगमन्महात्मनां
संशृण्वतां विप्रसमीरिता गिरः ।
ततः प्रभाते विमले द्विजर्षभा
वचोऽब्रुवन् धर्मसुतं नराधिपम् ॥ १६ ॥
तदनन्तर ब्राह्मणोंकी कही हुई बातें सुनते हुए महात्मा पाण्डवोंकी वह रात सकुशल
व्यतीत हुई। फिर निर्मल प्रभातका उदय होनेपर उन श्रेष्ठ ब्राह्मणोंने धर्मनन्दन राजा
युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा ॥ १६ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापरवनि द्रव्यानयनोपक्रमे
चतुःषष्टितमोऽध्यायः ॥ ६४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्र्वमें द्रव्य लानेका
उपक्रमविषयक चौंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ६४ ॥

  • ज्योतिष शास्त्रके अनुसार तीनों उत्तरा तथा रोहिणी—ये ध्रुवसंज्ञक नक्षत्र हैं। दिनोंमें रविवारको ध्रुव बताया गया है।
    उत्तरा और रविवारका संयोग होनेपर अमृतसिद्धि नामक योग होता है; अतः इसी योगमें पाण्डवोंके प्रस्थान करनेका
    अनुमान किया जा सकता है।

४. अध्वर्यु-यति संवाद, कार्तवीर्य-समुद्र संवाद व सांख्य-ज्ञान

पञ्चषष्टितमोऽध्यायः
ब्राह्मणोंकी आज्ञासे भगवान् शिव और उनके पार्षद
आदिकी पूजा करके युधिष्ठिरका उस धनराशिको
खुदवाकर अपने साथ ले जाना
ब्राह्मण ऊचुः
क्रियतामुपहारोऽद्य त्र्यम्बकस्य महात्मनः ।
दत्त्वोपहारं नृपते ततः स्वार्थं यतामहे ॥ १ ॥
**ब्राह्मण बोले—**नरेश्वर! अब आप परमात्मा भगवान् शंकरको पूजा चढ़ाइये। पूजा
चढ़ानेके बाद हमें अपने अभीष्ट कार्यकी सिद्धिके लिये प्रयत्न करना चाहिये ॥ १ ॥
श्रुत्वा तु वचनं तेषां ब्राह्मणानां युधिष्ठिरः ।
गिरीशस्य यथान्यायमुपहारमुपाहरत् ॥ २ ॥
उन ब्राह्मणोंकी बात सुनकर राजा युधिष्ठिरने भगवान् शंकरको विधिपूर्वक नैवेद्य
अर्पण किया ॥ २ ॥
आज्येन तर्पयित्वाग्निं विधिवत् संस्कृतेन च ।
मन्त्रसिद्धं चरुं कृत्वा पुरोधाः स ययौ तदा ॥ ३ ॥
तत्पश्चात् उनके पुरोहितने विधिपूर्वक संस्कार किये हुए घृतके द्वारा अग्निदेवको तृप्त
करके मन्त्रसिद्ध चरु तैयार किया और भेंट अर्पित करनेके लिये वे देवताके समीप
गये ॥ ३ ॥
स गृहीत्वा सुमनसो मन्त्रपूता जनाधिप ।
मोदकैः पायसेनाथ मांसैश्चोपाहरद् बलिम् ॥ ४ ॥
सुमनोभिश्च चित्राभिर्लाजैरूच्चावचैरपि ।
जनेश्वर! उन्होंने मन्त्रपूत पुष्प लेकर मिठाई, खीर, फलके गूदे, विचित्र पुष्प, लावा
(खील) तथा अन्य नाना प्रकारकी वस्तुओंद्वारा उपहार समर्पित किया ॥ ४ ½ ॥
सर्वं स्विष्टमं कृत्वा विधिवद् वेदपारगः ॥ ५ ॥
किंकराणां ततः पश्चाच्चकार बलिमुत्तमम् ।
वेदोंके पारंगत विद्वान् पुरोहितने विधिपूर्वक देवताको अत्यन्त प्रिय लगनेवाले समस्त
कर्म करके फिर भगवान् शिवके पार्षदोंको उत्तम बलि (भेंट-पूजा) चढ़ायी ॥ ५ ½ ॥
यक्षेन्द्राय कुबेराय मणिभद्राय चैव ह ॥ ६ ॥
तथान्येषां च यक्षाणां भूतानां पतयश्च ये ।
कृसरेण च मांसेन निवापैस्तिलसंयुतैः ॥ ७ ॥

