अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 310, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरंतु महाबाहु अर्जुनने अपने शत्रुघाती सायकोंद्वारा उन सारे बाणोंको पीछे लौटा
दिया। वह एक अद्भुत-सी घटना हुई ॥ १५ ॥
ततः पुनरभिक्रुद्धो राजा प्राग्ज्योतिषाधिपः ।
प्रेषयामास नागेन्द्रं बलवत् पर्वतोपमम् ॥ १६ ॥
तब प्राग्ज्योतिषपुरके स्वामी राजा वज्रदत्तने अत्यन्त कुपित हो अपने पर्वताकार
गजराजको पुनः बलपूर्वक आगे बढ़ाया ॥ १६ ॥
तमापतन्तं सम्प्रेक्ष्य बलवत् पाकशासनिः ।
नाराचमग्निसंकाशं प्राहिणोद् वारणं प्रति ॥ १७ ॥
उसे बलपूर्वक आक्रमण करते देख इन्द्रकुमार अर्जुनने उस हाथीके ऊपर एक अग्निके
समान तेजस्वी नाराच चलाया ॥ १७ ॥
स तेन वारणो राजन् मर्मस्वभिहतो भृशम् ।
पपात सहसा भूमौ वज्ररुग्ण इवाचलः ॥ १८ ॥
राजन्! उस नाराचने हाथीके मर्मस्थानोंमें गहरी चोट पहुँचायी। वह वज्रके मारे हुए
पर्वतकी भाँति सहसा पृथ्वीपर ढह पड़ा ॥ १८ ॥
स पतन् शुशुभे नागो धनंजयशराहतः ।
विशन्निव महाशैलो महीं वज्रप्रपीडितः ॥ १९ ॥
अर्जुनके बाणोंसे घायल होकर गिरता हुआ वह हाथी ऐसी शोभा पाने लगा, मानो
वज्रके आघातसे अत्यन्त पीड़ित हुआ महान् पर्वत पृथ्वीमें समा जाना चाहता हो ॥ १९ ॥
तस्मिन् निपतिते नागे वज्रदत्तस्य पाण्डवः ।
तं न भेतव्यमित्याह ततो भूमिगतं नृपम् ॥ २० ॥
वज्रदत्तके उस हाथीके धराशायी होते ही राजा वज्रदत्त स्वयं भी पृथ्वीपर जा पड़ा।
उस समय पाण्डुपुत्र अर्जुनने उससे कहा—‘राजन्! तुम्हें डरना नहीं चाहिये’ ॥ २० ॥
अब्रवीद्धि महातेजाः प्रस्थितं मां युधिष्ठिरः ।
राजानस्ते न हन्तव्या धनंजय कथंचन ॥ २१ ॥
जब मैं घरसे प्रस्थित हुआ, उस समय महातेजस्वी राजा युधिष्ठिरने मुझसे कहा
—‘धनंजय! तुम्हें किसी तरह भी राजाओंका वध नहीं करना चाहिये’ ॥ २१ ॥
सर्वमेतन्नरव्याघ्र भवत्येतावता कृतम् ।
योधाश्चापि न हन्तव्या धनंजय रणे त्वया ॥ २२ ॥
“पुरुषसिंह! इतना करनेसे सब कुछ हो जायगा। अर्जुन! तुम्हें युद्ध ठानकर
योद्धाओंका वध कदापि नहीं करना चाहिये ॥ २२ ॥
वक्तव्याश्चापि राजानः सर्वे सहसुहृज्जनैः ।
युधिष्ठिरस्याश्वमेधो भवद्भिरनुभूयताम् ॥ २३ ॥