अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंस्तथैव सर्वैर्विदुरादिभिस्तथा ।
विनिर्ययौ नागपुराद् गदाग्रजो
रथेन दिव्येन चतुर्भुजः स्वयम् ॥ ५४ ॥
कुन्तीसे भलीभाँति अभिनन्दित हो विदुर आदि सब लोगोंसे सत्कारपूर्वक विदा ले चार
भुजाधारी भगवान् श्रीकृष्ण अपने दिव्य रथद्वारा हस्तिनापुरसे बाहर निकले ॥ ५४ ॥
रथे सुभद्रामधिरोप्य भाविनीं
युधिष्ठिरस्यानुमते जनार्दनः ।
पितृष्वसुश्चापि तथा महाभुजो
विनिर्ययौ पौरजनाभिसंवृतः ॥ ५५ ॥
बुआ कुन्ती तथा राजा युधिष्ठिरकी आज्ञासे भाविनी सुभद्राको भी रथपर बिठाकर
महाबाहु जनार्दन पुरवासियोंसे घिरे हुए नगरसे बाहर निकले ॥ ५५ ॥
तमन्वयाद् वानरवर्यकेतनः
ससात्यकिर्माद्रवतीसुतावपि ।
अगाधबुद्धिर्विदुरश्च माधवं
स्वयं च भीमो गजराजविक्रमः ॥ ५६ ॥
उस समय उन माधवके पीछे कपिध्वज अर्जुन, सात्यकि, नकुल-सहदेव, अगाधबुद्धि
विदुर और गजराजके समान पराक्रमी स्वयं भीमसेन भी कुछ दूरतक पहुँचानेके लिये
गये ॥ ५६ ॥
निवर्तयित्वा कुरुराष्ट्रवर्धनां-
स्ततः स सर्वान् विदुरं च वीर्यवान् ।
जनार्दनो दारुकमाह सत्वरः
प्रचोदयाश्वानिति सात्यकिं तथा ॥ ५७ ॥
तदनन्तर पराक्रमी श्रीकृष्णने कौरवराज्यकी वृद्धि करनेवाले उन समस्त पाण्डवों तथा
विदुरजीको लौटाकर दारुक तथा सात्यकिसे कहा—'अब घोड़ोंको जोरसे हाँको' ॥ ५७ ॥
ततो ययौ शत्रुगणप्रमर्दनः
शिनिप्रवीरानुगतो जनार्दनः ।
यथा निहत्यारिगणं शतक्रतु-
र्दिवं तथाऽऽनर्तपुरीं प्रतापवान् ॥ ५८ ॥
तत्पश्चात् शिनिवीर सात्यकिको साथ लिये शत्रुदलमर्दन प्रतापी श्रीकृष्ण आनर्तपुरी
द्वारकाकी ओर उसी प्रकार चल दिये, जैसे प्रतापी इन्द्र अपने शत्रुसमुदायका संहार करके
स्वर्गमें जा रहे हों ॥ ५८ ॥