इसके बाद यक्षराज कुबेरको, मणिभद्रको, अन्यान्य यक्षोंको और भूतोंके
अधिपतियोंको खिचड़ी, फलके गूदे तथा तिलमिश्रित जलकी अंजलियाँ निवेदन करके
उनकी पूजा सम्पन्न की ।। ६-७ ।।
ओदनं कुम्भशः कृत्वा पुरोधाः समुपाहरत् ।
ब्राह्मणेभ्यः सहस्राणि गवां दत्त्वा तु भूमिपः ।। ८ ।।
नक्तंचराणां भूतानां व्यादिदेश बलिं तदा ।
तदनन्तर पुरोहितने घड़ोंमें भात भरकर बलि अर्पित की। इसके बाद भूपालने
ब्राह्मणोंको सहस्रों गौएँ देकर निशाचारी भूतोंको भी बलि भेंट की ।। ८ ½ ।।
धूपगन्धनिरुद्धं तत् सुमनोभिश्च संवृतम् ।। ९ ।।
शुशुभे स्थानमत्यर्थं देवदेवस्य पार्थिव ।
पृथ्वीनाथ! देवाधिदेव महादेवजीका वह स्थान धूपोंकी सुगन्धसे व्याप्त और फूलोंसे
अलंकृत होनेके कारण बड़ी शोभा पा रहा था ।। ९ ½ ।।
कृत्वा पूजां तु रुद्रस्य गणानां चैव सर्वशः ।। १० ।।
ययौ व्यासं पुरस्कृत्य नृपो रत्ननिधिं प्रति ।
भगवान् शिव और उनके पार्षदोंकी सब प्रकारसे पूजा करके महर्षि व्यासको आगे
किये राजा युधिष्ठिर उस स्थानको गये, जहाँ वह रत्न एवं सुवर्णकी राशि संचित थी ।। १०
½ ।।
पूजयित्वा धनाध्यक्षं प्रणिपत्याभिवाद्य च ।। ११ ।।
सुमनोभिर्विचित्राभिरपूपैः कृसरेण च ।
शङ्खादींश्च निधीन् सर्वान् निधिपालांश्च सर्वशः ।। १२ ।।
अर्चयित्वा द्विजाग्र्यान् स स्वस्ति वाच्य च वीर्यवान् ।
तेषां पुण्याहघोषेण तेजसा समवस्थितः ।। १३ ।।
प्रीतिमान् स कुरुश्रेष्ठः खानयामास तद् धनम् ।
वहाँ उन्होंने नाना प्रकारके विचित्र फूल, मालपूआ तथा खिचड़ी आदिके द्वारा धनपति
कुबेरकी पूजा करके उन्हें प्रणाम—अभिवादन किया। तत्पश्चात् उन्हीं सामग्रियोंसे शंख
आदि निधियों तथा समस्त निधिपालोंका पूजन करके श्रेष्ठ ब्राह्मणोंकी पूजा की। फिर उनसे
स्वस्तिवाचन कराकर उन ब्राह्मणोंके पुण्याहघोषसे तेजस्वी हुए शक्तिशाली कुरुश्रेष्ठ राजा
युधिष्ठिर बड़ी प्रसन्नताके साथ उस धनको खुदवाने लगे ।। ११—१३ ½ ।।
ततः पात्रीः सकरका बहुरूपा मनोरमाः ।। १४ ।।
भृङ्गाराणि कटाहानि कलशान् वर्धमानकान् ।
बहूनि च विचित्राणि भाजनानि सहस्रशः ।। १५ ।।
कुछ ही देरमें अनेक प्रकारके विचित्र, मनोरम एवं बहुसंख्यक सहस्रों सुवर्णमय पात्र
निकल आये। कठौते, सुराही, गडुआ, कड़ाह, कलश तथा कटोरे—सभी तरहके बर्तन

