अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 94, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंब्राह्मणने कहा— देवि! क्षेत्रज्ञ वास्तवमें देह-सम्बन्धसे रहित और निर्गुण है; क्योंकि
उसके सगुण और साकार होनेका कोई कारण नहीं दिखायी देता। अतः मैं वह उपाय
बताता हूँ जिससे वह ग्रहण किया जा सकता है अथवा नहीं भी किया जा सकता ॥ ५ ॥
सम्यगुपायो दृष्टश्च भ्रमरैरिव लक्ष्यते ।
कर्मबुद्धिरबुद्धित्वाज्ज्ञानलिङ्गैरिवाश्रितम् ॥ ६ ॥
उस क्षेत्रका साक्षात्कार करनेके लिये पूर्ण उपाय देखा गया है। वह यह है कि उसे
देखनेकी क्रियाका त्याग कर देनेसे भौंरोंके द्वारा गन्धकी भाँति वह अपने-आप जाना जाता
है। किंतु कर्मविषयक बुद्धि वास्तवमें बुद्धि न होनेके कारण ज्ञानके सदृश प्रतीत होती है तो
भी वह ज्ञान नहीं है। (अतः क्रियाद्वारा उसका साक्षात्कार नहीं हो सकता) ॥ ६ ॥
इदं कार्यमिदं नेति न मोक्षेषूपदिश्यते ।
पश्यतः शृण्वतो बुद्धिरात्मनो येषु जायते ॥ ७ ॥
यह कर्तव्य है, यह कर्तव्य नहीं है—यह बात मोक्षके साधनोंमें नहीं कही जाती। जिन
साधनोंमें देखने और सुननेवालेकी बुद्धि आत्माके स्वरूपमें निश्चित होती है, वही यथार्थ
साधन है ॥ ७ ॥
यावन्त इह शक्येरंस्तावन्तोंऽशान् प्रकल्पयेत् ।
अव्यक्तान् व्यक्तरूपांश्च शतशोऽथ सहस्रशः ॥ ८ ॥
यहाँ जितनी कल्पनाएँ की जा सकती हैं, उतने ही सैकड़ों और हजारों अव्यक्त और
व्यक्तरूप अंशोंकी कल्पना कर लें ॥ ८ ॥
सर्वान्नार्थयुक्तांश्च सर्वान् प्रत्यक्षहेतुकान् ।
यतः परं न विद्येत ततोऽभ्यासे भविष्यति ॥ ९ ॥
वे सभी प्रत्यक्ष प्रतीत होनेवाले पदार्थ वास्तविक अर्थयुक्त नहीं हो सकते। जिससे पर
कुछ भी नहीं है, उसका साक्षात्कार तो ‘नेति-नेति’ अर्थात् यह भी नहीं, यह भी नहीं—इस
अभ्यासके अन्तमें ही होगा ॥ ९ ॥
श्रीभगवानुवाच
ततस्तु तस्या ब्राह्मण्या मतिः क्षेत्रज्ञसंक्षये ।
क्षेत्रज्ञानेन परतः क्षेत्रज्ञेभ्यः प्रवर्तते ॥ १० ॥
भगवान् श्रीकृष्णने कहा— पार्थ! उसके बाद उस ब्राह्मणीकी बुद्धि, जो क्षेत्रज्ञके
संशयसे युक्त थी, क्षेत्रके ज्ञानसे अतीत क्षेत्रज्ञोंसे युक्त हुई ॥ १० ॥
अर्जुन उवाच
क्व नु सा ब्राह्मणी कृष्ण क्व चासौ ब्राह्मणर्षभः ।
याभ्यां सिद्धिरियं प्राप्ता तावुभौ वद मेऽच्युत ॥ ११ ॥