अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 324, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंततो मृगमिवाकाशे यथा देवः पिनाकधृक् ।
ससार तं तथा वीरो विधिवद् यज्ञियं हयम् ॥ ४७ ॥
जैसे पिनाकधारी महादेवजी आकाशमें मृगके पीछे दौड़े थे, उसी प्रकार वीर अर्जुनने
उस यज्ञसम्बन्धी घोड़ेका विधिपूर्वक अनुसरण किया ॥ ४७ ॥
स च वाजी यथेष्टेन तांस्तान् देशान् यथाक्रमम् ।
विचचार यथाकामं कर्म पार्थस्य वर्धयन् ॥ ४८ ॥
वह अश्व यथेष्टगतिसे क्रमशः सभी देशोंमें घूमता और अर्जुनके पराक्रमका विस्तार
करता हुआ इच्छानुसार विचरने लगा ॥ ४८ ॥
क्रमेण स हयस्त्वेवं विचरन् पुरुषर्षभ ।
मणिपूरपतेर्देशमुपायात् सहपाण्डवः ॥ ४९ ॥
पुरुषप्रवर जनमेजय! इस प्रकार क्रमशः विचरण करता हुआ वह अश्व अर्जुनसहित
मणिपुर-नरेशके राज्यमें जा पहुँचा ॥ ४९ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवपराजये
अष्टसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७८ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंकी
पराजयविषयक अठहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७८ ॥