उपलब्ध हुए ।। १४-१५ ।।
उद्धारयामास तदा धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
तेषां रक्षणमप्यासीन्महान् करपुटस्तथा ।। १६ ।।
धर्मराज युधिष्ठिरने उस समय उन सब बर्तनोंको भूमि खोदकर निकलवाया। उन्हें
रखनेके लिये बड़ी-बड़ी संदूकें लायी गयी थीं ।। १६ ।।
नद्धं च भाजनं राजंस्तुलाधर्मभवन्नृप ।
वाहनं पाण्डुपुत्रस्य तत्रासीत् तु विशाम्पते ।। १७ ।।
राजन्! एक-एक संदूकमें बंद किये हुए बर्तनोंका बोझ आधा-आधा भार होता था।
प्रजानाथ! उन सबको ढोनेके लिये पाण्डुपुत्र युधिष्ठिरके वाहन भी वहाँ उपस्थित
थे ।। १७ ।।
षष्टिरुष्ट्रसहस्राणि शतानि द्विगुणा हयाः ।
वारणाश्च महाराज सहस्रशतसम्मिताः ।। १८ ।।
शकटानि रथाश्चैव तावदेव करेणवः ।
खराणां पुरुषाणां च परिसंख्या न विद्यते ।। १९ ।।
महाराज! साठ हजार ऊँट, एक करोड़ बीस लाख घोड़े, एक लाख हाथी, एक लाख
रथ, एक लाख छकड़े और उतनी ही हथिनियाँ थीं। गधों और मनुष्योंकी तो गिनती ही नहीं
थी ।। १८-१९ ।।
एतद् वित्तं तदभवद् यदुद्दध्रे युधिष्ठिरः ।
षोडशाष्टौ चतुर्विंशत्सहस्रं भारलक्षणम् ।। २० ।।
एतेष्वादाय तद् द्रव्यं पुनरभ्यर्च्य पाण्डवः ।
महादेवं प्रति ययौ पुरं नागह्वयं प्रति ।। २१ ।।
द्वैपायनाभ्यनुज्ञातः पुरस्कृत्य पुरोहितम् ।
युधिष्ठिरने वहाँ जितना धन खुदवाया था, वह सोलह करोड़ आठ लाख और चौबीस
हजार भार सुवर्ण था। उन्होंने उपर्युक्त सब वाहनोंपर धन लदवाकर पाण्डुनन्दन युधिष्ठिरने
पुनः महादेवजीका पूजन किया और व्यासजीकी आज्ञा लेकर पुरोहित धौम्य मुनिको आगे
करके हस्तिनापुरको प्रस्थान किया ।। २०-२१ ½ ।।

गोयुते गोयुते चैव न्यवसत् पुरुषर्षभः ।। २२ ।।
सा पुराभिमुखा राजन्नुवाह महती चमूः ।
कृच्छ्राद् द्रविणभारार्ता हर्षयन्ती कुरुद्वहान् ।। २३ ।।
राजन्! वे वाहनोंपर बोझ अधिक होनेके कारण दो-दो कोसपर मुकाम देते जाते थे।
द्रव्यके भारसे कष्ट पाती हुई वह विशाल सेना उन कुरुश्रेष्ठ वीरोंका हर्ष बढ़ाती हुई बड़ी
कठिनाईसे नगरकी ओर उस धनको ले जा रही थी ।। २२-२३ ।।
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि द्रव्यानयने
पञ्चषष्टितमोऽध्यायः ।। ६५ ।।
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें द्रव्यका आनयनविषयक
पैंसठवाँ अध्याय पूरा हुआ ।। ६५ ।।

