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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 421 में से

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पृष्ठ 33

एवमुक्तः स शान्तात्मा तामुवाच हसन्निव ।
सुभगे नाभ्यसूयामि वाक्यस्यास्य तवानघे ॥ ५ ॥
पत्नीके ऐसा कहनेपर वे शान्तचित्तवाले ब्राह्मण देवता हँसते हुए-से बोले
—‘सौभाग्यशालिनि! तुम पापसे सदा दूर रहती हो; अतः तुम्हारे इस कथनके लिये मैं बुरा
नहीं मानता ॥ ५ ॥
ग्राह्यं दृश्यं च सत्यं वा यदिदं कर्म विद्यते ।
एतदेव व्यवस्यन्ति कर्म कर्मेति कर्मिणः ॥ ६ ॥
‘संसारमें जो ग्रहण करनेयोग्य दीक्षा और व्रत आदि हैं तथा इन आँखोंसे दिखायी
देनेवाले जो स्थूल कर्म हैं, उन्हींको वस्तुतः कर्म माना जाता है। कर्मठ लोग ऐसे ही कर्मको
कर्मके नामसे पुकारते हैं ॥ ६ ॥
मोहमेव नियच्छन्ति कर्मणा ज्ञानवर्जिताः ।
नैष्कर्म्यं न च लोकेऽस्मिन् मुहूर्तंमपि लभ्यते ॥ ७ ॥
‘किंतु जिन्हें ज्ञानकी प्राप्ति नहीं हुई है, वे लोग कर्मके द्वारा मोहका ही संग्रह करते हैं।
इस लोकमें कोई दो घड़ी भी बिना कर्म किये रह सके, ऐसा सम्भाव नहीं है ॥ ७ ॥
कर्मणा मनसा वाचा शुभं वा यदि वाशुभम् ।
जन्मादिमूर्तिभेदान्तं कर्म भूतेषु वर्तते ॥ ८ ॥