अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंद्विनवतितमोऽध्यायः
महर्षि अगस्त्यके यज्ञकी कथा
जनमेजय उवाच
धर्मागतेन त्यागेन भगवन् स्वर्गमस्ति चेत् ।
एतन्मे सर्वमाचक्ष्व कुशलो ह्यसि भाषितुम् ॥ १ ॥
जनमेजयने कहा—भगवन्! धर्मके द्वारा प्राप्त हुए धनका दान करनेसे यदि स्वर्ग
मिलता है तो यह सब विषय मुझे स्पष्टरूपसे बताइये; क्योंकि आप प्रवचन करनेमें कुशल
हैं ॥ १ ॥
तस्योञ्छवृत्तेर्यद् वृत्तं सक्तुदाने फलं महत् ।
कथितं तु मम ब्रह्मंस्तथ्यमेतदसंशयम् ॥ २ ॥
ब्रह्मन्! उञ्छवृत्ति धारण करनेवाले ब्राह्मणको न्यायतः प्राप्त हुए सत्तूका दान करनेसे
जिस महान् फलकी प्राप्ति हुई, उसका आपने मुझसे वर्णन किया। निस्संदेह यह सब ठीक
है ॥ २ ॥
कथं हि सर्वयज्ञेषु निश्चयः परमोऽभवत् ।
एतदर्हसि मे वक्तुं निखिलेन द्विजर्षभ ॥ ३ ॥
परंतु सभी यज्ञोंमें यह उत्तम निश्चय कैसे कार्यान्वित किया जा सकता है। द्विजश्रेष्ठ!
इस विषयका मुझसे पूर्णतः प्रतिपादन कीजिये ॥ ३ ॥
वैशम्पायन उवाच
अत्राप्युदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् ।
अगस्त्यस्य महायज्ञे पुरावृत्तमरिंदम ॥ ४ ॥
वैशम्पायनजीने कहा—राजन्! इस विषयमें पहले अगस्त्य मुनिके महान् यज्ञमें जो
घटना घटित हुई थी, उस प्राचीन इतिहासका जानकार मनुष्य उदाहरण दिया करते
हैं ॥ ४ ॥
पुरागस्त्यो महातेजा दीक्षां द्वादशवार्षिकीम् ।
प्रविवेश महाराज सर्वभूतहिते रतः ॥ ५ ॥
महाराज! पहलेकी बात है, सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें रत रहनेवाले महातेजस्वी अगस्त्य
मुनिने एक समय बारह वर्षोंमें समाप्त होनेवाले यज्ञकी दीक्षा ली ॥ ५ ॥
तत्राग्निकल्पा होतार आसन् सत्रे महात्मनः ।
मूलाहाराः फलाहाराः साश्मकुट्टा मरीचिपाः ॥ ६ ॥
परिपृष्टिका वैघसिकाः प्रसंख्यानास्तथैव च ।