अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 200, कुल 421 में से
संदर्भ में पढ़ेंभयं च महदुद्दिश्य त्रासिताः कुरवो मया ।
क्रुद्धेन भूत्वा तु पुनर्यथावदनुदर्शिताः ॥ २१ ॥
तेऽधर्मेणेह संयुक्ताः परीताः कालधर्मणा ।
धर्मेण निहता युद्धे गताः स्वर्गं न संशयः ॥ २२ ॥
इसके बाद क्रोधमें भरकर मैंने कौरवोंको बड़े-बड़े भय दिखाये और उन्हें बहुत डराया-
धमकाया तथा यथार्थरूपसे युद्धका भावी परिणाम भी उन्हें दिखाया; परंतु वे तो अधर्मसे
युक्त एवं कालसे ग्रस्त थे। अतः मेरी बात माननेको राजी न हुए। फिर क्षत्रिय-धर्मके
अनुसार युद्धमें मारे गये। इसमें संदेह नहीं कि वे सब-के-सब स्वर्गलोकमें गये
हैं ॥ २१-२२ ॥
लोकेषु पाण्डवाश्चैव गताः ख्यातिं द्विजोत्तम ।
एतत् ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि ॥ २३ ॥
द्विजश्रेष्ठ! पाण्डव अपने धर्माचरणके कारण समस्त लोकोंमें विख्यात हुए हैं। आपने
जो कुछ पूछा था, उसके अनुसार मैंने यह सारा प्रसङ्ग कह सुनाया ॥ २३ ॥
इति श्रीमहाभारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि उत्तङ्कोपाख्याने कृष्णवाक्ये
चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत आश्वमेधिकपर्वके अन्तर्गत अनुगीतापर्वमें उत्तंकके उपाख्यानमें
श्रीकृष्णका वचनविषयक चौवनवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ५४ ॥