अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंवैशम्पायन उवाच
उत्तङ्कस्तु महाराज पुनरेवाब्रवीद् वचः ।
आज्ञापयस्व मां मातः कर्तव्यं च तव प्रियम् ॥ २८ ॥
वैशम्पायनजी कहते हैं—महाराज! गुरुपत्नीकी बात सुनकर उत्तंकने फिर कहा
—‘माताजी! मुझे आज्ञा दीजिये—मैं क्या करूँ? मुझे आपका प्रिय कार्य अवश्य करना
है’ ॥ २८ ॥
अहल्योवाच
सौदासपत्न्या विधृते दिव्ये ये मणिकुण्डले ।
ते समानय भद्रं ते गुर्वर्थः सुकृतो भवेत् ॥ २९ ॥
अहल्या बोली—बेटा! राजा सौदासकी रानीने जो दो दिव्य मणिमय कुण्डल धारण
कर रखे हैं, उन्हें ले आओ। तुम्हारा कल्याण हो। उनके ला देनेसे तुम्हारी गुरु-दक्षिणा पूरी
हो जायगी ॥ २९ ॥
स तथेति प्रतिश्रुत्य जगाम जनमेजय ।
गुरुपत्नीप्रियार्थं वै ते समानयितुं तदा ॥ ३० ॥
जनमेजय! तब ‘बहुत अच्छा’ कहकर उत्तंकने गुरुपत्नीकी आज्ञा स्वीकार कर ली
और उनका प्रिय करनेकी इच्छासे उन कुण्डलोंको लानेके लिये चल दिये ॥ ३० ॥
स जगाम ततः शीघ्रमुत्तङ्को ब्राह्मणर्षभः ।
सौदासं पुरुषादं वै भिक्षितुं मणिकुण्डले ॥ ३१ ॥
ब्राह्मणशिरोमणि उत्तंक नरभक्षी राक्षसभावको प्राप्त हुए राजा सौदाससे उन मणिमय
कुण्डलोंकी याचना करनेके लिये वहाँसे शीघ्रतापूर्वक प्रस्थित हुए ॥ ३१ ॥
गौतमस्त्वब्रवीत् पत्नीमुत्तङ्को नाद्य दृश्यते ।
इति पृष्टा तमाचष्ट कुण्डलार्थे गतं च सा ॥ ३२ ॥
उनके चले जानेपर गौतमने पत्नीसे पूछा—‘आज उत्तंक क्यों नहीं दिखायी देता है?’
पतिके इस प्रकार पूछनेपर अहल्याने कहा—‘वह सौदासकी महारानीके कुण्डल ले आनेके
लिये गया’ ॥ ३२ ॥
ततः प्रोवाच पत्नीं स न ते सम्यगिदं कृतम् ।
शप्तः स पार्थिवो नूनं ब्राह्मणं तं वधिष्यति ॥ ३३ ॥
यह सुनकर गौतमने पत्नीसे कहा—‘देवि! यह तुमने अच्छा नहीं किया। राजा सौदास
शापवश राक्षस हो गये हैं। अतः वे उस ब्राह्मणको अवश्य मार डालेंगे’ ॥ ३३ ॥
अहल्योवाच
अजानन्त्या नियुक्तः स भगवन् ब्राह्मणो मया ।
भवत्प्रसादान्न भयं किंचित् तस्य भविष्यति ॥ ३४ ॥