अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 367, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंभगवान् श्रीकृष्ण युधिष्ठिरके पास बैठकर थोड़ी देरतक बातचीत करते रहे। उसीमें
उन्होंने बताया—'अर्जुन बहुत-से युद्धोंमें शत्रुओंका सामना करनेके कारण दुर्बल हो गये
हैं' ॥ ७ ॥
स तं पप्रच्छ कौन्तेयः पुनः पुनररिंदमम् ।
धर्मजः शक्रजं जिष्णुं समाचष्ट जगत्पतिः ॥ ८ ॥
यह सुनकर धर्मपुत्र कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने शत्रुदमन इन्द्रकुमार अर्जुनके विषयमें
बारम्बार उनसे पूछा। तब जगदीश्वर भगवान् श्रीकृष्ण उनसे इस प्रकार बोले— ॥ ८ ॥
आगमद् द्वारकावासी ममाप्तः पुरुषो नृप ।
योऽद्राक्षीत् पाण्डवश्रेष्ठं बहुसंग्रामकर्षितम् ॥ ९ ॥
‘राजन्! मेरे पास द्वारकाका रहनेवाला एक विश्वासपात्र मनुष्य आया था। उसने
पाण्डवश्रेष्ठ अर्जुनको अपनी आँखों देखा था। वे अनेक स्थानोंपर युद्ध करनेके कारण बहुत
दुर्बल हो गये हैं ॥ ९ ॥
समीपे च महाबाहुमाचष्ट च मम प्रभो ।
कुरु कार्याणि कौन्तेय हयमेधार्थसिद्धये ॥ १० ॥
‘प्रभो! उसने यह भी बताया है कि महाबाहु अर्जुन अब निकट आ गये हैं। अतः
कुन्तीनन्दन! अब आप अश्वमेधयज्ञकी सिद्धिके लिये आवश्यक कार्य आरम्भ कर
दीजिये' ॥ १० ॥
इत्युक्तः प्रत्युवाचैनं धर्मराजो युधिष्ठिरः ।
दिष्ट्या स कुशली जिष्णुरुपायाति च माधव ॥ ११ ॥
उनके ऐसा कहनेपर धर्मराज युधिष्ठिरने पुनः प्रश्न किया—'माधव! बड़े सौभाग्यकी
बात है कि अर्जुन सकुशल लौट रहे हैं ॥ ११ ॥
यदिदं संदिदेशास्मिन् पाण्डवानां बलाग्रणीः ।
तदा ज्ञातुमिहेच्छामि भवता यदुनन्दन ॥ १२ ॥
‘यदुनन्दन! पाण्डवसेनाके अग्रगामी अर्जुनने इस यज्ञके सम्बन्धमें जो कुछ संदेश दिया
हो, उसे मैं आपके मुँहसे सुनना चाहता हूँ' ॥ १२ ॥
इत्युक्तो धर्मराजेन वृष्ण्यन्धकपतिस्तदा ।
प्रोवाचेदं वचो वाग्मी धर्मात्मानं युधिष्ठिरम् ॥ १३ ॥
धर्मराजके इस प्रकार पूछनेपर वृष्णि और अन्धकवंशी यादवोंके स्वामी प्रवचनकुशल
भगवान् श्रीकृष्णने धर्मात्मा युधिष्ठिरसे इस प्रकार कहा— ॥ १३ ॥
इदमाह महाराज पार्थवाक्यं स्मरन् नरः ।
वाच्यो युधिष्ठिरः कृष्ण काले वाक्यमिदं मम ॥ १४ ॥
“महाराज! जो मनुष्य मेरे पास आया था, उसने अर्जुनकी बात याद करके मुझसे इस
प्रकार कहा—'श्रीकृष्ण! आप ठीक समयपर मेरा यह कथन महाराज युधिष्ठिरको सुना