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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 316, कुल 421 में से

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पृष्ठ 316

अलातचक्रवद् राजन् शरजालैः समर्पयत् ॥ ३० ॥
राजन्! उस समय महाबली पुरुषसिंह अर्जुन अलातचक्रकी भाँति घूम-घूमकर सारे
सैन्धवोंपर बाण-समूहोंकी वर्षा करने लगे ॥ ३० ॥
तदिन्द्रजालप्रतिमं बाणजालममित्रहा ।
विसृज्य दिक्षु सर्वासु महेन्द्र इव वज्रभृत् ॥ ३१ ॥
शत्रुसूदन अर्जुनने वज्रधारी महेन्द्रकी भाँति सम्पूर्ण दिशाओंसे इन्द्रजालके समान
बाणोंका जाल-सा फैला दिया ॥ ३१ ॥
मेघजालनिभं सैन्यं विदार्य शरवृष्टिभिः ।
विबभौ कौरवश्रेष्ठः शरदीव दिवाकरः ॥ ३२ ॥
जैसे शरत्कालके सूर्य मेघोंकी घटाको छिन्न-भिन्न करके प्रकाशित होते हैं, उसी प्रकार
कौरवश्रेष्ठ अर्जुन अपने बाणोंकी वृष्टिसे शत्रुसेनाको विदीर्ण करके अत्यन्त शोभा पाने
लगे ॥ ३२ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि सैन्धवयुद्धे
सप्तसप्ततितमोऽध्यायः ॥ ७७ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें सैन्धवोंके साथ
अर्जुनका युद्धविषयक सतहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ७७ ॥
(दाक्षिणात्य अधिक पाठका १ श्लोक मिलाकर कुल ३३ श्लोक हैं)