षट्षष्टितमोऽध्यायः
श्रीकृष्णका हस्तिनापुरमें आगमन और उत्तराके मृत
बालकको जिलानेके लिये कुन्तीकी उनसे प्रार्थना
वैशम्पायन उवाच
एतस्मिन्नेव काले तु वासुदेवोऽपि वीर्यवान् ।
उपायाद् वृष्णिभिः सार्धं पुरं वारणसाह्वयम् ।। १ ।।
वैशम्पायनजी कहते हैं—जनमेजय! इसी बीचमें परम पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण भी
वृष्णिवंशियोंको साथ लेकर हस्तिनापुर आ गये ।। १ ।।
समयं वाजिमेधस्य विदित्वा पुरुषर्षभः ।
यथोक्तो धर्मपुत्रेण प्रव्रजन् स्वपुरीं प्रति ।। २ ।।
उनके द्वारका जाते समय धर्मपुत्र युधिष्ठिरने जैसी बात कही थी, उसके अनुसार
अश्वमेध यज्ञका समय निकट जानकर पुरुषोत्तम श्रीकृष्ण पहले ही उपस्थित हो
गये ।। २ ।।
रौक्मिणेयेन सहितो युयुधानेन चैव ह ।
चारुदेष्णेन साम्बेन गदेन कृतवर्मणा ।। ३ ।।
सारणेन च वीरेण निशठोन्मुखेन च ।
उनके साथ रुक्मिणीनन्दन प्रद्युम्न, सात्यकि, चारुदेष्ण, साम्ब, गद, कृतवर्मा, सारण,
वीर निशठ और उल्मुक भी थे ।। ३ १/२ ।।
बलदेवं पुरस्कृत्य सुभद्रासहितस्तदा ।। ४ ।।
द्रौपदीमुत्तरां चैव पृथां चाप्यवलोककः ।
समाश्वासयितुं चापि क्षत्रिया निहतेश्वराः ।। ५ ।।
वे बलदेवजीको आगे करके सुभद्राके साथ पधारे थे। उनके शुभागमनका उद्देश्य था
द्रौपदी, उत्तरा और कुन्तीसे मिलना तथा जिनके पति मारे गये थे, उन सभी क्षत्राणियोंको
आश्वासन देना—धीरज बँधाना ।। ४-५ ।।
तानागतान् समीक्ष्यैव धृतराष्ट्रो महीपतिः ।
प्रत्यगृह्लाद् यथान्यायं विदुरश्च महामनाः ।। ६ ।।
उनके आगमनका समाचार सुनते ही राजा धृतराष्ट्र और महामना विदुरजी खड़े हो गये
और आगे बढ़कर उन्होंने उन सबका विधिवत् स्वागत-सत्कार किया ।। ६ ।।
तत्रैव न्यवसत् कृष्णः स्वर्चितः पुरुषोत्तमः ।
विदुरेण महातेजास्तथैव च युयुत्सुना ।। ७ ।।

विदुर और युयुत्सुसे भलीभाँति पूजित हो महातेजस्वी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्ण वहीं
रहने लगे ॥ ७ ॥
वसत्सु वृष्णिवीरेषु तत्राथ जनमेजय ।
जज्ञे तव पिता राजन् परिक्षित् परवीरहा ॥ ८ ॥
जनमेजय! उन वृष्णिवीरोंके वहाँ निवास करते समय ही तुम्हारे पिता शत्रुवीरहन्ता
परीक्षित्का जन्म हुआ था ॥ ८ ॥
स तु राजा महाराज ब्रह्मास्त्रेणावपीडितः ।
शवो बभूव निश्चेष्टो हर्षशोकविवर्धनः ॥ ९ ॥
महाराज! वे राजा परीक्षित् ब्रह्मास्त्रसे पीड़ित होनेके कारण चेष्टाहीन मुर्देके रूपमें
उत्पन्न हुए, अतः स्वजनोंका हर्ष और शोक बढ़ानेवाले हो गये थे* ॥ ९ ॥
हृष्टानां सिंहनादेन जनानां तत्र निःस्वनः ।
प्रविश्य प्रदिशः सर्वाः पुनरेव व्युपरमत् ॥ १० ॥
पहले पुत्र-जन्मका समाचार सुनकर हर्षमें भरे हुए लोगोंके सिंहनादसे एक महान्
कोलाहल सुनायी पड़ा, जो सम्पूर्ण दिशाओंमें प्रविष्ट हो पुनः शान्त हो गया ॥ १० ॥
ततः सोऽतित्वरः कृष्णो विवेशान्तःपुरं तदा ।
युयुधानद्वितीयो वै व्यथितेन्द्रियमानसः ॥ ११ ॥
इससे भगवान् श्रीकृष्णके मन और इन्द्रियोंमें व्यथा-सी उत्पन्न हो गयी। वे सात्यकिको
साथ ले बड़ी उतावलीसे अन्तःपुरमें जा पहुँचे ॥ ११ ॥
ततस्त्वरितमायान्तीं ददर्श स्वां पितृष्वसाम् ।
क्रोशन्तीमभिधावेति वासुदेवं पुनः पुनः ॥ १२ ॥
वहाँ उन्होंने अपनी बुआ कुन्तीको बड़े वेगसे आती देखा, जो बारंबार उन्हींका नाम
लेकर 'वासुदेव! दौड़ो-दौड़ो' की पुकार मचा रही थी ॥ १२ ॥
पृष्ठतो द्रौपदीं चैव सुभद्रां च यशस्विनीम् ।
सविक्रोशं सकरुणं बान्धवानां स्त्रियो नृप ॥ १३ ॥
राजन्! उनके पीछे द्रौपदी, यशस्विनी सुभद्रा तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंकी स्त्रियाँ भी
थीं, जो बड़े करुण स्वरसे बिलख-बिलखकर रो रही थीं ॥ १३ ॥
ततः कृष्णं समासाद्य कुन्तिभोजसुता तदा ।
प्रोवाच राजशार्दूल बाष्पगद्गदया गिरा ॥ १४ ॥
नृपश्रेष्ठ! उस समय श्रीकृष्णके निकट पहुँचकर कुन्तिभोजकुमारी कुन्ती नेत्रोंसे आँसू
बहाती हुई गद्गद वाणीमें बोली— ॥ १४ ॥
वासुदेव महाबाहो सुप्रजा देवकी त्वया ।
त्वं नो गतिः प्रतिष्ठा च त्वदायत्तमिदं कुलम् ॥ १५ ॥

