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सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 247, कुल 421 में से

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पृष्ठ 247

‘शत्रुदमन! पहलेकी भाँति आज भी तुम मुझे युद्धकी बात बताओ। मैं इस प्रकार
विलाप करती हूँ तो भी आज यहाँ तुम मुझसे बात क्यों नहीं करते हो?’ ।। ३१ ।।
एवमादि तु वार्ष्णेय्यास्तस्यास्तत्परिदेवितम् ।
श्रुत्वा पृथा सुदुःखार्ता शनैर्वाक्यमथाब्रवीत् ।। ३२ ।।
सुभद्रे वासुदेवेन तथा सात्यकिना रणे ।
पित्रा च लालितो बालः स हतः कालधर्मणा ।। ३३ ।।
‘सुभद्राका इस प्रकार विलाप सुनकर अत्यन्त दुःखसे आतुर हुई बुआ कुन्तीने शनैः-
शनैः उसे समझाते हुए कहा—‘सुभद्रे! वासुदेव, सात्यकि और पिता अर्जुन—तीनों जिसका
बहुत लाड़-प्यार करते थे, वह बालक अभिमन्यु कालधर्मसे मारा गया है (उसकी आयु पूरी
हो गयी, इसलिये मृत्युके अधीन हुआ है) ।। ३२-३३ ।।
ईदृशो मर्त्यधर्मोऽयं मा शुचो यदुनन्दिनि ।
पुत्रो हि तव दुर्धर्षः सम्प्राप्तः परमां गतिम् ।। ३४ ।।
‘यदुनन्दिनि! मृत्युलोकमें जन्म लेनेवाले मनुष्योंका धर्म ही ऐसा है—उन्हें एक-न-एक
दिन मृत्युके वशमें होना ही पड़ता है, इसलिये शोक न करो। तुम्हारा दुर्जय पुत्र परम
गतिको प्राप्त हुआ है ।। ३४ ।।
कुले महति जातासि क्षत्रियाणां महात्मनाम् ।
मा शुचश्चपलाक्षं त्वं पद्मपत्रनिभेक्षणे ।। ३५ ।।
“बेटी! कमलदललोचने! तुम महात्मा क्षत्रियोंके महान् कुलमें उत्पन्न हुई हो; अतः तुम
अपने चंचल नेत्रोंवाले पुत्रके लिये शोक न करो ।। ३५ ।।
उत्तरां त्वमवेक्षस्व गुर्विणीं मा शुचः शुभे ।
पुत्रमेषा हि तस्याशु जनयिष्यति भाविनी ।। ३६ ।।
“शुभे! तुम्हारी बहू उत्तरा गर्भवती है, तुम उसीकी ओर देखो, शोक न करो। वह
भाविनी उत्तरा शीघ्र ही अभिमन्युके पुत्रको जन्म देगी” ।। ३६ ।।
एवमाश्वासयित्वैनां कुन्ती यदुकुलोद्वह ।
विहाय शोकं दुर्धर्षं श्राद्धमस्य ह्यकल्पयत् ।। ३७ ।।
‘यदुकुलभूषण पिताजी! इस प्रकार सुभद्राको समझा-बुझाकर दुस्तर शोकको
त्यागकर कुन्तीने उसके श्राद्धकी तैयारी करायी ।। ३७ ।।
समनुज्ञाप्य धर्मज्ञं राजानं भीममेव च ।
यमौ यमोपमौ चैव ददौ दानान्यनेकnames -> दानान्यनेकशः ।। ३८ ।।
‘धर्मज्ञ राजा युधिष्ठिर और भीमसेनको आदेश देकर तथा यमके समान पराक्रमी
नकुल-सहदेवको भी आज्ञा देकर कुन्तीदेवीने अभिमन्युके उद्देश्यसे अनेक प्रकारके दान
दिलाये ।। ३८ ।।
ततः प्रदाय बह्वीर्गा ब्राह्मणाय यदूद्वह ।