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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 339, कुल 421 में से

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पृष्ठ 339

मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाली देव-दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं और
आकाशमें साधुवादकी महान् ध्वनि गूँजने लगी ॥ ५५ ॥
उत्थाय च महाबाहुः पर्याश्वस्तो धनंजयः ।
बभ्रुवाहनमालिङ्ग्य समाजिघ्रत मूर्धनि ॥ ५६ ॥
महाबाहु अर्जुन भलीभाँति स्वस्थ होकर उठे और बभ्रुवाहनको हृदयसे लगाकर उसका
मस्तक सूँघने लगे ॥ ५६ ॥
ददर्श चापि दूरेऽस्य मातरं शोककर्शिताम् ।
उलूप्या सह तिष्ठन्तीं ततोऽपृच्छद् धनंजयः ॥ ५७ ॥
उससे थोड़ी ही दूरपर बभ्रुवाहनकी शोकाकुल माता चित्रांगदा उलूपीके साथ खड़ी
थी। अर्जुनने जब उसे देखा, तब बभ्रुवाहनसे पूछा— ॥ ५७ ॥
किमिदं लक्ष्यते सर्वं शोकविस्मयहर्षवत् ।
रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे ॥ ५८ ॥
'शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर पुत्र! यह सारा समरांगण शोक, विस्मय और हर्षसे
युक्त क्यों दिखायी देता है? यदि जानते हो तो मुझे बताओ ॥ ५८ ॥
जननी च किमर्थं ते रणभूमिमुपागता ।
नागेन्द्रदुहिता चेयमूलूपी किमिहागता ॥ ५९ ॥
'तुम्हारी माता किसलिये रणभूमिमें आयी है? तथा इस नागराजकन्या उलूपीका
आगमन भी यहाँ किसलिये हुआ है? ॥ ५९ ॥
जानाम्यहमिदं युद्धं त्वया मद्वचनात् कृतम् ।
स्त्रीणामागमने हेतुमहमिच्छामि वेदितुम् ॥ ६० ॥
'मैं तो इतना ही जानता हूँ कि तुमने मेरे कहनेसे यह युद्ध किया है; परंतु यहाँ स्त्रियोंके
आनेका क्या कारण है? यह मैं जानना चाहता हूँ' ॥ ६० ॥
तमुवाच तथा पृष्टो मणिपूरपतिस्तदा ।
प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छ्यतामियम् ॥ ६१ ॥
पिताके इस प्रकार पूछनेपर विद्वान् मणिपुरनरेशने पिताके चरणोंमें सिर रखकर उन्हें
प्रसन्न किया और कहा— 'पिताजी! यह वृत्तान्त आप माता उलूपीसे पूछिये' ॥ ६१ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे
अर्जुनप्रत्युज्जीवने अशीतितमोऽध्यायः ॥ ८० ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें अश्वानुसरणके प्रसंगमें
अर्जुनका पुनर्जीवनविषयक अस्सीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ८० ॥