'महाबाहु वसुदेव-नन्दन! तुम्हें पाकर ही तुम्हारी माता देवकी उत्तम पुत्रवाली मानी
जाती हैं। तुम्हीं हमारे अवलम्ब और तुम्हीं हमलोगोंके आधार हो। इस कुलकी रक्षा तुम्हारे
ही अधीन है ॥ १५ ॥
यदुप्रवीर योऽयं ते स्वस्त्रीयस्यात्मजः प्रभो ।
अश्वत्थाम्ना हतो जातस्तमुज्जीवय केशव ॥ १६ ॥
'यदुवीर! प्रभो! यह जो तुम्हारे भानजे अभिमन्युका बालक है, अश्वत्थामाके अस्त्रसे
मरा हुआ ही उत्पन्न हुआ है। केशव! इसे जीवन-दान दो ॥ १६ ॥
त्वया ह्येतत् प्रतिज्ञातमैषीके यदुनन्दन ।
अहं संजीवयिष्यामि मृतं जातमिति प्रभो ॥ १७ ॥
'यदुनन्दन! प्रभो! अश्वत्थामाने जब सींकके बाणका प्रयोग किया था, उस समय तुमने
यह प्रतिज्ञा की थी कि मैं उत्तराके मरे हुए बालकको भी जीवित कर दूँगा ॥ १७ ॥
सोऽयं जातो मृतस्तात पश्यैनं पुरुषर्षभ ।
उत्तरां च सुभद्रां च द्रौपदीं मां च माधव ॥ १८ ॥
'तात! वही यह बालक है, जो मरा हुआ ही पैदा हुआ है। पुरुषोत्तम! इसपर अपनी
कृपादृष्टि डालो। माधव! इसे जीवित करके ही उत्तरा, सुभद्रा और द्रौपदीसहित मेरी रक्षा
करो ॥ १८ ॥
धर्मपुत्रं च भीमं च फाल्गुनं नकुलं तथा ।
सहदेवं च दुर्धर्ष सर्वान् नस्त्रातुमर्हसि ॥ १९ ॥
'दुर्धर्ष वीर! धर्मपुत्र युधिष्ठिर, भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेवकी भी रक्षा करो।
तुम हम सब लोगोंका इस संकटसे उद्धार करनेयोग्य हो ॥ १९ ॥
अस्मिन् प्राणाःसमायत्ताः पाण्डवानां ममैव च ।
पाण्डोश्च पिण्डो दाशार्ह तथैव श्वशुरस्य मे ॥ २० ॥
'मेरे और पाण्डवोंके प्राण इस बालकके ही अधीन हैं। दशार्हकुलनन्दन! मेरे पति
पाण्डु तथा श्वशुर विचित्रवीर्यके पिण्डका भी यही सहारा है ॥ २० ॥
अभिमन्योश्च भद्रं ते प्रियस्य सदृशस्य च ।
प्रियमुत्पादयाद्य त्वं प्रेतस्यापि जनार्दन ॥ २१ ॥
'जनार्दन! तुम्हारा कल्याण हो। जो तुम्हें अत्यन्त प्रिय और तुम्हारे ही समान परम
सुन्दर था, उस परलोकवासी अभिमन्युका भी प्रिय करो—उसके इस बालकको जिला
दो ॥ २१ ॥
उत्तरा हि पुरोक्तं वै कथयत्यरिसूदन ।
अभिमन्योर्वचः कृष्ण प्रियत्वात् तन्न संशयः ॥ २२ ॥
'शत्रुसूदन श्रीकृष्ण! मेरी बहूरानी उत्तरा अभिमन्युकी पहलेकी कही हुई एक बात
अत्यन्त प्रिय होनेके कारण बार-बार दुहराया करती है। उस बातकी यथार्थतामें तनिक भी