अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 326, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ें‘दुर्बुद्धे! नराधम! यदि मैं हथियार रखकर खाली हाथ तेरे पास आता तो इस ढंगसे
मिलना ठीक हो सकता था’ ॥ ७ ॥
तमेवमुक्तं भर्त्रा तु विदित्वा पन्नगात्मजा ।
अमृष्यमाणा भित्त्वोर्वीमुलूपी समुपागमत् ॥ ८ ॥
पतिदेव अर्जुन जब अपने पुत्र बभ्रुवाहनसे ऐसी बात कह रहे थे, उस समय नागकन्या
उलूपी उस बातको सुनकर उनके अभिप्रायको जान गयी और उनके द्वारा किये गये पुत्रके
तिरस्कारको सहन न कर सकनेके कारण वह धरती छेदकर वहाँ चली आयी ॥ ८ ॥
सा ददर्श ततः पुत्रं विमृशन्तमधोमुखम् ।
संतर्ज्यमानमसकृत् पित्रा युद्धार्थिना प्रभो ॥ ९ ॥
ततः सा चारुसर्वाङ्गी समुपैत्योरगात्मजा ।
उलूपी प्राह वचनं धर्म्यं धर्मविशारदम् ॥ १० ॥
प्रभो! उसने देखा कि पुत्र बभ्रुवाहन नीचे मुँह किये किसी सोच-विचारमें पड़ा हुआ है
और युद्धार्थी पिता उसे बारंबार डाँट-फटकार रहे हैं। तब मनोहर अंगोंवाली नागकन्या
उलूपी धर्म-निपुण बभ्रुवाहनके पास आकर यह धर्मसम्मत बात बोली— ॥ ९-१० ॥
उलूपीं मां निबोध त्वं मातरं पन्नगात्मजाम् ।
कुरुष्व वचनं पुत्र धर्मस्ते भविता परः ॥ ११ ॥
‘बेटा! तुम्हें विदित होना चाहिये कि मैं तुम्हारी विमाता नागकन्या उलूपी हूँ। तुम मेरी
आज्ञाका पालन करो। इससे तुम्हें महान् धर्मकी प्राप्ति होगी’ ॥ ११ ॥
युध्यस्वैनं कुरुश्रेष्ठं पितरं युद्धदुर्मदम् ।
एवमेष हि ते प्रीतो भविष्यति न संशयः ॥ १२ ॥
‘तुम्हारे पिता कुरुकुलके श्रेष्ठ वीर और युद्धके मदसे उन्मत्त रहनेवाले हैं। अतः इनके
साथ अवश्य युद्ध करो। ऐसा करनेसे ये तुमपर प्रसन्न होंगे। इसमें संशय नहीं है’ ॥ १२ ॥
एवं दुर्मर्षितो राजा स मात्रा बभ्रुवाहनः ।
मनश्चक्रे महातेजा युद्धाय भरतर्षभ ॥ १३ ॥
भरतश्रेष्ठ! माताके द्वारा इस प्रकार अमर्ष दिलाये जानेपर महातेजस्वी राजा
बभ्रुवाहनने मन-ही-मन युद्ध करनेका निश्चय किया ॥ १३ ॥
संनह्य काञ्चनं वर्म शिरस्त्राणं च भानुमत् ।
तूणीरशतसम्बाधमारुरोह रथोत्तमम् ॥ १४ ॥
सुवर्णमय कवच पहनकर तेजस्वी शिरस्त्राण (टोप) धारण करके वह सैकड़ों
तरकसोंने भरे हुए उत्तम रथपर आरूढ़ हुआ ॥ १४ ॥
सर्वोपकरणोपेतं युक्तमश्वैर्मनोजवैः ।
सचक्रोपस्करं श्रीमान् हेमभाण्डपरिष्कृतम् ॥ १५ ॥
परमार्चितमुच्छ्रित्य ध्वजं सिंहं हिरण्मयम् ।