अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)
Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary
भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंसाधुशिरोमणे! इस प्रकार भिन्न-भिन्न योनियोंमें भ्रमण करनेवाला जीव जिनके
अनुष्ठानसे सुखी होता है, उन कर्मोंका वर्णन सुनो ॥ १४ ॥
दानं व्रतं ब्रह्मचर्यं यथोक्तं ब्रह्मधारणम् ।
दमः प्रशान्तता चैव भूतानां चानुकम्पनम् ॥ १५ ॥
संयमाश्चानृशंस्यं च परस्वादानवर्जनम्
व्यलीकानामकरणं भूतानां मनसा भुवि ॥ १६ ॥
मातापित्रोश्च शुश्रूषा देवतातिथिपूजनम् ।
गुरुपूजा घृणा शौचं नित्यमिन्द्रियसंयमः ॥ १७ ॥
प्रवर्तनं शुभानां च तत् सतां वृत्तमुच्यते ।
ततो धर्मः प्रभवति यः प्रजाः पाति शाश्वतीः ॥ १८ ॥
दान, व्रत, ब्रह्मचर्य, शास्त्रोक्त रीतिसे वेदाध्ययन, इन्द्रियनिग्रह, शान्ति, समस्त
प्राणियोंपर दया, चित्तका संयम, कोमलता, दूसरोंके धन लेनेकी इच्छाका त्याग, संसारके
प्राणियोंका मनसे भी अहित न करना, माता-पिताकी सेवा, देवता, अतिथि और गुरुओंकी
पूजा, दया, पवित्रता, इन्द्रियोंको सदा काबूमें रखना तथा शुभ कर्मोंका प्रचार करना—यह
सब श्रेष्ठ पुरुषोंका बर्ताव कहलाता है। इनके अनुष्ठानसे धर्म होता है, जो सदा प्रजावर्गकी
रक्षा करता है ॥ १५—१८ ॥
एवं सत्सु सदा पश्येत् तत्राप्येषा ध्रुवा स्थितिः ।
आचारो धर्ममाचष्टे यस्मिन् शान्ता व्यवस्थिताः ॥ १९ ॥
सत्पुरुषोंमें सदा ही इस प्रकारका धार्मिक आचरण देखा जाता है। उन्हींमें धर्मकी
अटल स्थिति होती है। सदाचार ही धर्मका परिचय देता है। शान्तचित्त महात्मा पुरुष
सदाचारमें ही स्थित रहते हैं ॥ १९ ॥
तेषु तत् कर्म निक्षिप्तं यः स धर्मः सनातनः ।
यस्तं समभिपद्येत न स दुर्गतिमाप्नुयात् ॥ २० ॥
उन्हींमें पूर्वोक्त दान आदि कर्मोंकी स्थिति है। वे ही कर्म सनातन धर्मके नामसे प्रसिद्ध
हैं। जो उस सनातन धर्मका आश्रय लेता है, उसे कभी दुर्गति नहीं भोगनी पड़ती
है ॥ २० ॥
अतो नियम्यते लोकः प्रच्यवन् धर्मवर्त्मसु ।
यश्च योगी च मुक्तश्च स एतेभ्यो विशिष्यते ॥ २१ ॥
इसीलिये धर्ममार्गसे भ्रष्ट होनेवाले लोगोंका नियन्त्रण किया जाता है। जो योगी और
मुक्त है, वह अन्य धर्मात्माओंकी अपेक्षा श्रेष्ठ होता है ॥ २१ ॥
वर्तमानस्य धर्मेण शुभं यत्र यथा तथा ।
संसारतारणं ह्यस्य कालेन महता भवेत् ॥ २२ ॥