अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंइत्युक्तस्तु तथाकार्षीदुत्तङ्कश्चित्रभानुना ।
घृतार्चिः प्रीतिमांश्चापि प्रजज्वाल दिधक्षया ॥ ४८ ॥
अग्निदेवके ऐसा कहनेपर उत्तंकने उनकी आज्ञाका पालन किया। तब घृतमयी
अर्चिवाले अग्निदेव प्रसन्न होकर नागलोकको जला डालनेकी इच्छासे प्रज्वलित हो
उठे ॥ ४८ ॥
ततोऽस्य रोमकूपेभ्यो धम्यतस्तत्र भारत ।
घनः प्रादुरभूद् धूमो नागलोकभयावहः ॥ ४९ ॥
भारत! जिस समय उत्तंकने फूँक मारना आरम्भ किया, उसी समय उस अश्वरूपधारी
अग्निके रोम-रोमसे घनीभूत धूम उठने लगा; जो नागलोकको भयभीत करनेवाला
था ॥ ४९ ॥
तेन धूमेन महता वर्धमानेन भारत ।
नागलोके महाराज न प्राज्ञायत किंचन ॥ ५० ॥
महाराज भरतनन्दन! बढ़ते हुए उस महान् धूमसे आच्छन्न हुए नागलोकमें कुछ भी
सूझ नहीं पड़ता था ॥ ५० ॥
हाहाकृतमभूत् सर्वमैरावतनिवेशनम् ।
वासुकिप्रमुखानां च नागानां जनमेजय ॥ ५१ ॥