अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंअहिंसा सर्वभूतानां नित्यमस्मासु रोचते ।
प्रत्यक्षतः साधयामो न परोक्षमुपास्महे ॥ १८ ॥
किसी भी प्राणीकी हिंसा न करना ही हमें सदा अच्छा लगता है। हम प्रत्यक्ष फलके
साधक हैं, परोक्षकी उपासना नहीं करते हैं ॥ १८ ॥
अध्वर्युरुवाच
भूमेर्गन्धगुणान् भुङ्क्षे पिबस्यापोमयान् रसान् ।
ज्योतिषां पश्यसे रूपं स्पृशस्यनिलजान् गुणान् ॥ १९ ॥
शृणोष्याकाशजान् शब्दान् मनसा मन्यसे मतिम् ।
सर्वाण्येतानि भूतानि प्राणा इति च मन्यसे ॥ २० ॥
अध्वर्युने कहा—यते! यह तो तुम मानते ही हो कि सभी भूतोंमें प्राण है, तो भी तुम
पृथ्वीके गन्ध गुणोंका उपभोग करते हो, जलमय रसोंको पीते हो, तेजके गुण? रूपका
दर्शन करते हो और वायुके गुण स्पर्शको छूते हो, आकाशजनित शब्दोंको सुनते हो और
मनसे मतिका मनन करते हो ॥ १९-२० ॥
प्राणादाने निवृत्तोऽसि हिंसायां वर्तते भवान् ।
नास्ति चेष्टा विना हिंसां किं वा त्वं मन्यसे द्विज ॥ २१ ॥
एक ओर तो तुम किसी प्राणीके प्राण लेनेके कार्यसे निवृत्त हो और दूसरी ओर हिंसामें
लगे हुए हो। द्विजवर! कोई भी चेष्टा हिंसाके बिना नहीं होती। फिर तुम कैसे समझते हो कि
तुम्हारे द्वारा अहिंसाका ही पालन हो रहा है? ॥ २१ ॥
यतिरुवाच
अक्षरं च क्षरं चैव द्वैधीभावोऽयमात्मनः ।
अक्षरं तत्र सद्भावः स्वभावः क्षर उच्यते ॥ २२ ॥
यतिने कहा—आत्माके दो रूप हैं—एक अक्षर और दूसरा क्षर। जिसकी सत्ता तीनों
कालोंमें कभी नहीं मिटती वह सत्स्वरूप अक्षर (अविनाशी) कहा गया है तथा जिसका
सर्वथा और सभी कालोंमें अभाव है, वह क्षर कहलाता है ॥ २२ ॥
प्राणो जिह्वा मनः सत्त्वं सद्भावो रजसा सह ।
भावैरेतैर्विमुक्तस्य निर्द्वन्द्वस्य निराशिषः ॥ २३ ॥
समस्य सर्वभूतेषु निर्ममस्य जितात्मनः ।
समन्तात् परिमुक्तस्य न भयं विद्यते क्वचित् ॥ २४ ॥
प्राण, जिह्वा, मन और रजोगुणसहित सत्त्वगुण—ये रज अर्थात् मायासहित सद्भाव हैं।
इन भावोंसे मुक्त निर्द्वन्द्व, निष्काम, समस्त प्राणियोंके प्रति समभाव रखनेवाले, ममतारहित,
जितात्मा तथा सब ओरसे बन्धनशून्य पुरुषको कभी और कहीं भी भय नहीं
होता ॥ २३-२४ ॥