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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 290, कुल 421 में से

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पृष्ठ 290

पृथ्वीनाथ! जो अश्व चुना जाय, उसे शास्त्रीय विधिके अनुसार छोड़ो और वह तुम्हारे
दीप्तिमान् यशका विस्तार करता हुआ समुद्रपर्यन्त समस्त पृथ्वीपर भ्रमण करे॥ ६॥
वैशम्पायन उवाच
इत्युक्तः स तथेत्युक्त्वा पाण्डवः पृथिवीपतिः।
चकार सर्वं राजेन्द्र यथोक्तं ब्रह्मवादिना॥ ७॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—राजेन्द्र! यह सुनकर पाण्डुपुत्र राजा युधिष्ठिरने 'बहुत
अच्छा' कहकर ब्रह्मवादी व्यासजीके कथनानुसार सारा कार्य सम्पन्न किया॥ ७॥
सम्भाराश्चैव राजेन्द्र सर्वे संकल्पिताऽभवन्।
स सम्भारान् समाहृत्य नृपो धर्मसुतस्तदा॥ ८॥
न्यवेदयदमेयात्मा कृष्णद्वैपायनाय वै।
राजेन्द्र! उन्होंने मनमें जिन-जिन सामानोंको एकत्र करनेका संकल्प किया था, उन
सबको जुटाकर धर्मपुत्र अमेयात्मा राजा युधिष्ठिरने श्रीकृष्णद्वैपायन व्यासजीको सूचना
दी॥ ८ १/२ ॥
ततोऽब्रवीन्महातेजा व्यासो धर्मात्मजं नृपम्॥ ९॥
यथाकालं यथायोगं सज्जाः स्म तव दीक्षणे।
तब महातेजस्वी व्यासने धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिरसे कहा—'राजन्! हमलोग यथासमय
उत्तम योग आनेपर तुम्हें दीक्षा देनेको तैयार हैं॥ ९ १/२ ॥
स्फ्यश्च कूर्चश्च सौवर्णो यच्चान्यदपि कौरव॥ १०॥
तत्र योग्यं भवेत् किंचिद् रौक्मं तत् क्रियतामिति।
'कुरुनन्दन! इस बीचमें तुम सोनेके 'स्फ्य' और 'कूर्च' बनवा लो तथा और भी जो
सुवर्णमय सामान आवश्यक हों, उन्हें तैयार करा डालो॥ १० १/२ ॥
अश्वश्चोत्सृज्यतामद्य पृथ्व्यामथ यथाक्रमम्।
सुगुप्तं चरतां चापि यथाशास्त्रं यथाविधि॥ ११॥
'आज शास्त्रीय विधिके अनुसार यज्ञ-सम्बन्धी अश्वको क्रमशः सारी पृथ्वीपर घूमनेके
लिये छोड़ना चाहिये तथा ऐसी व्यवस्था करनी चाहिये, जिससे वह सुरक्षितरूपसे सब ओर
विचर सके'॥ ११॥
युधिष्ठिर उवाच
अयमश्वो यथा ब्रह्मन्नुत्सृष्टः पृथिवीमिमाम्।
चरिष्यति यथाकामं तत्र वै संविधीयताम्॥ १२॥
पृथिवीं पर्यटन्तं हि तुरगं कामचारिणम्।
कः पालयेदिति मुने तद् भवान् वक्तुमर्हति॥ १३॥