सामग्री पर जाएँ
सर्वकोश
अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

अनुगीता (महाभारत आश्वमेधिक पर्व - श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद सटीक)

Anugita from Mahabharata Ashvamedhika Parva with Commentary

भगवान् श्रीकृष्ण / महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished421 पृष्ठ

पृष्ठ 187, कुल 421 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 187

फिर विदुरजीसे मिलकर उनका कुशल-मंगल पूछा। इसके बाद वैश्यापुत्र महारथी
महामना युयुत्सुको भी हृदयसे लगाया। तत्पश्चात् उन सबके साथ वे दोनों बूढ़े राजा
धृतराष्ट्रके पास जा बैठे ॥ ३१½ ॥
ततो निशि महाराजो धृतराष्ट्रः कुरूद्वहान् ॥ ३२ ॥
जनार्दनं च मेधावी व्यसर्जयत वै गृहान्।
तेऽनुज्ञाता नृपतिना ययुः स्वं स्वं निवेशनम् ॥ ३३ ॥
रात हो जानेपर मेधावी महाराज धृतराष्ट्रने उन कुरुश्रेष्ठ वीरों तथा भगवान् श्रीकृष्णको
अपने-अपने घरमें जानेके लिये विदा किया। राजाकी आज्ञा पाकर वे सब लोग अपने-अपने
घरको गये ॥ ३२-३३ ॥
धनंजयगृहानेव ययौ कृष्णस्तु वीर्यवान् ।
तत्रार्चितो यथान्यायं सर्वकामैरुपस्थितः ॥ ३४ ॥
पराक्रमी भगवान् श्रीकृष्ण अर्जुनके ही घरमें गये। वहाँ उनकी यथोचित पूजा हुई और
सम्पूर्ण अभीष्ट पदार्थ उनकी सेवामें उपस्थित किये गये ॥ ३४ ॥
कृष्णः सुष्वाप मेधावी धनंजयसहायवान् ।
प्रभातायां तु शर्वर्यां कृत्वा पौर्वाह्निकीं क्रियाम् ॥ ३५ ॥
धर्मराजस्य भवनं जग्मतुः परमार्चितौ ।
यत्रास्ते स सहामात्यो धर्मराजो महाबलः ॥ ३६ ॥
भोजनके पश्चात् मेधावी श्रीकृष्ण अर्जुनके साथ सोये। जब रात बीती और प्रातःकाल
हुआ, तब पूर्वाह्नकालकी क्रिया—संध्या-वन्दन आदि करके वे दोनों परम पूजित मित्र
धर्मराज युधिष्ठिरके महलमें गये। जहाँ महाबली धर्मराज अपने मन्त्रियोंके साथ रहते
थे ॥ ३५-३६ ॥
तौ प्रविश्य महात्मानौ तद् गृहं परमार्चितम् ।
धर्मराजं ददृशतुर्देवराजमिवाश्विनौ ॥ ३७ ॥
उस परम सुन्दर एवं सुसज्जित भवनमें प्रवेश करके उन महात्माओंने धर्मराज
युधिष्ठिरका दर्शन किया। मानो दोनों अश्विनीकुमार देवराज इन्द्रसे आकर मिले हों ॥ ३७ ॥
समासाद्य तु राजानं वार्ष्णेयकुरुपुङ्गवौ ।
निषीदतुरुनुज्ञातौ प्रीयमाणेन तेन तौ ॥ ३८ ॥
श्रीकृष्ण और अर्जुन जब राजाके पास पहुँचे, तब उन्हें देख उनको बड़ी प्रसन्नता हुई।
फिर उनके आज्ञा देनेपर वे दोनों मित्र आसनपर विराजमान हुए ॥ ३८ ॥
ततः स राजा मेधावी विवक्षू प्रेक्ष्य तावुभौ ।
प्रोवाच वदतां श्रेष्ठो वचनं राजसत्तमः ॥ ३९ ॥
तत्पश्चात् वक्ताओंमें श्रेष्ठ भूपालशिरोमणि मेधावी युधिष्ठिरने उन्हें कुछ कहनेके लिये
इच्छुक देख उनसे इस प्रकार कहा— ॥ ३९ ॥