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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 365, कुल 421 में से

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पृष्ठ 365

एवं स ववृते यज्ञो धर्मराजस्य धीमतः ।
अन्नस्य सुबहून् राजन्नुत्सर्गान् पर्वतोपमान् ॥ ३८ ॥
दधिकुल्याश्च ददृशुः सर्पिषश्च ह्रदान् जनाः ।
जम्बूद्वीपो हि सकलो नानाजनपदायतः ॥ ३९ ॥
राजन्नदृश्यतैकस्थो राज्ञस्तस्य महामखे ।
राजन्! बुद्धिमान् धर्मराज युधिष्ठिरका वह यज्ञ रोज-रोज इसी रूपमें चालू रहा। उस
स्थानपर अन्नके बहुत-से पहाड़ों जैसे ढेर लगे रहते थे। दहीकी नहरें बनी हुई थीं और घीके
बहुत-से तालाब भरे हुए थे। राजा युधिष्ठिरके उस महान् यज्ञमें अनेक देशोंके लोग जुटे हुए
थे। राजन्! सारा जम्बूद्वीप ही वहाँ एक स्थानमें स्थित दिखायी देता था ॥ ३८-३९ १/२ ॥
तत्र जातिसहस्राणि पुरुषाणां ततस्ततः ॥ ४० ॥
गृहीत्वा भाजनान् जग्मुर्बहूनि भरतर्षभ ।
भरतश्रेष्ठ! वहाँ हजारों प्रकारकी जातियोंके लोग बहुत-से पात्र लेकर उपस्थित होते
थे ॥ ४० १/२ ॥
स्रग्विणश्चापि ते सर्वे सुमृष्टमणिकुण्डलाः ॥ ४१ ॥
पर्यवेषन् द्विजातींस्तान् शतशोऽथ सहस्रशः ।
विविधान्यन्नपानानि पुरुषा येऽनुयायिनः ।
ते वै नृपोपभोज्यानि ब्राह्मणानां ददुश्च ह ॥ ४२ ॥
सैकड़ों और हजारों मनुष्य वहाँ ब्राह्मणोंको तरह-तरहके भोजन परोसते थे। वे सब-
के-सब सोनेके हार और विशुद्ध मणिमय कुण्डलोंसे अलंकृत होते थे। राजाके अनुयायी
पुरुष वहाँ ब्राह्मणोंको तरह-तरहके अन्न-पान एवं राजोचित भोजन अर्पित करते
थे ॥ ४१-४२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वमेधारम्भे
पञ्चाशीतितमोऽध्यायः ॥ ८५ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वमेधयज्ञका
आरम्भविषयक पचासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८५ ॥