अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंजीभ, आँख, कान, त्वचा, मन और बुद्धि—ये गन्धोंको नहीं समझ पाते, किंतु
नासिका उसका अनुभव करती है ॥ ६ ॥
घ्राणं चक्षुस्तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न रसानधिगच्छन्ति जिह्वा तानधिगच्छति ॥ ७ ॥
नासिका, कान, नेत्र, त्वचा, मन और बुद्धि—ये रसोंका आस्वादन नहीं कर सकते।
केवल जिह्वा उसका स्वाद ले सकती है ॥ ७ ॥
घ्राणं जिह्वा तथा श्रोत्रं वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न रूपाण्यधिगच्छन्ति चक्षुस्तान्यधिगच्छति ॥ ८ ॥
नासिका, जीभ, कान, त्वचा, मन और बुद्धि—ये रूपका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सकते;
किंतु नेत्र इनका अनुभव करते हैं ॥ ८ ॥
घ्राणं जिह्वा ततश्चक्षुः श्रोत्रं बुद्धिर्मनस्तथा ।
न स्पर्शानधिगच्छन्ति त्वक् च तानधिगच्छति ॥ ९ ॥
नासिका, जीभ, आँख, कान, बुद्धि और मन—ये स्पर्शका अनुभव नहीं कर सकते;
किंतु त्वचाको उसका ज्ञान होता है ॥ ९ ॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च वाङ्मनो बुद्धिरेव च ।
न शब्दानधिगच्छन्ति श्रोत्रं तानधिगच्छति ॥ १० ॥
नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, मन और बुद्धि—इन्हें शब्दका ज्ञान नहीं होता; किंतु
कानको होता है ॥ १० ॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं बुद्धिरेव च ।
संशयं नाधिगच्छन्ति मनस्तमधिगच्छति ॥ ११ ॥
नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान और बुद्धि—ये संशय (संकल्प-विकल्प) नहीं कर
सकते। यह काम मनका है ॥ ११ ॥
घ्राणं जिह्वा च चक्षुश्च त्वक् श्रोत्रं मन एव च ।
न निष्ठामधिगच्छन्ति बुद्धिस्तामधिगच्छति ॥ १२ ॥
इसी प्रकार नासिका, जीभ, आँख, त्वचा, कान, और मन—वे किसी बातका निश्चय
नहीं कर सकते। निश्चयात्मक ज्ञान तो केवल बुद्धिको होता है ॥ १२ ॥
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
इन्द्रियाणां च संवादं मनसश्चैव भामिनि ॥ १३ ॥
भामिनि! इस विषयमें इन्द्रियों और मनके संवादरूप एक प्राचीन इतिहासका उदाहरण
दिया जाता है ॥ १३ ॥
मन उवाच
नाघ्राति मामृते घ्राणं रसं जिह्वा न वेत्ति च ।