अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 24, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंपरमाप्नोति संशान्तमचलं नित्यमक्षरम् ॥ १४ ॥
जो सब प्रकारके संस्कारोंसे मुक्त होता है, वह मनुष्य शान्त, अचल, नित्य, अविनाशी
एवं सनातन परब्रह्म परमात्माको प्राप्त कर लेता है ॥ १४ ॥
अतः परं प्रवक्ष्यामि योगशास्त्रमनुत्तमम् ।
युञ्जन्तः सिद्धमात्मानं यथा पश्यन्ति योगिनः ॥ १५ ॥
अब मैं उस परम उत्तम योगशास्त्रका वर्णन करूँगा, जिसके अनुसार योग-साधन
करनेवाले योगी पुरुष अपने आत्माका साक्षात्कार कर लेते हैं ॥ १५ ॥
तस्योपदेशं वक्ष्यामि यथावत् तन्निबोध मे ।
यैर्द्वारैश्चारयन्नित्यं पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १६ ॥
मैं उसका यथावत् उपदेश करता हूँ। मनोनिग्रहके जिन उपायोंद्वारा चित्तको इस
शरीरके भीतर ही वशीभूत एवं अन्तर्मुख करके योगी अपने नित्य आत्माका दर्शन करता
है, उन्हें मुझसे श्रवण करो ॥ १६ ॥
इन्द्रियाणि तु संहृत्य मन आत्मनि धारयेत् ।
तीव्रं तप्त्वा तपः पूर्वं मोक्षयोगं समाचरेत् ॥ १७ ॥
इन्द्रियोंको विषयोंकी ओरसे हटाकर मनमें और मनको आत्मामें स्थापित करे। इस
प्रकार पहले तीव्र तपस्या करके फिर मोक्षोपयोगी उपायका अवलम्बन करना
चाहिये ॥ १७ ॥
तपस्वी सततं युक्तो योगशास्त्रमथाचरेत् ।
मनीषी मनसा विप्रः पश्यन्नात्मानमात्मनि ॥ १८ ॥
मनीषी ब्राह्मणको चाहिये कि वह सदा तपस्यामें प्रवृत्त एवं यत्नशील होकर
योगशास्त्रोक्त उपायका अनुष्ठान करे। इससे वह मनके द्वारा अन्तःकरणमें आत्माका
साक्षात्कार करता है ॥ १८ ॥
स चेच्छक्नोत्ययं साधुर्युक्तमात्मानमात्मनि ।
तत एकान्तशीलः स पश्यत्यात्मानमात्मनि ॥ १९ ॥
एकान्तमें रहनेवाला साधक पुरुष यदि अपने मनको आत्मामें लगाये रखनेमें सफल हो
जाता है तो वह अवश्य ही अपनेमें आत्माका दर्शन करता है ॥ १९ ॥
संयतः सततं युक्त आत्मवान् विजितेन्द्रियः ।
तथा य आत्मनाऽऽत्मानं सम्प्रयुक्तः प्रपश्यति ॥ २० ॥
जो साधक सदा संयमपरायण, योगयुक्त, मनको वशमें करनेवाला और जितेन्द्रिय है,
वही आत्मासे प्रेरित होकर बुद्धिके द्वारा उसका साक्षात्कार कर सकता है ॥
यथा हि पुरुषः स्वप्ने दृष्ट्वा पश्यत्यसाविति ।
तथा रूपमिवात्मानं साधुयुक्तः प्रपश्यति ॥ २१ ॥