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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 99, कुल 421 में से

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पृष्ठ 99

वेदविद्यां समाश्रित्य तत्त्वभूतार्थभावनम् ॥ १५ ॥
गुरु बोले—बेटा! ब्रह्माजीने वेद-विद्याका आश्रय लेकर तुम्हारे पूछे हुए इन सभी
प्रश्नोंका उत्तर पहलेसे ही दे रखा है तथा प्रधान-प्रधान ऋषियोंने उसका सदा ही सेवन
किया है। उन प्रश्नोंके उत्तरमें परमार्थविषयक विचार किया गया है ॥ १५ ॥
ज्ञानं त्वेव परं विद्मः संन्यासं तप उत्तमम् ।
यस्तु वेद निराबाधं ज्ञानतत्त्वं विनिश्चयात् ।
सर्वभूतस्थमात्मानं स सर्वगतिरिष्यते ॥ १६ ॥
हम ज्ञानको ही परब्रह्म और संन्यासको उत्तम तप जानते हैं। जो अबाधित ज्ञानतत्त्वको
निश्चयपूर्वक जानकर अपनेको सब प्राणियोंके भीतर स्थित देखता है, वह सर्वगति
(सर्वव्यापक) माना जाता है ॥ १६ ॥
यो विद्वान् सहसंवासं विवासं चैव पश्यति ।
तथैकत्वनानात्वे स दुःखात् परिमुच्यते ॥ १७ ॥
जो विद्वान् संयोग और वियोगको तथा वैसे ही एकत्व और नानात्वको एक साथ
तत्त्वतः जानता है, वह दुःखसे मुक्त हो जाता है ॥ १७ ॥
यो न कामयते किंचिन्न किंचिदभिमन्यते ।
इहलोकस्थ एवैष ब्रह्मभूयाय कल्पते ॥ १८ ॥
जो किसी वस्तुकी कामना नहीं करता तथा जिसके मनमें किसी बातका अभिमान नहीं
होता, वह इस लोकमें रहता हुआ ही ब्रह्मभावको प्राप्त हो जाता है ॥ १८ ॥
प्रधानगुणतत्त्वज्ञः सर्वभूतविधानवित् ।
निर्ममो निरहङ्कारो मुच्यते नात्र संशयः ॥ १९ ॥
जो माया और सत्त्वादि गुणोंके तत्त्वको जानता है, जिसे सब भूतोंके विधानका ज्ञान है
और जो ममता तथा अहंकारसे रहित हो गया है, वह मुक्त हो जाता है—इसमें संदेह नहीं
है ॥ १९ ॥
अव्यक्तबीजप्रभवो बुद्धिस्कन्धमयो महान् ।
महाहङ्कारविटप इन्द्रियाङ्कुरकोटरः ॥ २० ॥
महाभूतविशेषश्च विशेषप्रतिशाखवान् ।
सदापर्णः सदापुष्पः सदा शुभफलोदयः ॥ २१ ॥
अजीवः सर्वभूतानां ब्रह्मबीजः सनातनः ।
एतज्ज्ञात्वा च तत्त्वानि ज्ञानेन परमासिना ॥ २२ ॥
छित्त्वा चामरतां प्राप्य जहाति मृत्युजन्मनी ।